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वात्स्यायन के उद्धरण

नायक के किए गए मिलन-प्रस्ताव को यदि वह स्वीकार न करे और उसके साथ संसर्ग के लिए उत्सुक हो, तो उसे दुविधा में फँसा हुआ समझना चाहिए। ऐसे में नायक को उसकी दुविधा को धीरे-धीरे दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए।