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रवींद्रनाथ टैगोर के उद्धरण

‘महाभारत’ में एक उदात्त शिक्षा है। वह शिक्षा निषेधात्मक नहीं, सकारात्मक है, उसमें ‘हाँ’ का स्वर सुनाई पड़ता है।

अनुवाद : विश्वनाथ नरवणे