फ़िराक़-वार्ता

विश्वनाथ त्रिपाठी

फ़िराक़-वार्ता

विश्वनाथ त्रिपाठी

और अधिकविश्वनाथ त्रिपाठी

    फ़िराक़ साहब का नाम सबसे पहले मैंने तब सुना जब मैं कानपुर के विक्रमाजीत सिंह सनातन धर्म महाविद्यालय में पढ़ता था। वहाँ क्रांतिकारी समाजवादी पार्टी के नेता थे कॉमरेड घनश्याम सिन्हा। उन्होंने सबसे पहले मुझे फ़िराक़ साहब के बारे में बताया। कॉ. घनश्याम सिन्हा ने बड़े नाटकीय ढंग से फ़िराक़ साहब के बारे में बहुत सी बातें बताईं जैसे वे कोई किंवदंती पुरुष हों। उन्होंने फ़िराक़ साहब की कविता और विद्वता के बारे में कम और उनके व्यक्तित्व के ऊटपटाँगपन के बारे में ज़्यादा बताया। जब मैं बनारस गया तो मेरा परिचय फ़िराक़ साहब की कविता से हुआ। एक तरह से यह परिचय केदारनाथ सिंह के द्वारा हुआ। केदारनाथ सिंह के पास फ़िराक़ गोरखपुरी की किताब थी 'इंद्रधनुष' जिसमें उनकी कविताएँ संकलित हैं। केदारनाथ सिंह बहुत उत्साह और मार्मिकता के साथ उसमें से काव्य पंक्तियाँ सुनाते थे। केदारनाथ सिंह कविताओं का रस इतनी अच्छी तरह से लेते थे कि उनके साथ रहकर कविताएँ सुनना अच्छा लगता था। कविता का संस्कार उनमें है। इस तरह फ़िराक़ साहब की कविताएँ मैंने पढ़ीं। मुझे सुविधा ये थी कि मैं थोड़ी बहुत उर्दू जानता था। मेरे गाँव में एक हैं मौलवी ज़ाकिर नदवी। वहाँ जाकर यदि आप ज़ाकिर नदवी नाम से पूछेंगे तो शायद कोई नहीं बताएगा। सब उनको मौलवी साहेब कहते हैं। मौलवी कहे जाते हैं, हैं नहीं। उम्र उनकी मेरी जितनी ही है। मेरे दोस्त हैं। हम एक साथ गुल्ली-डंडा खेलते थे। चूँकि वे मौलवी परिवार से हैं इसलिए उन्हें मौलवी कहा जाता है। तो उनसे मैं उर्दू पढ़ता था। उर्दू के जो संस्कार हैं या उर्दू की थोड़ी बहुत जानकारी मुझे है, उन्हीं के कारण है। ज़ाकिर नदवी शायरी भी करते हैं, फ़ारसी के विद्वान हैं, अरबी भी जानते हैं। उन्होंने फ़िरदौसी के शाहनामे की नक़ल पर ख़ुद एक शाहनामा लिखा है या फिरदौसनामा लिखा है, नाम मुझे ठीक से याद नहीं है। तो मैं उर्दू पढ़ लेता था और फ़िराक़ साहब की कविताएँ मैंने बहुत पढ़ीं। हिंदी में भी पढ़ी थीं। उनकी कविताओं को मैं जब-जब पढ़ता था उनसे प्रभावित होता था और लोगों से बहस करता था। मुझमें पहले ये आदत बहुत थी और अब भी है किसी किसी रूप में कि जो चीज़ मुझे अच्छी लगती है, मैं उसका प्रचार करते घूमता हूँ और जो चीज़ बुरी लगती है उसकी बुराई करते घूमता हूँ। बहुत दिनों तक मैं फ़िराक़ साहब की कविताओं से प्रभावित रहा। अभी भी उनकी कविताएँ मुझे अच्छी लगती हैं लेकिन शायद उस समय जितनी अच्छी लगती थीं उतनी अच्छी अब नहीं लगतीं या कुछ ही कविताएँ अब बहुत अच्छी लगती हैं। इस तरह से फ़िराक़ साहब से मेरा परिचय हुआ। तब तक फ़िराक़ साहब को मैंने देखा नहीं था।

    मेरे एक दोस्त थे सतीश बजाज जो कानपुर में मेरे साथ थे। बाद में इलाहाबाद विश्वविद्यालय चले गए। मैं इलाहाबाद, सतीश से मिलने अक्सर जाता था। फिर मेरी शादी भी इलाहाबाद में हो गई। फिर ये हुआ कि वहाँ के साहित्यकारों से मेरा परिचय और मित्रता हुई जैसे भैरव जी, अमरकांत, शेखर जोशी, मार्कंडेय आदि। इन सब कारणों से मैं इलाहाबाद जाता रहता था। मेरे ससुर श्री अमरेंद्र कृष्ण मिश्र, फ़िराक़ साहब के शिष्य थे और जहाँ मेरी ससुराल थी वहाँ से बैंक रोड, जहाँ फ़िराक़ साहब रहते थे, क़रीब था। एक दिन मैंने सतीश से कहा कि मैं फ़िराक़ साहब से मिलना चाहता हूँ। उस समय हम लोगों की उम्र उन्नीस बीस साल की थी। तो सतीश मुझे देखकर मुस्कुराए और कहा कि जैसे ही तुम वहाँ जाकर किसी से फ़िराक़ साहब का घर पूछोगे तो वह तुम्हें देखकर हँसेगा क्योंकि फ़िराक़ साहब की ख्याति कुछ इस तरह की है। मैं सबसे पहले तुम्हें यूनिवर्सिटी में उनसे मिलवाता हूँ। तो मैं सतीश के साथ इलाहाबाद विश्वविद्यालय गया। हम लोग ऐसे कमरे को ढूँढ़ने लगे जिसमें फ़िराक़ साहब पढ़ा रहे हों। एक कमरे के सामने खड़े होकर सतीश ने कहा कि वो देखो पढ़ा रहे हैं फ़िराक़ साहब। मैंने देखा कि एक बहुत बड़ा कमरा था, जिसमें विद्यार्थी बहुत कम थे। फ़िराक़ साहब सिगरेट पी रहे थे और घूम-घूमकर पढ़ा रहे थे। मेरे ख़याल से मिल्टन की कोई कविता थी।

    कुछ दिन के बाद एक दिन सुबह मैं अकेले उनके घर गया। मैंने देखा कि एक आदमी लॉन पर सिगरेट पी रहा है और इस तरह से पी रहा है जैसे एक ही कश में सिगरेट को ख़त्म कर देगा। मैंने अनुमान लगाया कि यही होंगे फ़िराक़ साहब। उन्हें देख तो मैं पहले भी चुका था लेकिन ऐसा नही था कि दोबारा देख के पहचान लूँ। तो मैं उनके पास गया और पूछा कि फ़िराक़ साहब आप ही हैं? तो उन्होंने कहा कि हाँ जनाब, रघुपति सहाय फ़िराक़ मैं ही हूँ, आइए बैठिए। लॉन में कुर्सी थी, मैं बैठ गया। थोड़ी देर बाद उन्होंने कहा कि धूप हो रही है, चलिए अंदर चलकर बातें करते हैं। मैं अंदर गया। अंदर कोई नहीं था या कम से कम किसी के होने का अहसास नहीं था। सामने एक बहुत बड़ी पेंटिंग लगी थी। पेंटिंग ये थी कि सिद्धार्थ यशोधरा को छोड़कर जा रहे हैं। मैंने उनको अपना परिचय दिया तो जैसा उनका अंदाज़ था उन्होंने छूटते ही कहा कि अच्छा हिंदी में एम.ए. कर रहे हो? यहाँ पर उल्लेखनीय है कि जिन लोगों ने कभी फ़िराक़ साहब से बात की होगी, वे जानते हैं कि फ़िराक़ साहब का बातें करने का एक बड़ा ख़ास अंदाज़ था जो बहुत नाटकीय था। फ़िराक़ साहब जब बात करते थे तो उनका पूरा शरीर नाटक करता था। आँखें, मुँह, हाथ, पाँव चलते थे। अब उसे मैं लिखने में तो ला नहीं सकता। तो फ़िराक़ साहब ने कहा कि साहब बात ये है कि हिंदी में कुछ ऐसी कविताएँ आप सुनाइए जो सरल-सुगम हों और अच्छी लगें। अब मैं इतने बड़े आदमी को क्या सुनाता। ख़ैर! मैंने उनको जयशंकर प्रसाद की कामायनी की ये पंक्तियाँ सुनाईं जिनमें आता है कि 'वह अनंग-पीड़ा-अनुभव-सा, अंग-भंगियों का नर्तन।' सुनकर उन्होंने कहा कि साहब ये समझ में आया नहीं, अंगियों-भंगियों, क्या मतलब है इसका? मेरा चेहरा उतर गया, मुझे बहुत बुरा भी लगा। इसके बाद उन्होंने हिंदी कविता को, हिंदी वालों को इतने हास्यास्पद ढंग से बुरा-भला कहा कि मेरी खोपड़ी झनझना गई। फिर मैंने हिंदी के बड़े-बड़े लेखकों का नाम लेना शुरू किया कि इतने बड़े-बड़े लेखक हैं हिंदी में, जैसे मैंने राहुल सांकृत्यायन का नाम लिया, उन दिनों और जितने बड़े लेखक थे उनका नाम लिया। लेकिन मैं जिस भी लेखक का नाम लूँ फ़िराक़ साहब एक-एक करके सबको गालियाँ दें और आख़िर में उन्होंने द्विवेदी जी को भी कुछ कहना शुरू किया। मैंने उनसे कहा कि साहब द्विवेदी जी के बारे में कुछ मत कहिए, वे मेरे गुरु हैं। तो उन्होंने और ज़्यादा कहा, अंग्रेजी में कहा, जिसका मतलब था बीसवीं सदी में मूँछें रखने का क्या मतलब (द्विवेदी जी मूँछें रखते थे)। तो अजीब बात ये हुई कि मैंने उनसे कहा कि फ़िराक़ साहब मैं आपको ढेला मार के भागूँगा और आप मुझे पकड़ नहीं पाएँगे। मुझे बहुत ग़ुस्सा रहा था, वैसा ही ग़ुस्सा जो एक देहाती लड़के का ग़ुस्सा होता है। मेरी बात सुनकर फ़िराक़ साहब बड़े ज़ोर से हँसने लगे और कहा कि तुम तो असली हिंदी वाले हो। बहस करना सीखो, मुझको हिंदी का दुश्मन मत समझो। पहले मेरी बातें समझो। ख़ैर, मैं वहाँ से चला आया। फिर मैंने समझा कि फ़िराक़ साहब से क्या मिलना, बड़े अजीब आदमी हैं। लेकिन फ़िराक़ साहब केवल ऐसी ही बातें नहीं करते थे, दूसरी बातें भी करते थे, जैसे एक बात पहले-पहल उन्होंने ही मुझसे बताई है। एक दिन वे कहने लगे कि पाणिनी के ज़माने में नब्बे संस्कृतियाँ चलती थीं और उसमें से एक को स्टैंडर्डाइज़ किया था पाणिनी ने। फ़िराक़ साहब संस्कृत को संस्कृतियाँ कहते थे। उनके कहने का मतलब था संस्कृतें। तो फ़िराक़ ने जब ये बात मुझे बताई तो मैं सुन रहा था लेकिन उनका चेहरा एकदम से बदल गया और बोले कि 'तुम तो बिल्कुल इंसेन्सेटिव आदमी हो। इतनी बड़ी बात मैं कह गया और तुम्हारे चेहरे पर कोई इमोशन ही नहीं आया। जब मैंने पहले-पहल ये बात डॉ. ताराचंद के मुँह से सुनी थी तो मैं तो तीन दिन तक रक़्स करता घूमा था।' अब मैं काशी विश्वविद्यालय का विद्यार्थी। अपभ्रंश पढ़ता था, प्राकृत पढ़ता था। मेरे मुँह से निकल गया कि हाँ साहब, जब मैंने ये बात पहली बार सुनी थी तो मैं भी बहुत प्रभावित हुआ था। यह सुनकर फ़िराक़ साहब थोड़े नरम हुए। मैंने ये बात उनसे कही ही उन्हें हतप्रभ करने के लिए थी। वैसे ये बात मैंने पहले नहीं सुनी थी। फिर वे काशी विश्वविद्यालय की बुराई करने लगे। मैं चला आया। तो मुझे बुरा तो लगा उनसे मिलकर लेकिन ये भी लगता था कि ये आदमी जो बातें कर रहा है वे सारी की सारी आधारहीन नहीं हैं। जिस तरीक़े से फ़िराक़ साहब की बातों से विकर्षण पैदा होता था उसी तरह से साथ-साथ एक आकर्षण भी पैदा होता था कि ये एक अजीब क़िस्म का आदमी है जो सबको गाली देता है और इतना बड़ा शायर कहा जाता है। ये अपनी पी.सी.एस. की या कुछ लोग तो कहते हैं कि आई.सी.एस. की नौकरी छोड़कर स्वाधीनता आंदोलन में जेल गया था। जवाहरलाल नेहरू के साथ रहा है। मोतीलाल नेहरू का सेक्रेटरी था।

    जब फ़िराक़ साहब ने ये कहा कि तुम इतने मंदबुद्धि के आदमी हो, इतनी बड़ी बात मैं कह गया और कोई इमोशन ही तुम्हारे चेहरे पर नहीं आया तो इसके बाद बोले कि देखो जो बुद्धि होती है वह दो प्रकार की होती है, एक तो होती है बाँसबुद्धि और दूसरी कंबलबुद्धि। कंबलबुद्धि वह होती है जिसे चाहे जितना डंडे से पीटो, सुई गड़ाओ, कुछ असर नहीं होता उस पर। बाँसबुद्धि वह होती है कि उसका एक पोर तोड़ने पर सारे के सारे पोर खट-खट करके टूटते चले जाते हैं। तो तुम कंबलबुद्धि के आदमी हो। तुम्हारी समझ में मेरी बात नहीं रही। तब मैंने ये कहा था कि साहब ये बात मैंने पहले सुन रखी है कि पाणिनी ने नब्बे संस्कृतियों में से एक को स्टैंडर्डाइज़ किया था।

    इन सारी बातों के साथ ये बात याद रखने की है कि फ़िराक़ साहब से मिलने से पहले 'इंद्रधनुष' की अनेक पंक्तियाँ मुझे याद हो गई थीं, वे मुझे इतनी अच्छी लगती थीं। जैसे 'हर साज़ से होती नहीं ये धुन पैदा, होता है बड़े जतन से ये गुन पैदा।' या, 'शाम भी थी धुआँ धुआँ, हुस्न भी था उदास उदास।' या, 'सर में सौदा भी नहीं, दिल में तमन्ना भी नहीं।'

    ऐसी बहुत सी कविताएँ मुझे याद थीं और फ़िराक़ साहब के कवित्व की जो महत्ता है उसका मैं कायल था। इस उत्साह को लेकर मैं उनसे मिलने गया था। इसलिए विकर्षण तो बहुत हुआ लेकिन चूँकि उनकी शख़्सियत, उनके कृतित्व से मैं पहले ही प्रभावित हो चुका था इसलिए एक ख़ास तरह का आकर्षण भी उनके प्रति बना रहा। इसलिए मैंने उनसे मिलना कभी नहीं छोड़ा। मेरे ससुर जब सुनते थे कि मैं फ़िराक़ साहब से मिलने गया था तो वे बहुत हँसते थे।

