नहिं लागत लाज मंहत को

तुलसी साहब

नहिं लागत लाज मंहत को

तुलसी साहब

और अधिकतुलसी साहब

    नहिं लागत लाज मंहत को।

    गाड़ी ऊँट अटा ले चालत, लानत ऐसे पंथ को॥

    चेला करत फिरत घर-घर पर, आस-बास दुख अंत को।

    इंद्री सुख भोजन नित खावत, जम घर तोड़त दंत को॥

    काया बस माया संग फूले, भूल मूल तज कंथ को।

    बदन बनाय काया जिन कीन्हा, चीन्ह चरन लख संत को॥

    गुर घट भान जान सिष किरनी, नभ चढ़ मिल गुर मित्र को।

    कनफूंका संग बाट पैहौ, गुरु चेला बहे अंत को॥

    गुरु अपना गुरु आदि जाना, खानी परत परंत को।

    तुलसी किरन गगन गुरु भेंटत, भेटें काल दयंत को॥

    महंत को तनिक लाज नहीं आती। ऊँट और गाड़ी लेकर चलता है। ऐसे पंथ को धिक्कार है। घर-घर जाकर चेला बनाता है। इस तरह की आसा और बासना के कारण अंत को दुख सहता है। इंद्रियों के सुख भोगने और पेट भर भोजन करने में मस्त है। उसको जम पकड़ेंगे और दाँत तोड़ेंगे। काया के बंधन में गिरफ़्तार है और माया के संग फूल रहा है। अपने मालिक का संग छोड़ दिया इसलिए अपने मूल पद को भूल गया। संतों को पहचानो और उनके चरणों को लखो जिन्होंने तेरी काया बनाई है। यह भी समझ कि गुरु का तेज़ सूर्य की तरह तेरे अंदर विराज रहा है और अपने गुरू से जो सच्चे हिमायती हैं, मिलो। झूठे गुरु के संग जो कान में मंत्र फूँकते हैं, तुझे सच्चा मालिक नहीं मिलेगा। ऐसा गुरु और चेला दोनों अंत में बह जाएँगे। तूने अपने सच्चे गुरु को नहीं पहचाना। इसलिए चारों खानों में भरमेगा। तुलसी साहब फ़रमाते हैं कि अगर कोई सच्चे गुरु से मिले जिनका तेज़ सूर्य की तरह गगन यानी त्रिकुटी में फैल रहा है तो वह काल को जीत लेगा।

    स्रोत :
    • पुस्तक : तुलसी साहब (हाथरस वाले) की बानी (पृष्ठ 156)
    • संपादक : ज्ञान दास माहेश्वरी
    • रचनाकार : तुलसी साहब
    • प्रकाशन : स्वामी बाग, आगरा

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