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रवींद्रनाथ टैगोर के उद्धरण

प्रतिभा बादलों के बीच चमकनेवाली बिजली की तरह है; लेकिन मनुष्यत्व चरित्र का सूर्य-प्रकाश है, जो सर्वव्यापी और स्थाई होता है।