    इस बीच एक घटना हुई। घटना ये कि नामवर जी ने डॉ. रामविलास शर्मा का एक लेख हमें पढ़कर सुनाया। नामवर जी मेरे अध्यापक थे, जिसे आज के ज़माने में एडहॉक अध्यापक कहा जाता है। तो वे एडहॉक अध्यापक थे और एम.ए. की कक्षा पढ़ाते थे। मैं और केदारनाथ सिंह उनसे अपभ्रंश पढ़ते थे। लेकिन उन दिनों नामवर जी का साथ बड़ा सर्जनात्मक होता था। वे बहुत से कवियों, साहित्यकारों के बारे में हमें बहुत सी बातें बताते थे, हमसे बातें करते थे। मेरे ऊपर उनके बहुत गहरे संस्कार थे। जब मैं फ़िराक़ साहब की बड़ी तारीफ़ करता तो नामवर जी हँसते थे और ये प्रकट करते थे कि फ़िराक़ गोरखपुरी उतने बड़े शायर नहीं हैं जितना आप समझ रहे हैं। मैं चिढ़ता भी था। उन दिनों हिंदी को लेकर डॉ. रामविलास शर्मा और फ़िराक़ गोरखपुरी के बीच नोंकझोंक हुई थी। डॉ. रामविलास शर्मा ने एक लेख लिखा था 'फ़िराक़ और हिंदी'। ये लेख नामवर जी ने मुझे पढ़कर सुनाया। वह लेख रामविलास जी ने अपनी विध्वंसात्मक शैली में लिखा था। वह पहला ऐसा लेख मेरी नज़रों से गुज़रा जिसमें कोई आदमी फ़िराक़ की 'टिलटिली' उड़ाता है और यह समझता है, साबित भी करता है कि फ़िराक़ अपदार्थ हैं। मुझे यह बात बुरी लगी क्योंकि मैं फ़िराक़ गोरखपुरी को इतना अपदार्थ मानने को तैयार नहीं था। लेकिन यह ज़रूर था कि रामविलास जी का यह लेख पठनीय बहुत था। इस लेख की कई बातें मुझे याद हैं जैसे फ़िराक़ साहब ने एक लेख लिखा था जिसमें हिंदी कविता से कोई पंक्ति उद्धृत की थी जिसमें 'लोचन-विलोचन' आता है। फ़िराक़ साहब ने मज़ाक उड़ाते हुए पूछा कि यह लोचन क्या है? आगे लिखा कि जब मैं इस लफ़्ज़ को पढ़ता हूँ तो मुझे अपने गाँव के रामलोचन पांडे याद आते हैं, बेचारे बड़े शरीफ़ आदमी थे, मर गए। जवाब में रामविलास जी ने लिखा था कि आपको लोचन सुनकर रामलोचन पांडे याद आते हैं? तो 'उदित उदयगिरि मंच पर रघुबर बाल पतंग' सुनकर आपको पतंग उड़ाने का ज़माना याद जाएगा। फ़िराक़ ने हिंदी लेखकों को ‘धोती परसाद’ कहा था तो रामविलास जी ने लिखा कि सुथनासहाय जी सुनिए। इस तरीक़े से बड़ा तुर्की-बतुर्की चला था। ख़ास तौर पर रामचंद्र शुक्ल और निराला पर जो आक्षेप फ़िराक़ साहब ने किए थे, उनका बहुत ही सटीक उत्तर रामविलास जी ने दिया था। फिर भी मैं यह नहीं मान सकता था कि फ़िराक़ साहब इतने कौड़ी के तीन हैं जैसा कि रामविलास जी दिखाना चाहते थे। नामवर जी उसका मज़ा लेते थे। वे रामविलास जी से सहमत होते थे और कहते थे कि ठीक लिखा है। फ़िराक़ साहब ऐसे ही हैं। अंग्रेजी के लेक्चरर हैं इसलिए नाम हो गया, वैसे इतने बड़े नहीं हैं। फ़ैज़ उनसे बड़े शायर हैं। नामवर जी मख़्दूम को भी बहुत बड़ा शायर मानते थे, बड़ा शायर मतलब फ़िराक़ से बड़ा शायर। मैं फ़िराक़ के सामने किसी को मानता नहीं था। फ़िराक़ का जो भी लिखा मिलता उसे पढ़ता और जब कभी इलाहाबाद जाता तो उनसे मिलता भी।

    फ़िराक़ साहब बहस करते वक़्त बहुत गाली-गलौज करते थे। जिन रूपों में मैंने फ़िराक़ साहब को देखा है उनमें से कुछ का ज़िक्र मैं ज़रूर करूँगा हालाँकि उनके उन रूपों को लेखन में उतार पाना आसान काम नहीं है। एक बार मैं उनके यहाँ शाम को गया तो वे बैठे शराब पी रहे थे। मेरे ख़याल से वे ठर्रा पीते थे। हिसाबी-किताबी बहुत थे और अपनी आमदनी के अनुसार खर्च करते थे। बहुत देर में एक पेग ख़त्म करते थे, मेरा ख़याल है कि पीने में एक या डेढ़ घंटा लगा देते थे। और जब वे शाम को पीते थे तब अक्सर चाहे मज़ा लेने के लिए, चाहे उनकी बातें सुनने के लिए काफ़ी संख्या में लोग जाते थे। उनमें बड़े-बड़े लोग, कई उच्चाधिकारी होते थे। इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज भी आते थे। फ़िराक़ साहब के यहाँ बनारस का एक मुस्लिम लड़का रहता था। नाम था फ़ना। बाद में पता चला कि वह लड़का नज़ीर बनारसी का परिचित था और फ़िराक़ साहब की सेवा करने चला आया था। तो एक बार फ़िराक़ साहब ने पीकर एक दूसरे नौकर रामखेलावन को आवाज़ दी कि- ऐऽऽ मौलाना को भेजो। मौलाना मतलब फ़ना। उसकी उम्र बीस बाईस साल की रही होगी। तो 'मौलाना' आए और उसके बाद इतनी गालियाँ फ़िराक़ साहब ने उस लड़के को दीं कि मैं बता नहीं सकता। वह लड़का बेचारा हाथ जोड़े, सिर नीचा किए खड़ा रहा, जवाब दे पाए। फ़िराक़ साहब ने उससे कहा कि तुमने खाना इसी वक़्त क्यों भिजवा दिया? लड़के ने कहा हुज़ूर आपने कहा था खाना भिजवा दो। फ़िराक़ साहब बोले कि 'न। मैंने ये नहीं कहा था। मैंने कहा था कि खाना तैयार रहे। खाना तैयार रहे और खाना भिजवा दो, इसमें फ़र्क़ आप नहीं समझते हैं? ये कोई अरबी नहीं है, सिंपल खड़ी बोली है। मैं शाम को छह बजे कहूँगा कि खाना तैयार रहे और रात को साढ़े बारह बजे कहूँगा कि खाना जाए तो खाना जो है वह रात को साढ़े बारह तपाक से जाएगा। अगर सवा बारह बजे गया तो मैं आपको क़त्ल कर दूँगा। आपने जल्दी खाना भिजवा दिया। आप चाहते हैं कि मुझे खाना खिला के आप रामखेलावन के साथ ख़ुशगप्पियाँ करें?' मुझे बड़ा बुरा लगा। इसके बाद फ़िराक़ साहब पेशाब करने गए। पेशाब जब करने लगे तो वहीं उनका पायजामा नीचे उतर गया और वे उसी तरह नंग-धड़ंग आकर कुर्सी पर बैठ गए। उस समय वहाँ कुर्सी पर सात-आठ लोग बैठे थे। चूँकि उस दिन फ़िराक़ साहब फ़ना पर नाराज़ थे इसलिए उन्होंने हज़रत मुहम्मद और क़ुरान के बारे में जो कुछ कहना शुरू किया वो सब मैं नहीं कह सकता। बहुत सतर्क होकर ये कह सकता हूँ कि जैसे उन्होंने क़ुरान के बारे में कहा कि साहब पढ़ रहा हूँ, सारे राज़ खुल रहे हैं। और भी कुछ इधर-उधर की ऐसी बातें कहीं जो सभ्य समाज में कहने लायक नहीं हैं। इसी बीच एक आदमी आया जो हिंदू था। उसने फ़िराक़ साहब की इन बातों में मज़ा लेना शुरू कर दिया। तो फ़िराक़ साहब ने हिंदुओं के बारे में इसी तरह की बातें करना आरंभ किया और बोले माफ़ कीजिएगा साहब जैसे ही मुझसे कोई हिंदू कहता है तो मुझे लगता है कि जैसे कोई खेत में हाजत रफ़ा कर रहा है साला। ख़ैर, थोड़ी देर बाद महफ़िल तो रुख़सत हो गई, सब अपने-अपने घर चले गए लेकिन दूसरे दिन जब मैं गया तो बोले कि क्या बताएँ कल कुछ ऐसी बातें हो गईं।

    एक बार का वाकया ये है कि वही शाम वाली बैठक थी। तो डॉ. ईश्वरीप्रसाद आए। डॉ. ईश्वरीप्रसाद का नाम तो मैं दर्जा पाँच से ही सुनता आया था। इतिहास में उनकी किताबें हैं। बहुत बड़े प्रोफ़ेसर थे। वे क्या करने आए थे? एक ऐसा निर्वाचन क्षेत्र होता था विधान परिषद का जिसमें प्रोफ़ेसर लोग ही खड़े हो सकते थे, वे उसके उम्मीदवार थे और फ़िराक़ साहब से वोट माँगने आए थे। फ़िराक़ साहब ने उनसे कहा कि अरे! पंडित जी आप बिल्कुल निश्चिंत रहिए, जब आप खड़े हैं तो मैं आपको छोड़कर और किसे वोट दूँगा। मैं नहीं जानता था कि ईश्वरीप्रसाद ब्राह्मण हैं। जब फ़िराक़ साहब ने उनको पंडित जी कहकर संबोधित किया तब मुझे पता चला। अब डॉ. ईश्वरीप्रसाद ने क्या किया कि यह सोचकर कि फ़िराक़ साहब नशे में हैं, वे फ़िराक़ साहब की बातों में मज़ा लेने लगे। फ़िराक़ साहब को इस बात का पता चल गया, इस मामले में वे बहुत सतर्क आदमी थे। उन्होंने कहा कि सुनिए पंडित जी वोट तो मैं आपको दे दूँगा, वो सब तो ठीक है लेकिन एक बात आप मुझे बताइए कि आप शरीफ़ होना कब सीखेंगे? आप इलाहाबादी होना कब सीखेंगे? सर शफ़ात ने ये काम कभी नहीं किया, अमरनाथ झा ने ये काम कभी नहीं किया। डॉ. ताराचंद ने कभी नहीं किया। आप जो हैं इस चिरकुट चीज़ के पीछे क्यों पड़े हुए हैं? तो आप अब इलाहाबादी बनना सीखिए, कुछ शराफ़त आप में आनी चाहिए। आपको हम लोगों के नाम पर धब्बा नहीं लगाना चाहिए। इसके बाद प्रो. ईश्वरीप्रसाद चले गए।

    एक दिन कोई साहब आए। बड़ी दूर से आवाज़ दी- मैं हूँ, रामबाबू। वो शायद हाईकोर्ट में वकील थे। वकील ही थे क्योंकि मेरे ससुर के दोस्त थे। बाद में उनकी मेरी मुलाक़ात भी हुई। तो उन्होंने कहा कि मैं हूँ, रामबाबू। फ़िराक़ साहब वहीं से बैठे-बैठे बोले आप चाहे रामबाबू हों, चाहे दशरथ बाबू, आपकी आवाज़ निहायत भोंडी और बदसूरत है। तो उन्होंने फ़िराक़ साहब से कहा कि जब आप ऐसी बात कर रहे हैं, इतने नाराज़ हैं तो मैं जा रहा हूँ। फ़िराक़ साहब बोले जाएँगे कहाँ? जब कुदरत ने आपको आवाज़ ही ऐसी दी है तो जहाँ भी जाएँगे उसी का सर फोड़ेंगे, यहीं चले आइए। ज़ाहिर है कि वे दोनों दोस्त थे।

    फ़िराक़ साहब कभी-कभी बहुत निर्मम होकर अपने बारे में, अपनी पत्नी के बारे में, अपने उस बच्चे के बारे में जिसने आत्महत्या कर ली थी, अपनी माँ के बारे में, अपने भाई यदुपति सहाय के बारे में बहुत-सी ऐसी बातें करते थे जो बातें कोई सामान्य और सभ्य आदमी नहीं कर सकता। अगर कोई फ़िराक़ साहब से वाई साहब यानी यदुपति सहाय की, जो उनके छोटे भाई थे, तारीफ़ करता था तो वे चिढ़ते थे। फ़िराक़ साहब जितने ज़्यादा बदनाम और ग़ैर-ज़िम्मेदार माने जाते थे, यदुपति सहाय उतने ही ज़िम्मेदार और महत्त्वपूर्ण प्रोफ़ेसर माने जाते थे। शिक्षक के रूप में भी उनकी बहुत प्रशंसा करते थे विद्यार्थी। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भी उनकी तारीफ़ होती थी। एक बार फ़िराक़ साहब के यहाँ एक लड़का आया जो बहुत ही अनौपचारिक ढंग से व्यवहार कर रहा था। आते ही उसने कोट उतारकर चारपाई पर फेंका और लेट गया। मुझे ताज्जुब हुआ कि ये कैसा विद्यार्थी है? हो सकता है उनका रिश्तेदार रहा हो। तो उसने कहा कि आपको वाई साहब याद कर रहे थे। वे फ़िराक़ साहब के मकान से सात-आठ मकानों की दूरी पर रहते थे। दोनों सगे भाई थे और दोनों इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे। उस लड़के ने फिर कहा कि साहब, वाई साहब को तो हार्ट अटैक हो गया है। फ़िराक़ साहब ने कहा कि नहीं ऐसी तो कोई बात नहीं है। मुझे तो कोई ख़बर नहीं हैं, कैसे हो गया हार्ट अटैक? उस लड़के ने कहा- उनको दस्त रहे थे। फ़िराक़ साहब बोले - तब तो हार्ट अटैक हो ही नहीं सकता क्योंकि लूज़ मोशन में हार्ट अटैक नहीं हो सकता। यहाँ तक तो सब ठीक था लेकिन आगे उस लड़के ने कहा कि- साहब चाहे जो हो वाई साहब पढ़ाते बहुत अच्छा हैं। फ़िराक़ साहब चुप रहे। उसने फिर कहा कि साहब He is a wonderful teacher... बहुत अच्छा पढ़ाते हैं। तो फ़िराक़ साहब ने कहा कि हाँ वो अच्छा पढ़ाता होगा। मैंने बी.ए. में जितने नोट्स बनाए थे, उन्हीं को पढ़कर उसके अच्छे नंबर गए, उन्हीं से पढ़ता होगा वो। उस लड़के को पता नहीं क्या सूझा कि उसने फिर कहा कि साहब जो कुछ कहिए, वाई साहब बहुत अच्छा पढ़ाते हैं। अब इसके बाद फ़िराक़ ने जो कुछ कहा, अब दुनिया में फ़िराक़ साहब भी नहीं हैं, वाई साहब भी नहीं हैं, मैं झूठ नहीं कह रहा हूँ और जो कुछ कह रहा हूँ उसमें अश्लीलता नहीं है, इसलिए कह रहा हूँ। फ़िराक़ साहब ने कहा कि- दि मिसफॉरच्यून ऑफ़ अदर्स इज़ न्यूज़ टू हिम। जब वो खाना खाने के लिए बैठता है टेबल पर तो उसकी बीवी ऐसी, इसकी बीवी ऐसी- ये सब जो कुछ कहा, वो ये कि- ही हैज़ इनहर्टेड दिस मीननैस फ्रॉम आर मदर, शी वाज़ परफैक्ट ललाइन। इसके बाद प्रो. यदुपति सहाय के साथ-साथ अपने परिवार के बारे में अजीब तरह की बातें कहनी शुरू कीं। अपनी बीवी के बारे में जो कुछ उन्होंने कहा उसे मैं नहीं कह सकता। उस दिन मेरे मन में फ़िराक़ साहब के प्रति घृणा का अंश पैदा हुआ। एक दूसरे मौक़े पर उन्होंने अपनी बीवी की इस चीज़ के लिए तारीफ़ भी की है कि वे कबाब बहुत अच्छा बनाती थीं और ये कहा कि जिसे अंग्रेजी में Underdone कहते हैं, कबाब थोड़ा सा कच्चा रह जाता था जो और अच्छा लगता था। एक बार मैंने उनसे पूछा कि फ़िराक़ साहब जब आप अपनी बीवी से इतने असंतुष्ट थे तो आपने दूसरी शादी क्यों नहीं की? तो उन्होंने जो जवाब दिया वह बड़ा अजीब था। वो ये कि I thought that my destruction was complete. बल्कि उन्होंने बताया कि ये शादी उन्होंने अपनी इच्छा से की थी। एक थे मुंशी जगदंबाप्रसाद, उन्होंने ये शादी तय कराई थी और फ़िराक़ साहब ने इसके लिए सहमति दी थी। फ़िराक़ साहब ने मुंशी जगदंबाप्रसाद को गाली दी और कहा कि उसने मेरी ज़िंदगी बरबाद कर दी। हालाँकि कुछ स्रोतों से मुझे दूसरी बातें भी पता चली हैं। एक हैं अहमद साहब जो यहाँ इंडियन एक्सप्रेस में काम करते हैं। हिंदी में बहुत अच्छी कविताएँ लिखते हैं। उन्होंने मुझे बताया कि फ़िराक़ साहब की बीवी का नाम किशोरी देवी था और वे देखने में उतनी ख़ूबसूरत रही हों, लेकिन बदसूरत भी नहीं थीं। अच्छे परिवार की थीं। उन्होंने ख़ुद लिखा है उत्तर प्रदेश के 'फ़िराक़ अंक' में कि वे मेरा ख़याल रखते थे। तो हो सकता है कि फ़िराक़ साहब लोगों को दिखाने के लिए नाटक करते हों। इसमें कोई ताज्जुब नहीं होगा क्योंकि हमारी तरफ़ पूर्वी उत्तर प्रदेश के जो रईस होते हैं, वो एक नाटक भी करते हैं जैसे उनका बीवी से कोई मतलब नहीं है और वे बीवी को नापसंद करते हैं। आख़िरी दिनों में भी फ़िराक़ साहब अपनी पत्नी को पैसा भेजते थे और कभी-कभी वे आकर फ़िराक़ साहब के यहाँ रहती भी थीं। जब तक फ़िराक़ साहब नौकरी करते रहे तब तक वे साथ रहती थीं बाद में अपने मायके रहने लगीं।

