कृष्ण बिहारी मिश्र के उद्धरण
आर्ष मेधा ने विद्या की परिभाषा रची थी—‘विद्या सा या विमुक्तये'—जो मुक्त करे, वही विद्या है। लेकिन विद्या-उपाधि का दर्प मुक्ति नहीं, बंधन का कारण बनता रहा है। रामकृष्ण की धारणा ठीक लगती है कि ग्रंथ, ग्रंथि का जनक है।
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