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रवींद्रनाथ टैगोर के उद्धरण

हम बचपन से गद्य बोलते आ रहे हैं, लेकिन गद्य कैसी दुरूह चीज़ है—यह प्रथम गद्यकारों की पचना देखकर ही समझ सकते हैं।

अनुवाद : अमृत राय