    फ़िराक़ साहब की समलैंगिक प्रवृत्तियों के बारे में बहुत बातें की गई हैं। लोगों ने तो यह भी अनुमान लगाया कि उनकी इस प्रवृत्ति के चलते ही उनके पुत्र ने आत्महत्या कर ली। एक दिन मैंने उनसे पूछा कि आपका कोई पुत्र था जो अब नहीं है, उसने आत्महत्या कर ली? तो फ़िराक़ साहब ने मुझसे जो कहा वो ये कि साहब ख़ुदा का शुक्र है कि वो अब नहीं है क्योंकि वो तो अपना नाम भी ठीक से नहीं ले सकता था। उसका नाम था गोविंद सहाय पर वो गोविंद ठीक से नहीं बोल पाता था, बोलता था गोविन्न। वह रेल से कट गया था शायद क्योंकि फ़िराक़ साहब ने बताया कि रेल से उसके दोनों पैर कट गए थे। वो गया था आत्महत्या करने लेकिन कर नहीं पाया, उसके पैर कट गए। कुछ लोग उसको उठाकर घर लाए भी थे। कुछ दिन ज़िंदा रहा बाद में मर गया। फ़िराक़ साहब की दो लड़कियाँ थीं, दोनों की शादियाँ अच्छी हुईं। हालाँकि कुछ लोग तो कहते हैं कि उनके कन्यादान के समय फ़िराक़ साहब पीकर कहीं बेहोश पड़े थे। लेकिन मुझे लगता है कि ऐसा नहीं हुआ होगा क्योंकि फ़िराक़ साहब अपनी पारिवारिक ज़िम्मेदारियों में कोताही नहीं करते थे।

    फ़िराक़ साहब पोशाक के मामले में बहुत लापरवाह थे। अक्सर कॉफ़ी हाउस में मैंने उनको देखा है कि उनके पायजामे का नाड़ा नीचे लटक रहा है। पायजामा गंदा भी होता था। लेकिन मैंने ऐसा भी देखा है कि खाना-वाना खाने के बाद वे धोती और कुर्ता पहन करके, उनके घर में एक आदमक़द शीशा था, उसके सामने खड़े होकर वे बड़ी देर तक अपने को देखते थे। एक बार इसी स्थिति में मुझसे बोले कि दुनिया की सबसे अच्छी पोशाक जो है वो धोती और कुर्ता है।

    खाने का शौक़ फ़िराक़ साहब को बहुत ज़्यादा था। खिलाने का भी शौक़ था। उनके यहाँ एक-दो बार मैंने खाया भी है। खाने में उनको बहुत चीज़ें पसंद थीं। खाने के बारे में बहुत बातें करते थे। मुसलमानों के खाने की बड़ी तारीफ़ करते थे और कहते थे कि यहाँ पर तो खाना-वाना कुछ था ही नहीं। हिंदुओं के खाने को क्या था? पुआ। तुलसीदास की यह पंक्ति उद्धृत करते थे कि 'जब माँगै तब पूव दिखावै।' और खीर। बताइए? दो साल के बच्चे का टेस्ट है खीर- ये भी कोई खाने की चीज़ है? यह भी कहते थे कि- क्या समझते हैं आप, मुसलमान सोलह क़िस्म की तो रोटियाँ बनाना जानता है। वो रोटी और दाल दे दे आपको तो हाथ चाटेंगे। लेकिन फ़िराक़ साहब जब हिंदुओं के खाने की तारीफ़ करने पर आते थे तो अपनी इस बात को भूल जाते थे। उनका तारीफ़ करने का ढंग बड़ा अजीब था। मिर्च के अचार के बारे में उनका कहना था कि मुझसे मिर्च का अचार मत कहो। जैसे ही कोई आदमी मुझसे कहेगा कि मिर्च का अचार तो फिर उस मिर्च में मुझे टेस्ट नहीं आएगा। मुझसे कहो मरिचा का अचार। गोरखपुर में मरिचा का अचार कहा जाता है। साठी के चावल का भात, अरहर की दाल और आलू का चोखा के बारे में कहते थे कि अगर ये कम बने हों तो मैं किसी को नहीं देता। साठी का चावल वे गोरखपुर से मँगवाया करते थे। साठी का चावल साठ दिन में ही पैदा हो जाता है। यह पूर्वी उत्तर प्रदेश में होता है जिसे Transplant नहीं किया जाता, बो दिया जाता है। फिर साठ दिन में अपने आप हो जाता है। भादों में तैयार होता है और बहुत मीठा होता है। यह वही है जिसे संस्कृत में शालि कहा जाता है। फ़िराक़ साहब बैंगन के भुरते की बड़ी तारीफ़ करते थे और बताते थे कि कैसे बनाया जाता है।

    मुझे फ़िराक़ साहब के बारे में बात करते, सोचते हमेशा ये लगा कि वे अंदर से पारिवारिक जीवन बिताने के आकांक्षी थे। पारिवारिकता उनका एक ऐसा स्वप्न था जो उनके जीवन में कभी आया ही नहीं। इस पर वे खीझते और क्षुब्ध होते थे। लोगों से कहते भी थे। ऐसा संभव ही नहीं है कि वे अपनी पत्नी की उपेक्षा करते। बुराई ये थी कि वे अपने परिवार में सिर्फ़ अपनी पत्नी की ही बुराई नहीं करते थे। अपने भाई, अपनी माँ सबकी बुराई करते थे। वैसे फ़िराक़ साहब बहुत कुलीन, संभ्रांत और संस्कारी परिवार के थे। पिता गोरखप्रसाद इबरत अच्छे शायर थे। फ़िराक़ साहब उनका एक शेर बहुत गर्वपूर्वक सुनाते थे और उन्होंने लिखा भी है कि इस मफ़हूम पर ऐसे शेर बहुत कम कहे गए हैं। शेर ये है कि-

    क्या ढूँढ़ती है बाग़ में मेरे तू ख़िज़ाँ

    तू जानती है सबके चमन में बहार है।

    फ़िराक़ साहब कहते थे कि 'सबके' को ज़रा लचक के साथ कहिए- सबके चमन में बहार है। यहाँ दिल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिणी परिसर के जो डायरेक्टर थे अभयमान सिंह, फ़िराक़ साहब उनके सगे मामा थे। फ़िराक़ साहब का परिवार अच्छा था, संभ्रांत था। अच्छी क़द-काठी के थे फ़िराक़ साहब और शक्ल-सूरत अच्छी थी, साँवले थे।

    फ़िराक़ साहब परस्पर विरोध के पुंज थे। मैंने तो उनकी पत्नी को नहीं देखा लेकिन फ़िराक़ साहब अपनी कई कविताओं में और बातचीत में भी अपनी पत्नी की बड़ी निंदा करते थे। इस ढंग से करते थे जो उनको नहीं करना चाहिए था। ये सुनकर फ़िराक़ साहब के बारे में ख़राब राय बनती थी और उनकी पत्नी के बारे में अच्छी राय बनती थी। ऐसा लगता था फ़िराक़ साहब के बारे में कि मान लो एक आदमी है, जिसकी बड़ी आकांक्षाएँ हैं, जो बहुत सौंदर्य प्रेमी है और उसका जीवन उसकी आकांक्षाओं के अनुरूप हुआ हो। फ़िराक़ साहब इसका सारा दोष शायद अपनी पत्नी को देते थे। जैसे वही इन सब बातों के लिए ज़िम्मेदार हो। मुझे बड़ा ताज्जुब होता था, अब भी होता है कि इतना संवेदनशील कवि अपनी सारी बुराइयों, सारी विपत्तियों के लिए ज़िम्मेदार अपनी पत्नी को मानता था। एक बार भी ये नहीं सोचते थे कि इसमें उनकी पत्नी का क्या दोष है। वो कवि जो दूसरों की भावनाओं के बारे में सोच सके, इस दुनिया के बारे में सोच सके, वह इंसान ही नहीं होगा, कवि तो क्या होगा। फ़िराक़ साहब के व्यक्तित्व के कई आयाम हैं, जिनमें से कुछ के लिए उनका बचाव नहीं किया जा सकता। मैंने ऐसे कई लोगों को देखा है जो फ़िराक़ साहब के समान ही अच्छे थे बल्कि, उनसे ज़्यादा अच्छी शक्ल-सूरत के थे और जिनकी बीवियाँ फ़िराक़ साहब की पत्नी से, फ़िराक़ साहब के ही शब्दों में ज़्यादा बदसूरत थीं। लेकिन उन्होंने अपने जीवन में बड़े अच्छे ढंग से निर्वाह किया। इलाहाबाद में ही थे दास बाबू। बहुत सुंदर थे। बड़ी-बड़ी आँखें, सलोने जिनके बारे में फिर कभी लिखूँगा। लेकिन उनकी पत्नी उनकी तुलना में कहीं नहीं थीं। फ़िराक़ साहब ने ख़ुद एक बार मुझे कहा कि- देखो दास को, उसकी ज़िंदगी नरक नहीं बनी और मेरी ज़िंदगी नरक बन गई।

    अहमद साहब फ़िराक़ साहब के बहुत नज़दीक थे। वे उनके व्यक्तित्व के इस आयाम के आलोचक भी हैं। उन्होंने बताया कि फ़िराक़ साहब की बीवी अच्छी थीं। देखने सुनने में और वे कभी-कभी फ़िराक़ साहब को कोसती भी थीं। फ़िराक़ साहब उन पर कभी-कभी ज़ुल्म भी करते थे। जैसे, एक बार वे गोरखपुर से आईं। आते ही जैसे ही सामान नीचे रखा तो फ़िराक़ साहब ने पूछा कि मरिचा का अचार लाई हो? वे लाना भूल गईं थीं। तो फ़िराक़ साहब ने उसी वक़्त उनको लौटा दिया और कहा कि जाओ मरिचा का अचार लेकर आओ गोरखपुर से, भूल कैसे गई तुम? और कभी-कभी जब वे ग़ुस्से में आती थीं तो कहती थीं कि तुम पहले अपना थोबड़ा तो देख लो कैसे हो? वे दबती नहीं थीं। कहने का मतलब ये है कि कल्पना में कोई रूपसी चाहते रहे होंगे फ़िराक़ साहब जो उनको नहीं मिली। एक बार सबके बीच में फ़िराक़ साहब ने बड़े ज़ोर से कहा कि- I am not a born homosexual, it is my wife, who has made me homosexual. तो मुझे लगता है कि अपनी कमज़ोरियों को छिपाने के लिए वे अपनी पत्नी को बलि का बकरा बनाते थे। उनकी बीवी तो सबके सामने आकर बातें कह नहीं सकती थीं। इसलिए फ़िराक़ साहब अपने सारे दोषों के लिए अपनी बीवी को ज़िम्मेदार ठहराते थे।

    पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी कहा करते थे कि जो अभाव होता है वह विभाव बन जाता है। फ़िराक़ साहब की रुबाइयों का एक संकलन है 'रूप'। उसमें एक ऐसी घरेलू औरत या गृहिणी है, जो सुगृहिणी है, सुंदर है, बच्चे हैं उसके, पति को संतुष्ट रखती है, घर को ठीक-ठाक रखती है। शायद ये सब फ़िराक़ साहब अपनी बीवी से चाहते थे। जिस रूप में पत्नी की वे कल्पना करते थे वह शायद कविता में ही उभर सकती थी। शायर जो ज़िंदगी में नहीं पाता उसे कविता में पाने की कोशिश करता है। मुझे ऐसा लगता है कि इस तल्ख़ी और कमी से फ़िराक़ साहब आत्मविज्ञापन का भी काम लेते थे। कभी-कभी बहुत हास्यास्पद और अविश्वसनीय ढंग से वे अपने दुःख को इतना बड़ा बनाकर पेश करते थे जिसको मुक्तिबोध ने कहा है कि 'दुखों के दाग़ों को तमगों-सा पहना' और जिसके लिए परसाई ने 'करुणा चुराना' लिखा है। फ़िराक़ साहब की इस प्रवृत्ति के बारे में उर्दू के नक़्क़ादों ने भी कहा है कि वे अपने दुःख को बहुत बढ़ा-चढ़ा के पेश करते थे। एक बार फ़िराक़ साहब ने कहा कि साहब राम का जो वनवास था वो मेरे दुःख के सामने... उन्होंने बहुत गंदे शब्द का प्रयोग किया जिसका मतलब था कि बहुत छोटा है। यह प्रवृत्ति उसी बात के मेल में ही है जिसे फ़िराक़ साहब कहते थे कि इस समय मैं एशिया का सबसे बड़ा शायर हूँ। या अगर मुझे नोबेल पुरस्कार मिल जाए तो उसे मैं छूऊँगा भी नहीं। तो उनका ऐसा व्यक्तित्व था जिसके बारे में डॉ. रामविलास शर्मा ने मुक्तिबोध पर लिखते हुए लिखा है कि अपने को सबसे बुरा मानना और अपने को सबसे अच्छा, ये वस्तुतः व्यक्तिवाद के सिक्के के ही दोनों पहलू हैं। तो मेरा उनके बारे में यह कहना है कि मूल रूप से उनका संबंध एक संस्कारी, कुलीन, पढ़े-लिखे, संभ्रांत परिवार से था लेकिन उनकी महत्त्वाकांक्षाओं, असंतुलित महत्त्वाकांक्षाओं ने उनको शायर लेकिन कमतर इंसान बना दिया।

