अरे मोरे सबद बिबेकी हंसा

पलटू

अरे मोरे सबद बिबेकी हंसा

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    अरे मोरे सबद बिबेकी हंसा हो, बैठो सबद की डार।

    सबदै ओढ़ौ सबद बिछाओ, सबदै भूख अहार।

    निसि दिन रहौ सबद के घर में, सबदै गुरु हमार॥

    लै हथियार सबद कै मारौ, सबद खेत ठहराओ।

    कबहुँ कुचाल जो होइ तुम्हारी, सबद में भागि लुकाओ॥

    आदि अनादि सबद है भाई, सबदै मूल बिचारा।

    जिनके चोट सबद की लागी, आवागवन निवारा॥

    सबदै मूल है सबकै साखा, सबदै सबद समाना।

    पलटू दास जो सबद बिबेकी, सबद के हाथ बिकाना॥

    मेरे शब्दों के विवेकी नीर-क्षीर के निर्णयता हंस! निर्णय-शब्दों की शाखा पर बैठो। निर्णय शब्दों को शय्या और ओढ़ना बनाओ और उसी की भूख रखो तथा उसी का आहार करो। रात-दिन निर्णय शब्दों के भवन में रहो। निर्णय शब्द ही हमारा गुरु है। निर्णय शब्दों के अस्त्र-शस्त्र लेकर भ्रम और वासना को मारो और निर्णय शब्दों के आधार पर ही मन के युद्ध क्षेत्र में अडिग रहो। यदि कभी तुम्हारे मन में ख़राब बात आए, तो भागकर निर्णय शब्दों की सुरक्षा में घुस जाओ। हे भाई! सदा से निर्णय शब्द ही कल्याण की जड़ हैं। विचार-विवेक प्रवाहित करने के लिए निर्णय शब्द ही कारण है। जिस मनुष्य के मन में निर्णय-शब्द की चोट लगी, वह संसार कचड़े का मोह त्यागकर भवसागर से पार हो गया। कल्याण की जड़ निर्णय शब्द है और वे ही उसकी शाखाएँ हैं। साधक निर्णय शब्दों में लीन हो जाता है। पलटू साहेब कहते हैं कि जो शब्दों के विवेकी हैं, वे निर्णय शब्दों के अनुसार अपने सत्स्वरूप आत्मा में समर्पित हो जाते हैं।

    स्रोत :
    • पुस्तक : पलटू साहेब की बानी (पृष्ठ 392)
    • संपादक : अभिलाषा दास
    • रचनाकार : पलटू
    • प्रकाशन : कबीर आश्रम, कबीर नगर, इलाहाबाद
    • संस्करण : 2012

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