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नामवर सिंह के उद्धरण

भक्त कर्म-बन्धन से मुक्ति नहीं चाहते थे। बार-बार जन्म लेना चाहते थे। भगवान के चरणों में प्रेम करना चाहते थे और मुक्ति का निरादार करते थे। यह अपने-आपमें प्रमाण है कि दु:खी रहते हुए भी इस संसार में उनकी आस्था थी।