विश्वनाथ त्रिपाठी के उद्धरण
मीरा ऊपर से देखने में समाज से बाहर दिखती हैं, पर वे समाज को एक करनेवाली रसधारा में डूबी हुई हैं कि उनके भीतर समाज की वास्तविक प्राणसत्ता समा जाती है।
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