अहिंसा का साधक केवल प्राणियों को उद्वेग पहुँचाने वाली वाणी और कर्म न बोल करके अथवा मन में भी उनके प्रति द्वेषभाव न आने देकर संतोष नहीं मानता, बल्कि जगत में फैले हुए दुःखों को देखने और उनके उपायों का ध्यान धरने का प्रयत्न करता रहेगा, और दूसरों के सुख के लिए स्वयं प्रसन्नता से कष्ट सहेगा।