कोई नहिं अपना रे

तुलसी साहब

कोई नहिं अपना रे

तुलसी साहब

और अधिकतुलसी साहब

    कोई नहिं अपना रे अपना, अरे यह जक्त रैन का सुपना।

    मिट्टी में मिट्टी मिल जैहै, पै है करम कलपना।

    काया बिनस ख़बर नहिं दम की, जम की डगर डरपना॥

    बंधन जाल जुगन जम दैहैं, करिहैं काल थरपना।

    छूटे जब सतगुरु चरनन पर, तन मन सीस अरपना॥

    लागी रहे बिरह संतन की, ज्यों जल मीन तड़पना।

    सुंदर सुख सन्मुख सूरज के, सूरति अजपा जपना॥

    मारग मकर महल दरपन में, मन में माल परखना।

    तुलसी मंजिल मूल कहाँ सूझे, बूझे एक हरफ़ ना॥

    इस संसार में तुम्हारा कोई सच्चा हितैषी साथी नहीं है, और यह संसार रात के स्वप्न के समान मिथ्या नाशवान है। जो पाप कर्म तुमने किए हैं, उनके लिए विलाप करके, तुम दुखी होओगे और अंत में तुम्हारा तन भी मिट्टी में मिल जाएगा। किस पल इस तन का नाश हो जाएगा, कोई नहीं जानता है और मरने के बाद काल के मार्ग पर जाने में भारी भय है, क्योंकि वह जीव को अपने जाल में फँसाकर और युगों-युगों तक बाँधकर आवागमन में रखता है और अपनी पूजा करवाता है। काल के जाल से जीव का छुटकारा तभी हो सकता है जब वह अपना तन-मन और शीश सतगुरु के पवित्र चरणों में अर्पित कर दे। जैसे जल के बिना मीन तड़पती है, वैसे ही यह भी संतों के बिना बिरह में तड़पता रहता है। इसकी सुरत निर्मल सुख देने वाले नाम का सुमिरन अंतर में निरंतर करती रहे और यह आइने के समान स्वच्छ निर्मल, मालिक के महल को जाने वाले मार्ग और नाम रूपी दौलत को अपने घट में परखता रहे। तुलसी साहब कहते हैं कि जो परमार्थ का एक अक्षर भी नहीं जानता है, उसे मालिक का धुर धाम कैसे दिखाई दे सकता है?

    स्रोत :
    • पुस्तक : तुलसी साहब (हाथरस वाले) की बानी (पृष्ठ 26)
    • संपादक : ज्ञान दास माहेश्वरी
    • रचनाकार : तुलसी साहब
    • प्रकाशन : स्वामी बाग, आगरा

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