    फ़िराक़ साहब मिलनसार थे। उनमें वाग्विदग्धता थी, वे हाज़िरजवाब और ‘विटी’ थे। अपने बारे में उल्टा-सीधा प्रचार वे ख़ुद करते थे। इन सबसे से वे आत्मविज्ञापन का काम लेते थे। नाम अभी मैं याद नहीं कर पा रहा हूँ, लेकिन उर्दू के किसी आलोचक या शायर ने ये बात कही तो मुझे बड़ी अच्छी लगी। किसी ने कहा कि फ़िराक़ साहब ग़ालिब की कोटि के कवि हैं। तो जवाब देते हुए उर्दू के उस नक़्क़ाद ने कहा कि हाँ एक मतलब में ग़ालिब की कोटि के शख़्सियत हैं लेकिन फ़र्क़ यह है कि ग़ालिब और उनकी शायरी दोनों के बारे में बातें होती हैं। ग़ालिब के बारे में जो लतीफ़े हैं, किंवदंतियाँ हैं, वे भी बड़े अच्छे हैं, उनसे मनोरंजन होता है, लेकिन उनकी शायरी पर ज़्यादा बात होती है। लगता है कि उनकी शायरी, उनके बारे में प्रचलित किंवदंतियों से बहुत बड़ी है। जबकि फ़िराक़ साहब के बारे में उल्टी बात है। यानी ग़ालिब के यहाँ शायरी प्रमुख है और लतीफ़े, किंवदंतियाँ हाशिए पर हैं और फ़िराक़ साहब के यहाँ उनके ही द्वारा प्रचारित चुटकुले आत्मविज्ञापन प्रमुख हो गए हैं। मुझे लगता है कि यह स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि फ़िराक़ साहब भी बड़े शायर हैं।

    फ़िराक़ साहब से मिलना, उनसे बात करना शिक्षाप्रद भी होता था। ज्ञानवर्धक भी होता था। जब तक आप उनके साथ रहें, वे ही ज़्यादा बोलते थे। ऐसा होता था कि आप केवल उन्हें सुनें। यह पता नहीं होता था कि किस अवसर पर बहुत आला दर्जे की बात कह दें, एक दार्शनिक की तरह बात करें, आपको लगे कि ये आदमी तो सुक़रात, अरस्तू और बुद्ध की तरह बोल रहा है और किस अवसर पर एकदम से ये लगे कि ये आदमी तो बहुत अश्लील कमीना और ओछा है। आप इसे सह नहीं सकते। वे क़िस्से बहुत सुनाते थे। अक्सर वे क़िस्से अश्लील होते थे। कभी-कभी तो बहुत भदेस क़िस्से होते थे। ऐसे भी होते थे कि सुनकर आप हँसते-हँसते लोटपोट हो जाएँ। उस समय आप उनकी शायरी को भूल जाएँ, एक शायर क्या बात कर रहा है ये भी भूल जाएँ। मैं हिम्मत करके जो शायद सबसे कम अश्लील और ग्राम्य क़िस्सा है, नमूने के तौर पर आपको सुनाऊँ। एक बार हम लोग बैठे थे। फ़िराक़ साहब खाना-वाना खाकर आए। बैठे तो उनको वायुविकार हुआ, जिसको हम लोग बोलने में पादना कहते हैं। तो पादे फ़िराक़ साहब। हम लोगों के चेहरे पर मुस्कान गई। फ़िराक़ साहब ने इस पर एक क़िस्सा सुनाया। वो ऐसा क़िस्सा है कि खुशवंत सिंह की पूरी किताब में ऐसा क़िस्सा नहीं होगा। उन्होंने बताया कि ये क़िस्सा हमारी तरफ़ चलता है। क़िस्सा ये है कि, एक आदमी था। वो चोर से बहुत डरता था। बनिया था, उसके पास पैसा था। इसलिए रात को सोते समय चोर से बहुत डरे। उसने सोचा कि मुझे नींद भी नहीं आती, मैं चोरों से इतना डरता हूँ। क्या करूँ? तो उसने गौरा-पार्वती... गौरा-पार्वती हमारे यहाँ क़िस्से में आती हैं जिसका मतलब है पार्वती, तो उस आदमी ने गौरा-पार्वती और शंकर की तपस्या की और वरदान माँगा। वरदान में माँगा कि कुछ ऐसा कीजिए जिससे मुझे चोर से डर लगे, मैं बिल्कुल निश्चिंत होकर के सोऊँ। तो गौरा- पार्वती ने उसे वरदान दिया कि जाओ अब तुम बेफ़िक्र होकर सोओ, तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ सकता। उसने पूछा कि क्या होगा? तो गौरा-पार्वती ने कहा कि होगा ये कि जब तुम सोओगे तो तुम तो सोते रहोगे, तुमको पता नहीं चलेगा, लेकिन तुम पादते रहोगे और उस पादने में ज़ोर से आवाज़ निकलेगी- कौन है? क्या है? ख़बरदार! फ़िराक़ साहब अपना जाम लेते हुए और सिगरेट पीते हुए ये क़िस्सा सुना रहे हैं और लगभग अवधी में सुना रहे हैं, अवधी और भोजपुरी मिश्रित जो गोरखपुर वाली भाषा है उसमें, जैसे उन्होंने कहा कि 'जाओ तू बिल्कुल निश्चिंत होकर के सोवो और तुम पादोगे तो उसमें से निकलेगा- कौन है? क्या है? ख़बरदार! आवाज़ ज़ोर-ज़ोर से आती रहेगी। और साहब ये बड़ा वो हो गया कि वो सोवै और पता चलै कि मोहल्ले भर की रक्षा। अब साहब बड़े ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ आए, चोर सब डरैं। तो उनमें जो बड़का चोर था, चोरों के दल का मुखिया, वो आया और उसने देखा और कहा कि अरे, ये साला तो सो रहा है। तो अब क्या किया जाए? तो बड़के चोर ने कहा कि मैं अभी इसका तरीक़ा सोचता हूँ और उसने ये काम किया कि एक कागज़ की बड़ी भारी-सी कोई पुंगी बनाई और उसके गुदाविवर में लगा दिया। ज़ाहिर है फ़िराक़ साहब ने गुदाविवर नहीं कहा था उसका तद्भव रूप कहा था। तो जब लगा दिया तो उसका बोलना बंद हो गया। जब उसका बोलना बंद हो गया तो चोरों का दल चोरी करके जाने लगा। तब तक उसके अंदर इतनी ज़्यादा हवा भर गई कि वो पुंगी ज़ोर से छूटी और बड़के चोरवा के सीने में लगी, वो वहीं मर गया। फ़िराक़ साहब ने इस तरह के क़िस्से लोगों को बहुत सुनाए होंगे। वे इसमें रस लेते थे और बड़े क्रिएटिव ढंग से सुनाते थे।

    हिंदी वालों के बारे में वे अक्सर गाली-गलौज के साथ बात करते थे। मैंने ये देखा कि निराला जी के बारे में ज़्यादातर गाली-वाली से बात नहीं करते थे। ये कहते थे कि भई वो तो बड़ा कवि है और क्या है पागल है, And his ‘Juhi ki kali’ is success and his poems on badal are simply wonderful और कहा कि 'विजन वन वल्लरी' ये क्या है वल्लरी-उल्लरी। ख़ैर, निराला तो वो निभा भी ले गया, पंत जी की बड़ी निंदा करते थे। रामकुमार वर्मा को बहुत ही हास्यास्पद ढंग से याद करते थे। महादेवी वर्मा के बारे में भी बहुत अच्छी राय नहीं थी। उनके यहाँ रमेशचंद्र द्विवेदी रहते थे, वही रमेश जिन्होंने फ़िराक़ साहब की जीवनी लिखी है। मैं उनसे वहाँ कई बार मिला हूँ तो रमेशचंद्र द्विवेदी का Viva था, जिसमें द्विवेदी जी और रामकुमार वर्मा आए थे। द्विवेदी जी ने उनसे कहा कि कुछ कविताएँ सुनाओ किसी की। उन्होंने कहा कि साहब मुझे उर्दू के जो कवि हैं फ़िराक़ साहब, उनका एक शेर याद है। उन्होंने शेर सुनाया तो द्विवेदी जी ने कहा कि वाह, भई! ये तो बहुत अच्छा शेर है फ़िराक़ साहब का। ये बात रमेशचंद्र द्विवेदी ने आकर के फ़िराक़ साहब को बताई तो फ़िराक़ साहब द्विवेदी जी के प्रशंसक हो गए। वे द्विवेदी जी के लिए कहते थे कि He is singular figure in Hindi literature. बहुत अच्छा गद्य लिखते हैं। एक बार जब मैंने उनसे कहा कि द्विवेदी जी विश्वविद्यालय से निकाल दिए गए हैं तो उन्होंने वाइस चांसलर को बहुत गाली-वाली दी और कहा कि कहीं से जहर-वहर लाकर पान में मिलाकर वाइस चांसलर को दे दो, साला ख़त्म हो जाए। फिर जब मैंने एक महीने बाद उनसे कहा कि फ़िराक़ साहब द्विवेदी जी को Professorship offer की गई और वे चंडीगढ़ में प्रोफ़ेसर हो गए तो उन्होंने कहा कि बड़ा इक़बालमंद आदमी है। द्विवेदी जी से फ़िराक़ साहब की भेंट एकाध जगह पर हुई है, ऐसा मुझे लगता है क्योंकि जब पंडित जी चंडीगढ़ विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर थे तो फ़िराक़ साहब वहाँ के अंग्रेजी विभाग में भाषण देने गए थे। उस भाषण की अध्यक्षता शायद द्विवेदी जी से कराई गई थी। उसके बाद पंडित जी से मेरी भेंट हुई तो उन्होंने कहा कि फ़िराक़ साहब तुम्हारे बारे में बात कर रहे थे और कह रहे थे कि तुमने कोई कविता पंक्ति उनको सुनाई थी? मैंने पंडित जी से कहा कि वो तो ठीक है पंडित जी, लेकिन फ़िराक़ साहब ने भाषण में इधर-उधर की बातें तो नहीं कीं? तो उन्होंने बताया कि वे हिंदी वालों का विरोध करते रहे। तब मैंने बाद में कहा कि फ़िराक़ साहब मैं कब से हिंदी वाला हो गया और हिंदी की कविता चाहे जैसी हो अब हिंदी के कवि जैसी कविताएँ लिखेंगे वैसी ही तो होगी हिंदी कविता। द्विवेदी जी इस तरीक़े से अक्सर बहुत टकराते नहीं थे। फ़िराक़ साहब की ख्याति से वे सुपरिचित थे और इस मामले में बहुत समझदार आदमी थे। इसलिए फ़िराक़ साहब से क्यों टकराते, सवाल ही पैदा नहीं होता।

    फ़िराक़ साहब की आदत थी कि जो मिलता उससे कहते थे हिंदी की कुछ सरल-सुगम पंक्तियाँ सुनाइए। फ़िराक़ साहब ने मुझसे भी कहा। उन दिनों पंत जी की ये काव्य पंक्तियाँ मुझे बहुत अच्छी लगती थीं, अब भी लगती हैं, वसंत पर हैं ये पंक्तियाँ -

    चंचल पग दीपशिखा के धर

    गृह मगवन में आया वसंत

    सुलगा फागुन का सूनापन

    सौंदर्य शिखाओं में अनंत।

    ये मैंने फ़िराक़ साहब को सुनाई। मुझे ऐसा लगता है इन छोटे-छोटे शब्दों के द्वारा कि जैसे खट्-खट् करके वसंत रहा हो। तो मैंने कहा कि फ़िराक़ साहब, अब आप मुझे उर्दू का कोई शेर वसंत पर, बहार पर बताइए। उन्होंने ग़ालिब का ये शेर सुनाया -

    चमन ज़ंगार है आईना-ए-बाद-ए-बहारी का

    मैंने कहा कि फ़िराक़ साहब इसमें बहार और बसंत कहाँ है? ‘चमन ज़ंगार है आईना-ए-बाद-ए-बहारी’ तो इसमें वसंत तो है ही नहीं। इसमें तो एक बात कही गई है कि दर्पण में निखार बिना मोर्चे के, मैल के नहीं सकता। तो जो बहार है वह पूरा दर्पण है और चमन उसका मोर्चा है, ज़ंगार है। फिर मैंने ये कहा कि इस पर सोचना चाहिए कि जो ऋतुएँ हैं, आकाश है, प्रकृति है, इसका वर्णन संस्कृत साहित्य में बहुत हुआ है और चूँकि हिंदी के पास संस्कृत की पूरी परंपरा और उत्तराधिकार है, इसलिए उसके पास ऐसे बहुत से शब्द हैं जो उर्दू वालों के पास नहीं हैं। तो फ़िराक़ साहब ने वहाँ तो नहीं कहा लेकिन मुझे लगता है कि ये बात उनको याद रही होगी और उन्होंने द्विवेदी जी से कही होगी।

