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निरदय हृदय न होहु मनोहर

nirday hriday n hohu

सहचरिशरण

अन्य

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सहचरिशरण

निरदय हृदय न होहु मनोहर

सहचरिशरण

और अधिकसहचरिशरण

    निरदय हृदय होहु मनोहर, सदय रहौं मन-भावन।

    नवल मोहिलौ मोहि तजौ जिन, तोहि सौंह प्रिय पावन।

    रसिक ‘सहचरिसरन’ स्यामघन, रस-बरसावन सावन।

    दरस देहु वर वदन-चंद्रमा, चख-चकोर बिलसावन॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : ब्रजमाधुरीसार (पृष्ठ 248)
    • संपादक : वियोगी हरि
    • प्रकाशन : हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग
    • संस्करण : 1939

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