कामिनि करए सनाने

विद्यापति

कामिनि करए सनाने

विद्यापति

और अधिकविद्यापति

    कामिनि करए सनाने। हेरितहि हृदय हनए पँचबाने॥

    चिकुर गरए जलधारा। जनि मुख-ससि डरें रोए अँधारा॥

    कुच-जुग चारु चकेवा। निअ कल मिलत आनि कोने देवा॥

    ते संकाएँ भुज-पासे। बाँधि धएल उड़ि जाएत अकासे॥

    तितल बसन तनु लागू। मुनिहुक मानस मनमथ जागू॥

    सुकवि विद्यापति गावे। गुनमति धनि पुनमत जन पावे॥

    कामिनी नहा रही है। देखते ही पंचबाण (कामदेव) हृदय को घायल करता है। बालों से पानी की धार नीचे बही जा रही है। लगता है, मुख-चंद्र के डर से अंधकार रो रहा है। दोनों स्तन चकवा पक्षी के जोड़े हैं, उसी की तरह गोल-मटोल और सुंदर। ये जाकर अपने झुंड में शामिल हो जाएँगे, फिर इन्हें पकड़कर कौन वापस लाएगा और उसे देगा? इसी डर से सुंदरी ने उन्हें भुजपाश में बाँध रखा है, वे उड़कर आसमान की ओर चले जाएँ। गीला कपड़ा तन से चिपक गया है, वह मुनियों के भी मन में ललक पैदा कर रहा है। सुकवि विद्यापति ने गाया—“ऐसी गुणवती स्त्री भाग्यशाली लोग पाते हैं।”

    स्रोत :
    • पुस्तक : विद्यापति के गीत (पृष्ठ 22)
    • रचनाकार : विद्यापति
    • प्रकाशन : वाणी प्रकाशन
    • संस्करण : 2011

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