एक पक्का गाना चल रहा है, जिसके बोल हैं—‘प्रभु मैं सत्ता कैसे पाऊँ। इसे कोई भैरवी में गाता है, कोई विहाग में, कोई जयजयवंती में। बाक़ी गाँधीवाद, समाजवाद और धर्म-निरपेक्षता तो साज हैं। गाँधीवाद तबला है, सामजवाद सारंगी और धर्मनिरपेक्षता हारमोनियम। मगर गाने के बोल वही हैं—'प्रभु, मैं सत्ता कैसे पाऊँ।'