ऋषभदेव की वंदना

स्वयंभू

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    पहिल जयकारेंवि परम-मुणि।

    मुणि-वयणेँ जाहँ सिद्धंत-झुणि॥

    झुणि जाहँ अणिद्विय रत्तिढिणु।

    जिणु हियएँ फिट्टइ एक्कु खणु॥

    खणु-खणु वि जाहँ विचलइ मणु।

    मणु मग्गइ जाहँ मोक्ख-गमणु॥

    गमणु वि जहिं णउ जम्मणु मरणु॥

    मरणु वि कह होइ मुणीवरहँ।

    मुणिवर जे लग्गा जिणवरहँ॥

    जिणवर लें लीय साण परहों।

    परु केव ढुक्कु जें परियणहों॥

    परियणु मणेँ मण्णिउ जेहिं तिणु।

    तिण-समउ णाहिं लहु णरय-रिणु॥

    रिणु केम होइ भव-भय-रहिय।

    भव-रहिय धम्म-सजम-सहिय॥

    सबसे पहले मैं उन परम मुनि की जय करता हूँ जिनके मुख में सिद्धांत-ध्वनि रहती है और ध्वनि भी रात-दिन अविनश्वर रहती है, जिनके हृदय से जिनेंद्र एक भी क्षण के लिए दूर नहीं होते, क्षण-क्षण जिनका मन विचलित नहीं होता और जो मोक्ष-गमन की याचना करता रहता है। जहाँ जाने पर जन्म और मरण नहीं होता, और फिर उन मुनिवरों का मरण कैसे हो सकता है जो जिनवर में अनुरक्त हैं। जिनवर भी वही हैं, जिन्होंने दूसरों का मान दूर कर दिया है, फिर वे दूसरों का धन कैसे चाह सकते हैं! वे तो पराए धन को तिनके के समान समझते हैं। उनके पास नरक का थोड़ा भी ऋण नहीं है, वे भव-भय से मुक्त हैं, इसलिए ऋण हो भी नहीं सकता। वे संसार से रहित, तथा धर्म और संयम से परिपूर्ण हैं।

    स्रोत :
    • पुस्तक : पउम चरिउ (पृष्ठ 14)
    • संपादक : हंसराज बच्छराज नाहटा
    • रचनाकार : स्वयंभू
    • प्रकाशन : भारतीय ज्ञानपीठ, काशी
    • संस्करण : 1944

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