    इसमें कोई शक़ नहीं कि शुरू में वे काफ़ी संतुलित थे, स्वाभिमानी तो वे अंत तक थे ही। उनके द्वारा पी.सी.एस. की नौकरी छोड़कर जेल जाने के बारे में, नेहरू जी से उनकी जान-पहचान आदि के बारे में मैं पहले बता चुका हूँ। उनकी कोई बहुत ऊँची भौतिक इच्छाएँ नहीं थी कि मकान हो जाए, ये हो जाए। वे मरे भी तो उनके पास अपना मकान नहीं था। उसी बैंक रोड वाले विश्वविद्यालय के मकान में रहे आख़िर तक। उसके बारे में भी एक क़िस्सा है। जब वे रिटायर हो गए तो क़ायदे से उनको विश्वविद्यालय का मकान छोड़ देना चाहिए था लेकिन जाएँ कहाँ? जब आर.के. नेहरू वाइस चांसलर हुए तो रिटायर्ड लोगों को कहा गया कि मकान ख़ाली करें जिससे दूसरों को ये बंगले दिए जा सकें। बताते हैं कि एक दिन फ़िराक़ साहब वाइस चांसलर के पास गए और कहा कि देखिए साहब, ऐसा कीजिए कि कोई ऐसी जगह बता दीजिए जहाँ मैं अपना सारा सामान रख सकूँ। आप तो मुझे निकाल रहे हैं। ख़ैर, आर.के. नेहरू ने जब उनके बारे में सुना तो कहा कि नहीं फ़िराक़ साहब जब तक चाहिए तब तक रहिए, कोई नहीं निकालेगा आपको। तो एक तरह की व्यवहारिकता भी फ़िराक़ साहब में थी लेकिन वो व्यवहारिकता भी होती तो फ़िराक़ साहब ज़िंदा कैसे रहते? इसी तरह प्रो. एजाज़ हुसैन ने अपनी आत्मकथा में फ़िराक़ साहब के बारे में एक बहुत अच्छा प्रसंग लिखा है जो उनके व्यक्तित्व की बहुत साफ़ तस्वीर पेश करता है। वह प्रसंग ये है कि एक ज़माने में फ़िराक़ साहब और अमरनाथ झा क्लासफैलो थे। अमरनाथ झा उस ज़माने के विख्यात प्रोफ़ेसर थे। उनका बहुत यश था। सर गंगानाथ झा के सुपुत्र थे जो कहते थे कि मेरी माँ ने मुझे तीन-चार साल की उम्र में ही अमरकोश याद करा दिया था। उनके सामने कोई बोलने की हिम्मत नहीं करता था। सिगार मुँह में दबा के बोलते थे। अमरनाथ झा के यहाँ दरबार लगता था। एजाज़ साहब ने लिखा है कि एक बार फ़िराक़ साहब अपने यहाँ यार-दोस्तों के बीच में बैठे हुए शराब पी रहे थे। तो उन्होंने नशे में आकर अमरनाथ को कुछ गाली-वाली दे दी। अमरनाथ झा वाइस चांसलर थे। दूसरे दिन जब फ़िराक़ साहब का नशा उतरा तो उनको ये लगा कि कल कुछ ऐसे लोग बैठे थे यहाँ जिन्होंने जाकर अमरनाथ झा से मेरी चुगली खा ली होगी। कहीं अमरू नाराज़ हो गए तो क्या होगा? तो बताते हैं कि दूसरे दिन फ़िराक़ साहब अमरनाथ झा के दरबार में पहुँचे। उनसे मिलने कई लोग आते थे, लाईन में इंतज़ार करते थे और जिसका नंबर आता था वह जाकर मिलता था। फ़िराक़ साहब चूड़ीदार और अचकन-वचकन पहन कर गए थे लेकिन जब उनका नंबर आया कि फ़िराक़ साहब अंदर चलिए तो उन्होंने अपने बटन-वटन खोल लिए और बाल इधर-उधर बेतरतीब कर लिए और पहुँचे। अमरनाथ झा ने कहा कि यार फ़िराक़ तुम कपड़े ठीक से पहना करो। बटन-वटन बंद नहीं करके आए, कंघी भी नहीं की, ऐसे ही चले आए। ठीक से रहा करो। अब तुम यूनिवर्सिटी में अध्यापक हो गए हो। तो फ़िराक़ साहब ने कहा कि भाई अमरनाथ बात ये है कि तुम तो सर गंगानाथ झा के सुपुत्र, तुम्हारी माँ ने तुमको सब सिखाया है और तुम इतने बड़े आदमी हो, तुमको सब तौर-तरीक़े, उठने-बैठने का सलीक़ा, रहन-सहन आता है। मेरे माँ-बाप को कुछ आता-जाता नहीं था। दोनों एक नंबर के बेवक़ूफ़ थे, तो मुझे कौन बतावै ये सब। अमरनाथ झा ने कहा कि फ़िराक़ साहब आप निहायत बेहूदे और बदतमीज़ आदमी हैं, अपने माँ-बाप को गाली दे रहे हैं यहाँ बैठकर? फ़िराक़ साहब बोले कि अब मैं किसे गाली दूँगा? आने माँ-बाप को गाली दूँगा, अपनी बीवी को गाली दूँगा, अपने भाई को गाली दूँगा, अपने दोस्तों को गाली दूँगा, आपको गाली दूँगा। किसी ग़ैर को थोड़े ही गाली देने जाऊँगा। तो अमरनाथ झा ने कहा- All right Firaque, I know I know you are my friend. और फ़िराक़ साहब बाहर गए, बटन-वटन ठीक किए, बाल बनाए और घर चले गए।

    जवाहरलाल नेहरू के बारे में कहा कि देखो ये प्रधानमंत्री है और इतना नहीं कि मैं शायर हूँ, इतना इंतज़ाम नहीं कर सकता मेरे लिए कि रोटी पर रखकर लहसुन की चटनी खा सकूँ। इज़्ज़त की ज़िंदगी बसर कर सकूँ। उसको इतना भी ख़याल नहीं है मेरा। और कहा कि लाला लाजपतराय की जैसी हँसी थी वैसी कहाँ है जवाहरलाल नेहरू की? इसके दो-ढाई साल बाद फ़िराक़ साहब को साहित्य अकादमी सम्मान मिला तो पोशाक-वोशाक पहन कर गए फ़िराक़ साहब। जवाहरलाल नेहरू ने उनको सम्मान दिया और कहा कि अरे फ़िराक़ साहब आप इतने बड़े शायर हो गए? तो मैंने कहा कि फ़िराक़ साहब नेहरू जी ने आपको अवार्ड दिया, आपने तो कहा था कि नेहरू बड़े वैसे आदमी हैं? तो उन्होंने कहा कि अरे भाई मैंने वो थोड़ा-सा ड्रैमेटाइज़ कर दिया था बेमतलब का और जवाहरलाल नेहरू की क्या बात है।

    जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु पर जो लेख फ़िराक़ साहब ने लिखा वह अद्भुत है। जवाहरलाल नेहरू पर इतना अच्छा लेख बहुत कम लोगों ने लिखा है। उन्होंने लिखा कि नेहरू परिवार के लोग बहुत चरित्रवान लोग हैं। ये भी बताया कि जब नेहरू जी और जयप्रकाश नारायण के बीच कोई विवाद हुआ था तो उसमें फ़िराक़ साहब ने जवाहरलाल नेहरू को सपोर्ट किया था। नेहरू जी ने The stupidity of Hinduwalas या ऐसा ही कुछ कह दिया था जिसका जयप्रकाश ने विरोध किया तो फ़िराक़ साहब ने कहा कि चूँकि जयप्रकाश नारायण ने अंग्रेजी मिडिल से पढ़ी है इसलिए उनको stupidity के अर्थ का ठीक से पता नहीं है। stupidity का मतलब अंग्रेजी में इतना बुरा नहीं होता जितना वो समझ रहे हैं।

    गांधी जी, मालवीय जी, जवाहरलाल नेहरू, अमरनाथ झा इन सबका अंदर से बहुत सम्मान करते थे फ़िराक़ साहब। ड्रामाबाजी भी करते थे, आत्मविज्ञापन भी करते थे। एक बार फ़िराक़ साहब बातचीत कर रहे थे जिसमें बी.एच.यू. की बड़ी बुराई कर रहे थे और इलाहाबाद विश्वविद्यालय की बड़ी तारीफ़। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के लिए कहा कि देखिए यहाँ से कौन लोग हुए- गंगानाथ झा, सर शफ़ात, रामप्रसाद, मेघनाथ साहा, डॉ. ताराचंद। मैंने थोड़ा सा ह्यूमर करने के लिए कहा कि और आप फ़िराक़ साहब। तो बोले ख़ामोश रहिए, इस वक़्त मैं अपने से पचास गुना ज़्यादा बड़े आदमियों की फ़ेहरिस्त बना रहा हूँ। तो कुल मिलाकर फ़िराक़ साहब का व्यक्तित्व बड़ा जीवंत था जिसे आप कहेंगे अविस्मरणीय।

    आप जानते हैं कि फ़िराक़ साहब अपनी कुछ हरकतों के लिए बहुत बदनाम थे। मैंने उनमें ऐसा कोई दोष नहीं देखा। एक बार मैं उनके यहाँ शाम को सात-आठ बजे गया। वे बैठे पी रहे थे। पीने के बाद पता नहीं वे किस मूड में आए और मुझसे कहा, बेटा अब तुम घर जाओ और मैं तो बहुत लुटा-पिटा इंसान हूँ, बहुत टूटा इंसान हूँ। उस दिन मैं सचमुच उनके पास देर तक रहना चाहता था क्योंकि ससुराल में बीवी से झगड़ा-वगड़ा करके गया था। तो मैंने कहा कि फ़िराक़ साहब आज मैं बीवी से झगड़ा करके आया हूँ और सोचता था कि देर तक यहाँ रुकूँगा। तो वे बोले, अरे! तब क्या है लुंगी पहन लो और जाओ हगो-मूतो, बल्ब फोड़ो, कसरत करो और मैं सोने जा रहा हूँ। उस दिन वे लगभग रोने लगे और बड़े सभ्य ढंग से बोले कि मैं तो उस परिवार का हूँ जहाँ दूसरों की तकलीफ़, दूसरे की हँसी और दूसरे का ग़म सिखाया जाता था कि वह क्या होता है। मेरी ज़िंदगी ऐसी हो गई। ठीक है बेटा तुम जाओ और जब तक चाहो तब तक रहो, मैं सोने जा रहा हूँ। उन्होंने रमेश को बुलाया और कहा कि देखो ये पंडित जी हैं, इनको खाना खिला देना। जब मैं खाना खाने लगा तो आए, झाँककर देखा और बोले कि वो जो केरवा है, हमारे यहाँ केला को केरवा कहते हैं, वो भी खिला देना इनको। इसके बाद कहा कि और किसी दिन आना तुम तो हम तुम्हें और चीज़ें खिलाएँगे। इस तरह से फ़िराक़ साहब में कुलीनता और औदात्य का भाव भी था। उनका व्यक्तित्व बहुत जटिल था अच्छाइयों-बुराइयों के संयोग से जटिल।

    फ़िराक़ साहब जब कोई क़िस्सा सुनाते थे तो बहुत तन्मय हो जाते थे। बहुत ही क्रिएटिव ढंग से क़िस्सा सुनाते थे वे। बीच में अगर ज़रा भी खटका पैदा हो जाए या बीच में कोई दूसरी बात कर दे तो वे तुनक जाते थे, फिर कहानी सुना ही नहीं पाते थे। वे हिंदू और मुसलमान दोनों की हँसी उड़ाते थे। एक बार वे किसी मौलवी की नक़ल कर रहे थे कि वह कैसे बोलता है तो फ़िराक़ साहब के अनुसार मौलवी साहेब बोल रहे हैं कि ये जौन जिबराइल रहे, ये अल्लाह के चिट्ठी लावत रहे हज़रत मोहम्मद के पास, मोहम्मद साहेब के पास। तो मोहम्मद साहेब पढ़ते कैसे? क्योंकि मोहम्मद साहेब तो थे उम्मी। वहाँ रमेश बैठे थे, उन्होंने बीच में कहा कि हाँ साहब वो उम्मी थे, उम्मी माने जाहिल। अब इस पर फ़िराक़ साहब बिगड़े। बोले कि किसी मुसलमान के सामने कह मत दीजिएगा उम्मी माने जाहिल, नहीं तो आपका क़त्ल कर देगा और फिर आपकी ख़ैरियत नहीं है। जाहिल का मतलब सिर्फ़ अनपढ़ ही नहीं होता, जाहिल माने कमीना भी होता है। इसके बाद बहुत कोशिश की गई लेकिन फ़िराक़ साहब ने वो क़िस्सा नहीं सुनाया। कहा कि अब मैं नहीं सुना सकता, सब ख़त्म हो गया। बोले कि, मैं तो ऐसा आदमी हूँ कि जब शेरो-शायरी के मूड में होता हूँ तो बकरी से, कुत्ते से, गधे से, बेहूदा इंसानों से, बदसूरत लोगों से, जिनकी आवाज़ ख़राब है उनसे, ऐसे लोगों से बहुत दूर रहता हूँ। क्योंकि मैंने शेर सोचना शुरू किया, कोई शेर मेरे दिमाग़ में आया और उधर से साला एक कुत्ता भौं से बोल दिया तो मेरा शेर तो गया, बकरी मेंऽऽऽ कर देगी तो मेरा शेर खा गई। मैं शेर सोच रहा हूँ और मान लीजिए एक कोई ऐसा करीहतरमंज़र दिखलाई पड़ जाए तो मैं तो गुम हो जाऊँगा क्योंकि Beauty is good, beauty is deep, but ugliness is deeper. फ़िराक़ साहब के बोलने में क्रिएटिविटी तो होती थी लेकिन कितना पोज़ होता था ख़तरनाक सीमा तक या कितना आत्मौचित्य का भाव होता था इसका पता लगाना मुश्किल था।

    खड़ी बोली हिंदी से पहले की कविता- अवधी की, ब्रजभाषा की विशेष रूप से भक्ति कविता, ख़ास तौर पर तुलसीदास और कबीर की कविता के फ़िराक़ साहब बड़े प्रशंसक थे। फ़िराक़ साहब गोरखपुर के थे। उन्होंने तुलसीदास के बारे में बात करते हुए बताया कि जब मैं बहुत छोटा था तभी से गीता प्रेस गोरखपुर से रामायण छपती थी, जिसकी क़ीमत दुअन्नी थी। तो मैं एक दिन रामचरितमानस ख़रीद लाया। उसे मैंने पढ़ा तो लगा कि संसार में जितना भी भौतिक सौंदर्य है, उसे तुलसीदास ने देख लिया था। उसका अनुभव कर लिया था, तुलसीदास इतने ऊँचे और विशाल मेहराब हैं जिनके नीचे से सिर झुकाकर ही जाना चाहिए यदि कोई कविता करना चाहता है तो। अगर वो तुलसीदास बनना चाहेगा तो वो पागल हो जाएगा, कविता कभी नहीं कर सकता। इसलिए तुलसीदास को प्रणाम करके ही कवि बनने की कामना करनी चाहिए। तुलसीदास के विषय में फ़िराक़ साहब के विचार निराला से मिलते थे। फ़िराक़ साहब तुलसीदास की इस अर्द्धाली को पढ़कर उसका अर्थ और महत्त्व बताते थे-

    सियाराममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुगपानी।

    फ़िराक़ साहब कहते थे कि ये एक पूरा वाक्य है। सियाराममय सब जग जानी में 'जानी' पूर्वकालिक है, यानी सारे जगत को सियाराममय जान करके दोनों हाथ जोड़ के मैं प्रणाम करता हूँ। यह एक जटिल वाक्य विधान है जिसका निर्वाह इस अर्द्धाली में तुलसीदास ने किया है। इस तरह भक्त कवि वाक्य-विधान पर बहुत ध्यान देते थे। बातचीत में फ़िराक़ साहब भी यह ध्यान रखते थे। उन्होंने हिंदी कवियों का मज़ाक उड़ाते हुए और उनको उपदेश देते हुए एक कविता लिखी थी। उसकी एक पंक्ति थी -

    पूरी शुद्ध क्रियाएँ लिखिए शब्दों का क्रम रखिए ठीक

    संस्कृत शब्दों का अनावश्यक प्रयोग नहीं करना चाहिए कहते हुए उन्होंने लिखा-

    आप संस्कृत नहीं जानते मुझको तो इतना ही दिखाए।

    सुना नहीं है आपने कवि जी अधजल गगरी छलकत जाए?

