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निर्मल वर्मा के उद्धरण

यदि आलोचना की मर्यादा इसमें है कि वह तटस्थ होकर नहीं, अपने विश्वासों और आग्रहों के साथ कलाकृति से मुठभेड़ करती है, तो उससे कहीं ऊँची मर्यादा यह है कि ज़रूरत पड़ने पर वह अपनी सब कसौटियों और मापदंडों को त्याग सकती है, जो उस कलाकृति के सामने झूठी और अप्रासंगिक बन गई हों।