पद-67

और अधिकअष्टभुजा शुक्‍ल

    यहीं कहीं अपना घर था

    जिसमें कहीं छत-छप्पर थी, सोता-खाता, बाहर था

    देसी-परदेसी जाने-अनजाने, भूले-भटके

    गादुर के घर पाहुन आए डाल पकड़कर लटके

    गेंदे के कुछ फूल खिले थे, मटके में कुछ पानी

    चिड़ियों की आवाजाही थी, अपनी चानी, चानी*

    पहले हवा यहीं आती थी और कहीं तब उड़ती थी

    जहाँ मक्खियाँ उड़तीं अब कल वहाँ तितलियाँ उड़ती थीं

    यहाँ लताएँ वृक्षों में डाले रहतीं गलबाँही

    चहल-पहल जिन लोगों से थी, अब उनकी परछाहीं

    मकड़जाल पर शीत पड़ी थी जैसे फटे दुकूल

    जितनी थीं प्रतिकूल दशाएँ सब अपने अनुकूल

    यहीं मेज़ पर ठुक ठुक करके बिना ताल सुर गाए

    तारों और बादलों से घंटों-घंटों बतियाए

    ये नीम हमारी अपनी थी जो झूम रही पिलखाने तर

    ये चमन हमारा अपना था जो बंदी है इस थाने पर

    नहीं किसी का दाब दबदबा, नहीं किसी का डर था

    इसी डीह पर यहीं कहीं ही, अष्टभुजा का घर था।

    स्रोत :
    • रचनाकार : अष्टभुजा शुक्ल
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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