    कबीर के बारे में बोलते हुए बताते थे कि जो कवि जनभाषा में कविता लिखता है वह ग़लत तो लिख ही नहीं सकता। अगर चाहे तब भी ग़लती नहीं कर सकता। जैसे कोई बच्चा बोलते समय चाहे तब भी भाषा के संगठन में ग़लती नहीं कर सकता। भाषा सहज रूप से आती है उसकी। वे एक उदाहरण देते थे कि 'केकर मानों बात कोठरिया में दुइ जन बोलैं' इसमें ग़लती कहाँ होगी? ग़लती का कोई सवाल ही नहीं पैदा होता।

    हिंदी की खड़ी बोली के कवियों में वे पं. रामनरेश त्रिापाठी के प्रशंसक थे। अनुमानतः दोनों जेल में साथ थे। पं. रामनरेश त्रिपाठी और फ़िराक़ साहब। दिनकर की कविताओं के बारे में उनका कहना था कि इनका वाक्य ठीक रहता है। मैंने उनसे पं. रामचंद्र शुक्ल की चर्चा की तो उन्होंने कहा कि हाँ, पं. रामचंद्र शुक्ल का इतिहास बहुत अच्छा है और वे बहुत सावधानी से वाक्य लिखते थे। फ़िराक़ साहब भवानीप्रसाद मिश्र का भी नाम लेते थे। वे कहते थे कि कभी ऐसा कवि सम्मेलन किया जाए जिसमें हिंदी और उर्दू के लोग हों, ऐसी कविताएँ पढ़ें जिनके वाक्य ठीक हों, समझ में आएँ लोगों को। ऐसे कवि सम्मेलन में भवानीप्रसाद मिश्र को भी होना चाहिए, यह उनका विचार था।

    फ़िराक़ साहब के यहाँ बड़े लोगों से मेरी मुलाक़ात कम हुई है। लेकिन एक बार मैं उनके यहाँ गर्मियों के दिन, दुपहर को गया। तो थोड़ी देर में मजनू गोरखपुरी आए! वे एक पुराने ढंग की डब्बानुमा कार में आए थे। मुझे लगता है कि यह कार उन्हें इलाहाबाद के किसी मित्र ने दी होगी। मजनू गोरखपुरी तब हिंदुस्तान में ही थे, पाकिस्तान नहीं गए थे। फ़िराक़ साहब उन्हें अंदर लेकर गए, मुझसे कहा कि आइए पंडित जी आप भी आइए। मैं भी गया। फ़िराक़ साहब ने अपने लिए और मजनू गोरखपुरी के लिए शराब डाली। वो कोई अच्छी शराब रही होगी, ठर्रा नहीं थी। उसका रंग बिल्कुल सुनहरा था जैसा कि फ़िराक़ साहब ने अपने एक शेर में कहा है कि जैसे अशर्फ़ियाँ पिघला दी गई हों, ऐसा रंग था उसका। उन्होंने हाफ़ फ्राई ऑमलेट बनवाई और छोटी-छोटी पूरियाँ गोलगप्पे जैसी बनवाईं। ज़ाहिर है उन्होंने मुझे शराब दी और ही ऑमलेट दिया। लेकिन पूरियाँ और उसके साथ आलू की सब्जी दी। फ़िराक़ साहब ने मेरा परिचय मजनू साहब से कराया कि ये संस्कृत का विद्यार्थी है। पढ़ने-लिखने वाला लड़का मालूम पड़ता है। मजनू साहब ने मुझसे पूछा कि तुम किस पर पी.एचडी कर रहे हो और किसके साथ कर रहे हो? तो मैंने बताया कि मैं द्विवेदी जी के साथ काम कर रहा हूँ और पुरानी अवधी पर काम कर रहा हूँ। मजनू गोरखपुरी ने बताया कि शेरिफ ने अवधी पर काम किया था उसे देख लेना, हिंदी अदब की तारीख़ में उनका बहुत बड़ा काम है। फ़िराक़ साहब ने तारीख़ को तारीफ़ सुना और बोले कि भई ये यहाँ पर अदब की तारीफ़ से क्या मतलब है? मजनू साहब ने कहा कि नहीं, मैंने तारीफ़ नहीं कहा है, तारीख़ कहा है। तो फ़िराक़ साहब बोले कि हाँ, ये जो हिंदी के लोग हैं वो ये काम करते हैं कि जो पूरा साहित्य है उस साहित्य को एक व्यवस्थित चिंतन का रूप देते हैं, व्यवस्थाबद्ध करते हैं और इतिहास लिखते हैं। जैसे आ. रामचंद्र शुक्ल ने इतिहास लिखा है। उर्दू वाले ये काम नहीं कर पाते, उर्दू में ये काम नहीं हुआ है। मैं थोड़ी देर बाद चला आया। वे लोग बैठकर खाते-पीते रहे होंगे। इसके बाद मजनू साहब से मेरी भेंट नहीं हुई।

    एक बार फ़िराक़ साहब के यहाँ मेरी भेंट पद्मकांत मालवीय से हुई। तब तक पद्मकांत मालवीय का मैंने सिर्फ़ नाम सुन रखा था। बूढ़े थे काफ़ी। पान बहुत खाते थे। बहुत सुंदर थे। दाँत उनके नहीं थे। पोपले मुँह से बहुत अच्छा पान खाते थे। उसकी ख़ुशबू आती थी। साफ़-सुथरा कुर्ता-धोती, सदरी और तिलक-टीका लगाए हुए। थोड़ी देर फ़िराक़ साहब से बहुत आत्मीयता से बात की, उसके बाद चले गए। फ़िराक़ साहब ने मुझसे कहा कि देखो ये आदमी कितना अच्छा गद्य बोलता है और ये इतना अच्छा गद्य लिखता है कि उतना अच्छा गद्य मैं नहीं लिख सकता, मैं तो इससे ईर्ष्या करता हूँ कि ये कितना अच्छा हिंदी गद्य लिखता है।

    निराला जी से फ़िराक़ साहब की मुठभेड़ के चर्चे बहुत थे। लेकिन फ़िराक़ साहब ने जो बताया वो ये कि निराला जी उनके यहाँ आते थे और अपने साथ बोतल लाते थे और फ़िराक़ साहब का कहना था कि मैं अपने यहाँ पूरी और गोश्त बनवाता था। अब मैंने पूरी और गोश्त ख़ुद खाया है, किसी को खाते देखा है और सुना है। लेकिन मुझे याद है कि फ़िराक़ साहब ने यही कहा था कि पूरी और गोश्त मैं बनवाता था और हम दोनों लोग पीते थे, खाते थे, बातचीत करते थे। कभी-कभी झगड़ा भी हुआ था ये भी फ़िराक़ साहब ने बताया, लेकिन ज़ाहिर है कि पूरी बात फ़िराक़ साहब ने नहीं बताई। कुछ बातें इधर-उधर सुनाई पड़ीं, जैसे रामविलास जी ने बताया कि दोनों आपस में बातचीत करते थे, सवाल-जवाब करते थे, उसमें इतनी अश्लीलता होती थी जिसे बताया नहीं जा सकता। एक बात ज़रूर बताई कि निराला जी और फ़िराक़ में झगड़ा होता था तो निराला जी ने एक बार चिढ़कर कहा कि साले बहुत शायरी छाँटोगे तो मुसरा खड़ा करेंगे हम। अब इस मुसरा का क्या मतलब है हम नहीं जानते। मेरा ख़याल है कि इसमें श्लेष है। एक तो मुसरे का अर्थ होता है उल्टा खड़ा कर देना, सर के बल खड़ा कर देना और दूसरा कुछ और भी अर्थ हो सकता है, जो व्यंजित है। हिंदी उर्दू पर निराला जी और फ़िराक़ साहब काफ़ी बहस करते थे, झगड़ा करते थे। हमने सुना है कि एक बार मारपीट भी हुई है। वैसे ज़्यादातर निराला जी मारपीट नहीं करते थे। लेकिन काशी विश्वविद्यालय में मेरे हिंदी के अध्यापक थे डॉ. श्रीकृष्णलाल। उन्होंने एक बार बताया कि एक गोष्ठी में, जिसमें निराला जी भी थे, फ़िराक़ साहब ने कहा कि देखिए 'चाँद सितारों की जाली बुनकर रख देते हैं' में पाँच क्रियाएँ हैं। तो पाँच क्रियाओं की ये जो संयुक्त क्रिया बनी है, ऐसा अगर चंदबरदाई से लेकर निराला तक किसी भी हिंदी के कवि ने किया हो तो मैं उसकी टाँग के नीचे से निकल जाऊँ। फ़िराक़ साहब बोलने में नाटक भी करते थे। तो जब उन्होंने कहा कि टाँग में से निकल जाऊँ तो गोष्ठी में उठकर के खड़े हो गए और निकलने की मुद्रा में झुके। कहते हैं कि निराला जी ने उनके कटिपश्चात भाग पर ज़ोर से एक लात मारी और चले आए।

    फ़िराक़ साहब का कहना था कि संयुक्त क्रियाएँ खड़ी बोली की बहुत बड़ी शक्ति हैं। खड़ी बोली, संयुक्त क्रियाओं में जितनी अर्थ-छायाएँ प्रकट करती हैं, संसार की किसी भाषा में उतनी संयुक्त क्रियाएँ (Compound Words) नहीं बना सकते। वे अक्सर उदाहरण देकर ये बात कहते थे, जैसे- ये कलम मेरे हाथ से छूट गई- छूट पड़ी- मैंने छोड़ दी- छुट गई। मैंने उसको मारा- मैंने उसको मार डाला- मैंने उसको मार दिया- मैंने उसको मार के रख दिया। वे कहते थे इन सबकी छायाएँ अलग-अलग हैं। वे भाषा की अर्थ-छायाओं के बारे में बहुत तन्मय होकर बातें करते थे। एक बार पूछा कि आप लोग हिंदी वाले हैं, कान का जो निचला सिरा होता है उसको क्या कहते हैं, बताइए? तो वे बताते थे कि देखिए इसको कान की लौ कहते हैं। कहा कि ओठों के जो किनारे होते हैं इनको क्या कहते हैं, बताइए? तो कहते थे कि इनको ओठों के कोर कहते हैं। ये कहते थे कि कमर के इधर से जो थोड़ी-सी ख़ाली जगह होती है पेट और कमर के बीच, इसको क्या कहते हैं? तो कहते थे कि कमर का कटाव कहते हैं। कहते थे कि एक ऐसी औरत है जो किशोरी अब नहीं रह गई है और जवानी भी बस अब जाने को है, तो उसे क्या कहेंगे आप? तो उसको कहेंगे कि ये औरत उतार पर है।

    हिंदी और उर्दू भाषा के बारे में, कवियों के बारे में, फ़िराक़ साहब एकांगी हो सकते हैं, सही भी हो सकते हैं और ग़लत भी हो सकते हैं, लेकिन वे बहुत निष्पक्ष ढंग से बातें करते थे। फ़िराक़ साहब हिंदू थे लेकिन उर्दू वाले और मुसलमान उर्दू वाले कहते थे कि फ़िराक़ साहब को कैसे हिंदू कहा जाए? उनको देखकर कहा ही नहीं जा सकता था कि वे हिंदू हैं कि मुसलमान। आप चाहें तो उन्हें धर्मनिरपेक्ष कहिए या सचमुच भारतीय तथा हिंदुस्तानी के रूप में देखें। उनमें किसी तरह की तंगनज़री या संकीर्णता नहीं थी। मैं सदाचार की बात नहीं कर रहा हूँ लेकिन जहाँ तक सब धर्मों को समान समझने की बात है वहाँ तक फ़िराक़ साहब, कबीरदास की परंपरा में आते थे। कबीरदास की परंपरा ये नहीं है कि आप हिंदू होकर हिंदू मुसलमान को बराबर समझें, बराबर से मतलब ये है कि आप हिंदू को भी गाली दे सकते हैं और आप मुसलमान को भी गाली दे सकते हैं। जो सच्ची बात है उसे आप कह सकते हैं।

    फ़िराक़ साहब संस्कृत भाषा तथा संस्कृत कविता के बारे में बहुत ऊँचा ख़याल रखते थे। ये अहसास उनको हमेशा सताता था कि वे संस्कृत नहीं जानते। एक जगह तो उन्होंने लिखा भी है कि जब मुझे ख़याल आता है कि मैं संस्कृत नहीं जानता तो मैं आत्महत्या क्यों कर लूँ? हालाँकि जब एक बार मैंने उनसे इस विषय पर पूछा तो उन्होंने कहा कि नहीं- नहीं ऐसा मैंने नहीं लिखा। लेकिन उन्होंने ये लिखा है, मैंने पढ़ा है। संस्कृत की कविता के बारे में, उसकी ध्वनि-व्यंजना और नाद-योजना के बारे में वे बड़ी इज़्ज़त से बातें करते थे।

    उर्दू कवियों में, मैंने उनके मुँह से ग़ालिब के अश्आर बहुत कम सुने हैं। ग़ालिब के बारे में बात करते हुए भी उनको कम पाया है। ये क़रीब-क़रीब वैसी ही बात है जैसे मुक्तिबोध, निराला के बारे में बहुत कम बात करते हैं, जैसे, उनको ऐसा धनुष समझते हों जिसको उठाना बहुत मुश्किल है। ग़ालिब का एक शेर फ़िराक़ साहब ने मुझे सुनाया जिसका उल्लेख मैं पीछे कर चुका हूँ। कभी-कभी ये कहते थे कि जैसे बोल्ड मेटाफर और इमेजिज़ मैंने दिए हैं वैसे ग़ालिब नहीं दे सकते थे। तो कहीं कहीं वे ग़ालिब से टकराते थे। उनके मन में ग़ालिब को लेकर कोई कोई छिपी हुई आकांक्षा थी। वे यह भी कहते थे कि शेर कहने का जैसा तरीक़ा मोमिन के पास था वैसा ग़ालिब के पास नहीं था। वे मोमिन के बड़े प्रशंसक थे, ग़ालिब के प्रशंसक तो रहे ही होंगे। मुसहफ़ी की भी बहुत तारीफ़ करते थे। यगाना चंगेज़ी पर उन्होंने लेख लिखा। अपनी किताब 'उर्दू कविता पर बातचीत' में आसी गाज़ीपुरी, रियाज़ ख़ैराबादी, एक कोई थे गौहर गोरखपुरी इन लोगों के शेर बहुत उद्धृत किए हैं। मेरे ख़याल से ये पूर्वी उत्तर प्रदेश के अल्पज्ञात कवि हैं। एक ग़ज़ल में मख़्दूम की तारीफ़ की और मख़्दूम की ज़मीन पर ख़ुद एक ग़ज़ल भी उन्होंने कही- केशों को और भी चमकाओ कि कुछ रात कटे।

    फ़ैज़ की रक़ीब वाली नज़्म के बारे में तो उन्होंने लिखा है कि ये एक ऐसी नज़्म है जिसमें मेरे दिल का चोर निकलता है। दिल का चोर निकलने का मतलब है- ऐसा मैं कहता तो मुझे बहुत अच्छा लगता। इक़बाल के वे प्रशंसक नहीं थे। दिक्कत ये है कि जो बातें मैं आपसे कह रहा हूँ, उनमें से कई बातें ऐसी हैं जो उन्होंने अनौपचारिक बातचीत में, गप्पबाज़ी या बैठकबाज़ी में कही हैं। इन बातों को वे बाकायदा स्वीकार भी करते या नहीं, ये मैं नहीं कह सकता। लेकिन जो बातें उनसे सुनी हैं, उन्हें कह रहा हूँ। वे दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज में 'जश्न-ए-फ़िराक़' में आए थे। जामा मस्जिद में जगत टाकीज़ के पास कोई होटल था जिसमें वो ठहराए गए। वहाँ मैं भी था, खलीक़ अंजुम भी थे। वहाँ पर उन्होंने इक़बाल के बारे में कहा कि- जब मैं इक़बाल के शेर पढ़ता हूँ तो मुझे हमेशा ये लगता है जैसे कोई एवरेस्ट पर बैठा हुआ बोल रहा है। बड़े नाटकीय अंदाज़ से दोनों हाथ उठाकर और घोड़े की लगाम थामने की एक्टिंग करते हुए ये लाइन पढ़ी- बहरे ज़ुल्मात में दौड़ा दिए घोड़े हमने। वे अकबर इलाहाबादी के बहुत प्रशंसक थे।

    एक बार फ़िराक़ साहब नशे में मजाज़ से कुछ गुफ़्तुगू कर रहे थे- जिसको संस्कृत नाटकों में आकाशभाषित कहा जाता है। इस रूप में कि होगा साहब, तुम क्या बड़े शायर हो, ख़ुद मैंने 'आवारा' से बेहतर नज़्में कही हैं। इसका मतलब है कि उनके मन में मजाज़ को लेकर कोई ग्रंथि थी। मजाज़ ‘विटी’ बहुत थे। कहते हैं कि उन्होंने कई जगहों पर फ़िराक़ साहब का मज़ाक भी उड़ाया था। जोश के अथक प्रशंसक थे फ़िराक़ साहब। मैं ये बात नहीं कहूँगा तो ग़लती होगी मेरी कि फ़िराक़ साहब के मुँह से जोश की मैंने इतनी तारीफ़ सुनी है कि इस कारण से भी जोश से इतना प्रभावित हूँ और जोश को महान कवि मानता हूँ। यह शायद फ़िराक़ साहब से सुनी हुई बातों का असर है। 'धरती की करवट' में उन्होंने लिखा है कि- जोश इस समय भारत की सभी भाषाओं के महान कवियों में सबसे महान कवि हैं। कहते थे कि- साला Leader of Man तो मालूम ही पड़ता है। अपनी रुबाई 'रूप' उन्होंने जोश को समर्पित की है। एक बार जोश से फ़िराक़ साहब का झगड़ा भी हुआ था। अपनी आत्मकथा में जोश ने इस झगड़े का उल्लेख किया है, ये भी लिखा है- अगर उस दिन मैं अपनी पठनौली पर जाता, यानी पठानपने पर जाता तो पता नहीं क्या हो जाता। फ़िराक़ साहब ने भी 'रूप' समर्पित करते हुए इस झगड़े का उल्लेख किया है और एक रुबाई भी लिखी है। पूरी रुबाई मुझे याद नहीं है लेकिन शायद उसकी आख़िरी पंक्तियाँ हैं-

    एक रात की बक बक झक झक सब कुछ,

    आठ दस बरस की दोस्ती कुछ भी नहीं?

