रास विलास रस भरे नर्तत

कुंभनदास

रास विलास रस भरे नर्तत

कुंभनदास

और अधिककुंभनदास

    रास विलास रस भरे नर्तत नवल किशोर नवल किशोरी।

    एक ही वेष एक रूप गुण गिरिधर श्याम राधिका गोरी॥

    नव पट पीत अरु नव भूषण नव किंकिनी कटि युम थोरी।

    दुहुं दिस सकल सिंगार बिराजत मानो त्रिभुवन सुभगता चोरी॥

    तान बंधान वेणु खसों मिलि विधना रची सरस यह जोरी॥

    कुंभनदास प्रभु गोवर्द्धनधर सुरत केलि में कुंचकी छोरी॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : अष्टछाप के कवि (पृष्ठ 63)
    • संपादक : हरगुलाल
    • रचनाकार : कुम्भनदास
    • प्रकाशन : प्रकाशन विभाग, भारत सरकार
    • संस्करण : 2008

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