कुंडलियाँ

मिश्रित छंद। दोहा और रोला का मिश्रण। आरंभिक दो पंक्तियाँ दोहे की और बाद की चार पंक्तियाँ रोला की। छंद के पहले शब्द का छंदांत में दोहराव और दूसरी पंक्ति के अंतिम चरण का तीसरी पंक्ति के आरंभ में दोहराव अनिवार्य।

योग और वेदांग के ज्ञाता। कहने को संत कवि लेकिन प्रकृति से वैष्णव भक्त। महाराजा छत्रशाल के आध्यात्मिक गुरु।

1713

जीवन के व्यावहारिक पक्ष के आलोक में नीति, वैराग्य और अध्यात्म के प्रस्तुतकर्ता। नीतिपरक कुंडलियों के लिए प्रसिद्ध।

भक्तिकालीन रीति कवि। 'शृंगार मंजरी' काव्य परंपरा के अलक्षित आदिकवि।

1763 -1843

'साहिब पंथ' से संबंधित संत कवि।

संत और भक्तकवि। वेदांत और सूफ़ीवाद का एक साथ निर्वाह करने के लिए समादृत।

1802 -1858

रीतिकाल के नीतिकार। भाव निर्वाह के अनुरूप चलती हुई भाषा में मनोहर और रसपूर्ण रचनाओं के लिए प्रसिद्ध।

कृष्ण-भक्त कवि। गोस्वामी हितहरिवंश के शिष्य। सरस माधुर्य और प्रेम के आदर्श निरूपण के लिए स्मरणीय।

1769

अठारहवीं सदी के संत कवि। पदों में हृदय की सचाई और भावों की निर्भीक अभिव्यक्ति। स्पष्ट, सरल, ओजपूर्ण और मुहावरेदार भाषा का प्रयोग।

रीतिकालीन नीति काव्यधारा के महत्वपूर्ण कवि। सरल भाषा में लोकव्यवहार संबंधी कुंडलियों के लिए स्मरणीय।

1764 -1803

जयपुर नरेश सवाई प्रतापसिंह ने 'ब्रजनिधि' उपनाम से काव्य-संसार में ख्याति प्राप्त की. काव्य में ब्रजभाषा, राजस्थानी और फ़ारसी का प्रयोग।

'टट्टी संप्रदाय' से संबद्ध। कविता में वैराग्य और प्रेम दोनों को एक साथ साधने के लिए स्मरणीय।

1505 -1610

अकबर के दरबारी कवि। भक्ति और नीति संबंधी कविताओं के लिए स्मरणीय।

संत कवि। सरल और सहज राजस्थानी भाषा। कविता में दैनिक जीवनानुभवों और उदाहरणों से अपनी बात पुष्ट करने के लिए स्मरणीय।

1719 -1798

श्री रामस्नेही संप्रदाय के प्रवर्तक। वाणी में प्रखर तेज। महती साधना, अनुभूति की स्वच्छता और भावों की सहज गरिमा के संत कवि।

1596 -1689

दादूदयाल के प्रमुख शिष्यों में से एक। अद्वैत वेदांती और संत कवियों में सबसे शिक्षित कवि।

1734

भक्त कवि नागरीदास की बहन। चलती हुई सरल भाषा में भक्ति और वीर काव्य की रचयिता।

निरंजनी संप्रदाय के रहस्यवादी संत कवि।

भक्तिकालीन संत। कृष्णदास पयहारी के शिष्य और नाभादास के गुरु। रसिक संप्रदाय के संस्थापक। शृंगार और दास्यभाव की रचनाओं के लिए स्मरणीय।

1725 -1805

चरनदास की शिष्या। प्रगाढ़ गुरुभक्ति, संसार से पूर्ण वैराग्य, नाम जप और सगुण-निर्गुण ब्रह्म में अभेद भाव-पदों की मुख्य विषय-वस्तु।

भक्ति-काव्य की कृष्णभक्त शाखा के माधुर्योपासक कवि। राधावल्लभ संप्रदाय के प्रवर्तक।