    हमारे यहाँ बलरामपुर में एक शायर होते थे पयाम साहब, वे फ़िराक़ साहब के बहुत नज़दीक थे। हम लोग भी पयाम साहब के पास बहुत उठते-बैठते थे। उन दिनों मैं सातवीं-आठवीं क्लास में रहा हूँगा। मुझे पयाम साहब की नज़्में याद हैं। वे बहुत मकबूल अध्यापक और कवि थे। तो उन्होंने बताया कि फ़िराक़ साहब और जोश के झगड़े की वजह ये थी कि फ़िराक़ साहब ने कोई रुबाई कही। तो जोश ने उनसे कहा कि देखो, तुम रुबाई मत कहा करो, तुम रुबाई नहीं कह सकते। रुबाई कहना तुम्हारा काम नहीं है, वह जोश का ही हिस्सा है। इस पर दोनों में कोई झगड़ा-वगड़ा हुआ। फ़िराक़ साहब ने शायद ये कह दिया कि साहब आप लोग क्या जानें कि हिंदुस्तानी तहज़ीब और हिंदुस्तानी शायरी क्या होती है और फ़िरदौसी जो है वो वाल्मीकि की... भी नहीं है, आगे कहा कि तुम संस्कृत नहीं जानते तो शायरी नहीं कर सकते, तुम बड़े शायर कैसे हो सकते हो? तो जोश ने भी कहा कि तुम कौन सी संस्कृत जानते हो? इस पर फ़िराक़ साहब ने जवाब दिया कि ठीक है, मैं संस्कृत नहीं जानता लेकिन संस्कृत को तो मैंने अपनी माँ के दूध में पाया है। असलियत ये है कि जहाँ तक Secular होने का सवाल है जोश, फ़िराक़ से कम Secular नहीं थे। इस्लाम के विरुद्ध, मुल्लाओं के विरुद्ध, क़ाज़ियों के विरुद्ध जितनी कविताएँ जोश ने लिखी हैं, उतनी कविताएँ किसी भी हिंदू कवि ने अपने धर्म के विरुद्ध नहीं लिखी होंगी, लोग इस बात को नहीं जानते। लेकिन रह-रहकर होता ये है कि हमारे अंदर हमारे ही ख़िलाफ़ एक व्यक्तित्व बैठा रहता है जो पता नहीं किस वक़्त उभरकर सामने जाए। ऐसे कमज़ोर क्षणों को हमें प्रतिनिधि क्षण नहीं मानना चाहिए। जैसे ऋषि-मुनि औलिया जो होते हैं, उनके क़दम कभी-कभी लड़खड़ा भी जाते हैं। इस मौक़े पर यगाना साहब का एक शेर मुझे याद रहा है जो मुझे बहुत पसंद है -

    बुलंद हो तो खुलें तुझ पे ज़ोर पस्ती का

    बड़ों-बड़ों के क़दम डगमगाए हैं क्या क्या।

    तो हम लोग जब किसी की आलोचना करने बैठते हैं तो हमारे अंदर एक Sadist बैठा होता है, एक खल-सुख लेने का भाव होता है। इसमें शायद ये हीनता-ग्रंथि होती है कि हमीं कमीने नहीं हैं, जिनको बड़ा कहा जाता है वे भी कमीने हैं। हम बड़ों के बड़प्पन पर ध्यान नहीं देते, उनके जीवन के जो क्षुद्र अवसर होते हैं, हाशिए पर की चीज़ें हैं, हाशिए पर से भी कम उल्लेखनीय होती हैं, उनको हम लोग उभारते रहते हैं।

    तो ये प्रवृत्ति सबमें होती है, फ़िराक़ में भी थी, जोश में भी रही होगी। जोश की आत्मकथा पढ़ने पर पता चलता है कि उन्होंने कितने लोगों के बारे में लिखा है। लेकिन उनकी आत्मकथा की एक बहुत बड़ी ख़ूबी यह है कि बख़्शा तो उन्होंने किसी को नहीं लेकिन ख़ुद की शरारतों का ज़िक्र ज़्यादा है। उसमें ये भाव है कि मैं कितना उज़बक था, कितनी बेरहरवी पर चलता था, मुझमें कितने ऐब थे। आत्मौचित्य का भाव जोश में मैंने नहीं पाया। जोश जिस तरीक़े से लोगों का मज़ाक उड़ा सकते थे, जिस तरह से लोगों की तारीफ़ कर सकते थे, जिस तरह से अपने सामने वाले आदमी को एक चुटकी बजाते एक फ़िक़रे में धूल चटा सकते थे, ऐसी क्षमता उर्दू में शायद किसी के पास नहीं है। जोश में निर्भीकता भी बहुत थी, उनके सामने कोई सर उठाकर नहीं चल सकता था। जोश की जान-पहचान बहुत बड़े-बड़े लोगों से थी। आख़िरी वक़्त में वे पाकिस्तान चले गए। क्यों चले गए, इस पर अच्छा-बुरा नहीं कह सकते। मैं नहीं मानता कि जोश ने कोई ग़लती की। हम लोग वो फ़िज़ा नहीं बना पाए कि जोश जैसा बड़ा शायर हमारे बीच रह सके। तो मैं कह रहा था कि फ़िराक़ साहब जोश की बहुत तारीफ़ करते थे।

    फ़िराक़ साहब की कविता में कई ऐसी बातें हैं जिनसे पता चलता है कि उन्होंने कविता करने की साधना की थी। यद्यपि उनकी कविता की विशेषता उनका गौर फ़िक्र है जिसे उनकी इल्मियत कहिए आप। उनमें जीवन और जगत के वैज्ञानिक और ऐतिहासिक बोध की छाप बहुत ज़्यादा है, लेकिन वे कविता में भाषा और भाव की सहजता पर बहुत ज़ोर देते थे। सहजता उनके कवि का एक स्वप्न था, जिसे आप उनकी महत्त्वाकांक्षा भी कह सकते हैं- कविता ऐसी होनी चाहिए कि वो कविता मालूम पड़े बल्कि बातचीत मालूम पड़े। उन्होंने एक बार कहा कि कविता क्या है- Poetry is nothing, but brilliant illiteracy. इसी आधार पर वे उर्दू कविता, अंग्रेजी कविता की तारीफ़ करते थे और खड़ी बोली हिंदी कविता की आलोचना करते थे। मध्यकालीन संत कवियों तुलसी, सूरदास, मीरा की कविता को संसार की कविता का प्रतिमान मानते थे। बोलचाल के लहज़े में कोई मार्मिक बात निकल जाए और जिस कविता में लोक साहित्य जैसी ताज़गी और अछूतापन हो वह कविता उनकी कविताओं का आदर्श और प्रतिमान थी। जो कविताएँ वे बहुत उत्साह से सुनाया करते थे, वे प्रायः ऐसी होती थीं जिनमें इल्मियत नहीं होती थी या बहुत कम होती थी। जहाँ पर जो भाषा है वह अपने आप ही अपने अंदर के भाव या कथ्य को बोल उठे और ऐसा लगे कि कवि ने अपनी ओर से कोई उठा-बैठक नहीं की है। इसी बात को पुष्ट करने के लिए वे कहा करते थे कि मोमिन को शेर कहने का सलीक़ा ग़ालिब से ज़्यादा आता था। ग़ालिब की कविताओं में भावबोध की जटिलता बहुत है, सहजता नहीं है। एक बार बहुत उत्साह में फ़िराक़ साहब ने ये शेर सुनाया-

    जो उठे तो सीना उभार कर जो चले तो ठोकरें मार कर

    नए आप ही तो जवान हैं कोई क्या जहाँ में जवाँ नहीं।

    वे कहते थे कि इसमें एक तो पूरबिया बोली है कि तू ही बाट्यो जग में जवान साँवल गोरिया। तो जग में जवान होना। और दूसरा ये कि यह शेर उर्दू कविता को लोक साहित्य के क़रीब ले जाता है, जो उनका आदर्श था। उनके अनुसार कविता ऐसी होनी चाहिए जो लोगों की ज़बान पर जाए और लोगों की ज़बान से ही जिसका अवतार हुआ हो। शेक्सपियर पर बातें करते समय वे अक्सर शायद प्रोफ़ेसर डन का नाम लेते थे जिन्होंने उनको इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बी.ए. में अंग्रेजी पढ़ाई होगी, जिनके बारे में कहते थे कि पहले दिन ही शेक्सपियर को पढ़ाते समय उन्होंने कहा था कि- Shakespeare had no style of his own, all the styles of English language were his styles. फ़िराक़ साहब की काव्य-साधना इसी ओर उन्मुख थी। लेकिन फ़िराक़ साहब की जो कविताएँ हैं, वे इस प्रतिमान से नहीं जाँची जा सकतीं क्योंकि उनकी कविताओं में इतिहास बोध और इल्मियत बहुत ज़्यादा है। कैसे है, यह मैं यहाँ पर निवेदन करने की कोशिश करूँगा। उनकी प्रारंभिक कविताओं में से एक शेर है-

    तर्क-ए-मोहब्बत करने वालो कौन ऐसा जुग जीत लिया

    इश्क से पहले के दिन सोचो कौन बड़ा सुख होता था।

    इस शेर का लहज़ा लोक साहित्य के नज़दीक है। 'जग में जवान होना' की तरह इसमें भी जग जीत लिया है। एक बात इसमें देखने की यह है कि इस छंद की ज़मीन शायद सवैया है। वैसे है तो यह छंद मीर वाला है कि ‘मीर के दीन-ओ-मज़हब को अब पूछते क्या हो...।’ इस शेर में एक बात आप ये देखें कि इसमें तो है लेकिन जैसी ध्वनियाँ, जिन ध्वनियों के कारण उर्दू बहुत कुछ हिंदी से अलग की जाती है, इसमें बिल्कुल नहीं है। अभी पहला जो शेर मैंने सुनाया था कि 'जो उठे तो सीना उभार कर...’ में भी ऐसी कोई ध्वनि नहीं है जो फ़ारसी की ध्वनि हो। तो ये फ़िराक़ साहब के भाव यंत्र का उल्लेखनीय घटक था। मुझे यह असली हिंदुस्तानियत लगती है।

    फ़िराक़ साहब ने जब प्रगतिशील कविताएँ लिखनी शुरू कीं तो एक तरह से उनको लोक भाषा और सहज जातीय लय में कविताएँ करने का पूरा अवकाश मिल गया क्योंकि फ़िराक़ साहब की प्रगतिशील कविताओं में हिंदी की, ख़ास तौर पर पूर्वी उत्तर प्रदेश की जातीय धुनों, छंदों और लय का प्रयोग बहुत मिलता है। जैसे-

    बंदूकों से संगीनों से तुमने किए हज़ारों वार

    बारी है अब मज़दूरों की एक कचलोहिया आड़ो हमार।

    ये आल्हा छंद है। या 'आग भभूका गोरा मुखड़ा कच्चा पानी कच्ची आग' इस छंद में उन्होंने बहुत लिखा है, जो 'धरती की करवट' में तथा और भी कई जगह पर हैं।

    इसके दूसरी तरफ़ फ़िराक़ साहब की इल्मियत और उनके बोध की बात लें। उनकी एक रुबाई है -

    सहरा में ज़माँ मकाँ के खो जाती हैं

    सदियों बेदार रह के सो जाती हैं

    अक्सर सोचा किया हूँ ख़ल्वत में ‘फ़िराक़’

    तहज़ीबें क्यूँ ग़ुरूब हो जाती हैं।

    ये बिल्कुल ठेठ Time और Space का आधुनिक विचार है कि ये जो संस्कृतियाँ हैं वे इतिहास में बहुत दिनों तक फलती-फूलती रहती हैं और इसके बाद समाप्त हो जाती हैं। रोमन संस्कृति, ग्रीक संस्कृति, यूनानी संस्कृति, अरब संस्कृति ये सारी संस्कृतियाँ रहती हैं, फिर विलीन हो जाती हैं। कहाँ विलीन हो जाती हैं? तो फ़िराक़ साहब कहते हैं कि ज़माँ और मकाँ के देश और काल के अरण्य में खो जाती हैं। अरण्य माने वो असीम और अनजान लोक जिसको कोई पार नहीं पा सकता, वहाँ चली जाती हैं। हमसे इतनी दूर चली जाती हैं। क्यों चली जाती हैं? क्या करने आती हैं? इसमें आप देखेंगे कि इतिहास का बोध और काल का बोध बहुत ज़्यादा मिलता है और कभी-कभी दार्शनिक अंदाज़ में मिलता है। यह असीम, कालातीत, जिसे आप कहें कि बोधातीत, जो हमारे बोध से बाहर जो काल है उसमें हम सुख, आनंद और अपने जीवन की सार्थकता ढूँढ़ते हैं। कितना कम समय है हमारे अस्तित्व का, हमारे जीवन की सार्थकता का। लेकिन फिर भी यह असीम काल, अपनी असीमता में एक ओर मानव सौंदर्य या मानव सार्थकता को व्यर्थ बनाता है दूसरी ओर उसी को सार्थकता भी अपने आप प्रदान कर देता है। एक रुबाई ये है-

    एक लम्हा बका से भी यहाँ लंबा है

    कोनैन की ज़िंदगी भी एक लम्हा है

    कल फ़िराक़ मैंने वक़्त के चेहरे को

    आईन-ए-हुस्न-ए दोस्त में देखा है।

    इसका मतलब है कि सब कुछ बोधातीत है, असीम है। काल को आप पकड़ ही नहीं सकते लेकिन जो सौंदर्य है, जो सौंदर्य की अनुभूति है, वह चाहे जितनी कम देर के लिए हो, क्षण में ही संपूर्णता का आभास दे देती है और यों तो आप लंबी से लंबी उम्र ले के आएँ, बड़े से बड़ा कालखंड हो वह, असीम की तुलना में एक लम्हा ही है। फ़िराक़ साहब यह बहुत कहा करते थे - Every part of infinite is infinite. यह व्हाइट हेट का वाक्य है शायद जिसे फ़िराक़ साहब बहुत उद्धृत करते थे।

    तो एक ओर तो फ़िराक़ साहब की सहजता की साधना है जिसे लोक से, तुलसीदास से, कबीरदास से प्रेरणा मिलती है। ऐसी भाषा लिखने की वे कोशिश भी करते हैं। लेकिन फ़िराक़ साहब की अपनी कविताएँ इस सहजता के लिए उल्लेखनीय नहीं हैं बल्कि इल्मियत के कारण जो अपने ज़माने का बोध है, इतिहास का बोध है, मार्क्सवाद का बोध है, समाज का बोध है जो उनकी कविताओं में रचा बसा है, उसके कारण उनकी कविताएँ उल्लेखनीय हैं। फ़िराक़ साहब की कविताओं में उनका अभाव कैसे विभाव बन जाता है इसका उल्लेख मैं कर चुका हूँ। सब जानते हैं कि फ़िराक़ साहब का पारिवारिक जीवन बहुत आदर्श नहीं था, गड़बड़ था, ऊबड़-खाबड़ था। उनको हमेशा जैसे एक आदर्श सहचरी की तलाश रहती थी। ये जो आदर्श होता है वह एक स्तर पर तो कुछ नहीं है लेकिन एक स्तर पर बहुत काम की चीज़ है। कैसे? अगर लैला और मजनू की शादी हो जाती तो वो भी एक दूसरे को बोर करने लगते। इश्क़ की शिद्दत में, प्रेम की तीव्रता में जान दे देना आसान है, लेकिन आजीवन किसी से आकृष्ट ही बने रहना मुश्किल नहीं, असंभव है। ऐसे मौक़ों पर आदर्श बहुत काम आता है। आदर्श नहीं होता, कभी नहीं मिलता लेकिन वह आदमी को कहीं कहीं लगाए रखता है। इसलिए चाहे मानव इतिहास हो, चाहे आदमी का व्यक्तिगत जीवन, वह हमेशा एक आदर्श और प्रतिमान, एक दर्पण की तलाश में रहता है। फ़िराक़ साहब के यहाँ भी एक सहधर्मिणी की तलाश है। उसे हम प्रेमिका की तलाश या पत्नी की तलाश भी कह सकते हैं। उन्होंने 'रूप' में जो रुबाइयाँ लिखी हैं, उनको साथ रखकर देखें तो वस्तुतः वह एक आदर्श गृहिणी, पत्नी और प्रेमिका का रूप है।

    आप जानते हैं कि फ़िराक़ साहब ने रुबाइयाँ सहज भाव से लिखना नहीं शुरू कीं। जोश मलीहाबादी से उनके झगड़े की चर्चा हो चुकी है। इसमें कोई शक़ नहीं है कि जहाँ तक उर्दू भाषा की आत्मा को समझने का और उस पर अधिकार का प्रश्न है, जोश मलीहाबादी और फ़िराक़ गोरखपुरी में कोई तुलना नहीं थी। इस लिहाज़ से जोश बहुत बड़े जानकार और शायर थे। फ़िराक़ साहब की रुबाइयाँ बहुत साफ़-सुथरी और साँचे में ढली हुई रुबाइयाँ नहीं है और उनकी बड़ी आलोचना की है असद लखनवी ने। लेकिन फ़िराक़ साहब के बड़बोलेपन में ही शायद उनकी मौलिकता है।

    उनकी रुबाइयों में भारतीय नारी गृहिणी विविध रूपों में आती है। उसका सौंदर्य अनेक रूपों और बहुत कुछ भारतीय मिथकों में अभिव्यक्त हुआ है। एक ज़माने में ये रुबाइयाँ मुझे बहुत याद थीं, अब उतनी याद नहीं हैं। एक जगह आता है-

    ज़हराब-ए-ग़म को हुस्न करता है क़बूल

    शंकर ने जैसे विष का प्याला हो लिया

    या जो कुंभ का मेला है, उसके बहुत से रूपक खींचे गए हैं, उसमें सूरदास की कविताओं का बहुत असर दिखलाई पड़ता है, जैसे-

    जल से भरे भरे ये नयना रस के

    सखि साजन कब थे अपने बस के

    यह चाँदनी रात यह बिरह की पीड़ा

    उलट गई हो नागिन जैसे डस के

    और वो सूरदास की मशहूर उपमा कि-

    दिवाली के मौके पर उस गृहिणी का रूप, बरसात में उस गृहिणी का रूप, जिसे आप कहें कि एक तरह से षड्ऋतु वर्णन भी उसमें किया गया है। भारतीय नारी का यह सौंदर्य उर्दू कविता में लगभग नहीं है क्योंकि उर्दू कविता का जो माशूक़ है, वह इससे बहुत भिन्न है। अगर वह पुरुष है तो दूसरे ढंग का है लेकिन अगर औरत है तो ज़्यादातर कोठेवाली है। एक समर्पित और निष्ठावान प्रेमिका का विचार उर्दू कविता में लगभग नहीं है। इसलिए फ़िराक़ साहब के यहाँ उस रूप का जो ख़ाका मिलता है वो उर्दू कविता में बिल्कुल नया लगता है। जैसे-

    है ब्याहता पर रूप अभी कुँवारा है

    माँ है पर जो भी अदा है वो दोशीआ है

    वो माँग भरी मोदभरी गोद भरी

    कन्या है सुहागिन है जगत माता है।

    ये उस नारी की कल्पना है जिसकी शादी हुई है और वह नई-नई माँ बनी है। उसका बच्चा है उसकी गोद में जो कन्या है, सुहागिन है, जगत माता है। नारी की ऐसी मंगलविधायिनी प्रतिमा उर्दू कविता में नहीं है। सामंतवाद की एक ख़ास बात ये होती है कि सामंतवादी मनोवृत्ति का या सामंतवादी व्यवस्था का पुरुष संतानोत्पति के लिए पत्नी रखता है और प्रेम करने के लिए प्रेमिकाएँ अलग रखता है। तो जहाँ ऐसा होता है कि संतान पत्नी और प्रेमिका एक जगह हों तो वहाँ पारिवारिक संस्कृति का निर्माण होता है, परिवार की मंगलविधायिनी प्रतिमा बनती है। जैसे हमारी तरफ़ आल्हा में एक पंक्ति गाई जाती है जो इसके बिल्कुल अनुकूल है-

    पान पुरान सुहागिन सुंदर गोद खिलावत सुंदर बाला।

    पान पुरान पता नहीं किसलिए है, हो सकता है ये भी मंगलदायक शोभाविधायक हो। तो पान पुरान सुहागिन सुंदर... पूरा छंद बहुत अच्छा है इसलिए एकाध पंक्तियाँ सुनाता हूँ। इसके बाद है-

    खाने को भंग नहाने को गंग चढ़ै को तुरंग

    और आख़िरी पंक्ति है-

    दो मुँह एक तो देहु दयानिधि दो मृगनयनी कि दो मृगछाला

    कहीं कहीं इसकी अनुगूँज मुझे फ़िराक़ साहब की रुबाई में मिलती है। फ़िराक़ के यहाँ सौंदर्य के जो कई रूप मिलते हैं, उनमें फ़िराक़ साहब के अनुभव और निजता के कारण अपने आप मौलिकता और अद्वितीयता जाती है। जैसे मैं आपको उनकी ग़ज़ल का एक शेर सुनाता हूँ जो मुझे बहुत पसंद है और मेरा ख़याल है कि फ़िराक़ साहब को भी बहुत पसंद था क्योंकि मैंने उनको अकेले में इन शेरों को गुनगुनाते हुए सुना है -

    सर में सौदा भी नहीं दिल में तमन्ना भी नहीं

    लेकिन इस तर्क-ए-मोहब्बत का भरोसा भी नहीं

    एक मुद्दत से तिरी याद भी आई हमें

    और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं

    मेहरबानी को मोहब्बत नहीं कहते दोस्त

    आह अब मुझसे तिरी रंजिश-ए-बेजा भी नहीं

    फ़िराक़ साहब अक्सर शब्दों के दो बार प्रयोग करते थे। उनके ऐसे शेर बहुत हैं जिनमें किसी शब्द का साथ-साथ दो बार प्रयोग किया गया है। जैसे-

    शाम भी थी धुआँ धुआँ

    हुस्न भी था उदास उदास

    यहाँ भाषा के प्रयोग को लेकर अजीब बात है। जब आप कहते हैं कि 'धुआँ-धुआँ थी' या 'उदास-उदास था' तो वास्तविक दृष्टि से अर्थ में ये होता है कि एक तो ये कहना कि शाम धुआँ थी लेकिन इसकी जगह पर जब कहेंगे कि शाम धुआँ-धुआँ थी तो अर्थ होगा बिल्कुल ठीक-ठीक धुआँ नहीं थी, धुआँ जैसी थी। या जब कहा कि 'हुस्न भी था उदास-उदास' तो 'हुस्न उदास था' इतना कहने से भी एक प्रभावशाली बिंब बनेगा लेकिन उदास-उदास कहने वाला व्यंजित करना चाहता है कि मैं जिस उदासी की बात कर रहा हूँ, वह उदासी सामान्य नहीं है कविता में। या बातचीत में श्रोता और कहने वाले के बीच में भी एक तरीक़े से बहुत दाँवपेंच जाता है। इस तरीक़े से कहने वाला पाठक या श्रोता को कहीं कहीं सजेस्ट करता है कि उसकी 'उदासी' का मंतव्य क्या है। इस तरीक़े से अर्थ का थोड़ा सा विस्तार होता है। अब आप देखिए-

    शाम भी थी धुआँ धुआँ

    हुस्न भी था उदास उदास

    दिल को कई कहानियाँ।

    याद सी के रह गईं।

    अब यहाँ 'याद सी आके रह गईं' नहीं है। बल्कि वो कुछ इस तरह से याद आईं कि जैसे याद रही हों। इस तरीक़े से एक शब्द के दोहरे प्रयोग करके फ़िराक़ साहब अपने भाव की निजता को दिखाते हैं। यह उन्हें औरों से अलग करता है और ये प्रयोग सुनने में भी अच्छे लगते हैं और जो सुनने में अच्छा लगता है उसी में वह अर्थ समाया रहता है। फ़िराक़ साहब की कविता में सौंदर्य के बड़े कोमल और अछूते अनुभव व्यक्त हुए हैं। ऐसे अछूते अनुभव अन्यत्र कविता में दिखलाई नहीं पड़ते। ऐसा एक शेर है-

    किसी का यूँ तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी

    ये हुस्न-ओ-इश्क़ धोखा है सब मगर फिर भी।

    इस शेर को आप गाकर पढ़ेंगे, अच्छे से अच्छे राग में ढाल कर पढ़ें, तो इस शेर का मतलब चौपट हो जाएगा। ये शेर लिखा ही गया है वार्ता की लय में, उसी में ये अपने अर्थ को खोल सकता है। यहाँ 'फिर भी' के आगे कुछ भी कह कर सब कुछ कह दिया गया है। आगे है-

    कहूँ ये कैसे इधर देख या देख इधर

    कि दर्द दर्द है फिर भी नज़र नज़र फिर भी।

    मुझे ये सोचने में और कहने में अच्छा लगता है कि फ़िराक़ साहब भी आँखों के अच्छे शायर हैं। मैं उर्दू के बारे में तो उस अधिकार से नहीं कह सकता जिस अधिकार से संस्कृत और हिंदी के बारे में कह सकता हूँ। हालाँकि मेरी ये बात उर्दू के विषय में भी ठीक होगी कि कोई ऐसा बड़ा शायर नहीं होगा जिसने आँखों पर अच्छी कविताएँ लिखी हों। हिंदी में तुलसीदास और निराला हैं। मेरा ख़याल है कि इस क्षेत्र में निराला तुलसीदास से भी बड़े हैं। प्राचीन भारत में आँखों के सबसे बड़े कवि कालिदास हैं। कभी समय मिला तो निराला द्वारा आँखों पर लिखी गई कविताओं पर लिखूँगा। कालिदास ने आँखों पर कैसी कविताएँ लिखी हैं इसका संकलन तैयार किया जाए तो अद्भुत होगा। मुझे याद आता है कि एक तो मेघदूत में है ही-

    प्रीतिस्निग्धैर्जनपदवधूलोचनैः पीयमानः

    दूसरा बिंब बलराम के मदिरापान का है कि रेवती की आँखों की छाया बलराम की मदिरा के चषक में पड़ रही है और बलराम उसे पी रहे हैं। यह अद्भुत बिंब है। और सारी बातें छोड़ दीजिए तो वह कविता अमिय हलाहल मद भरे श्वेत श्याम रतनार...। तो ख़ैर, फ़िराक़ साहब के यहाँ भी आँखों पर अच्छी कविताएँ हैं। 'जल से भरे भरे नयना' वाली बात तो अभी मैंने आपसे की ही थी। दूसरी कविता है 'आँखों को नयन बनाने वाले दिन हैं, या-

    तेरी वो नरम दोशीजा निगाही दिल नहीं भूला

    उठी जब जब तेरी आँखें निगाहें अव्वली निकलीं।

    कुछ और कविताएँ वे आँखों पर लिखते तो मुझे अच्छा लगता। एक ये है कि-

    दिल के आईने पे पड़ती है इस तरह से निगाह

    पानी में लचक जाए किरन क्या कहना।

    या

    वो आँख ज़ुबान हो गई है

    हर बज़्म की जान हो गई है।

    ये एक तरीक़े से 'गिरा अनयन नयन बिनु बानी' का अनुवाद है।

    फ़िराक़ साहब के यहाँ जब प्रगतिशील कविता उनकी सौंदर्याभिरुचि से संपन्न होकर आती है तो वे अच्छी पंक्तियाँ होती हैं। जैसे-

    निकहत-ए-ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ दास्तान-ए-शाम-ए-ग़म

    सुब्ह होने तक इसी अंदाज़ की बातें करो

    कुछ क़फ़स की तीलियों से छन रहा है नूर सा

    कुछ फ़ज़ा कुछ हसरत-ए-परवाज़ की बातें करो

    ख़ास तौर पर फ़िराक़ साहब ग़ज़ल के ही शायर हैं लेकिन उनकी कई नज़्में भी बहुत अच्छी हैं। उर्दू कविता में मजाज़ की नज़्म 'आवारा' हमारे समय की अद्वितीय नज़्म है। लेकिन और कई लिहाज से फ़िराक़ साहब की एक लंबी नज़्म है- 'जुगनू' जो मुझे बहुत पसंद है। उस नज़्म को पढ़कर ये आशा बंधती है कि खड़ी बोली में भी सूरदास जैसी कविता लिखी जा सकती है। इस नज़्म में सूरदास की सी मासूमियत और पवित्रता तो नहीं है लेकिन एक हद तक है भी, क्योंकि माँ पर है वह कविता। यानी उस कविता को पढ़कर सूरदास की याद जाती है। फ़िराक़ साहब की जो दूसरी नज़्म मुझे पसंद है वो है 'आधी रात'। इसमें आधी रात के स्वप्न में जैसे प्रकृति के सौंदर्य का ख़ज़ाना खुल पड़ता है और तमाम प्रकार की सुगंधें एक दूसरे से होड़ करके चलती हैं। ऐसे में जो भाव और विचार होते हैं, जैसे फ़िराक़ साहब उन सबको चित्रित करते हैं उस कविता में। और आख़िर में, 1962 में चीन की लड़ाई के समय फ़िराक़ साहब की कही वह मशहूर ग़ज़ल जो बहुत लोकप्रिय हुई थी। सब लोग उसको पढ़ते घूमते थे-

    सुखन की शम्माँ जलाओ बहुत उदास है रात

    नवाए मीर सुनाओ बहुत उदास है रात

    कोई कहे ये ख़यालों और ख़्वाबों से

    दिलों से दूर जाओ बहुत उदास है रात

    पड़े हो धुँधली फ़िज़ाओं में मुँह लपेटे हुए

    सितारो सामने आओ बहुत उदास है रात।

    स्रोत :
    • पुस्तक : हिंदी समय
    • रचनाकार : विश्वनाथ त्रिपाठी

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