कामायनी (लज्जा सर्ग)

जयशंकर प्रसाद

कामायनी (लज्जा सर्ग)

जयशंकर प्रसाद

और अधिकजयशंकर प्रसाद

    “कोमल किसलय के अंचल में

    नन्ही कलिका ज्यों छिपती-सी;

    गोधूली के धूमिल पट में

    दीपक के स्वर में दिपती-सी।

    मंजुल स्वप्नों की विस्मृति में

    मन का उन्माद निखरता ज्यों;

    सुरभित लहरों की छाया में

    बुल्ले का विभव बिखरता ज्यों;

    वैसी ही माया में लिपटी,

    अधरों पर उँगली धरे हुए;

    माधव के सरस कुतूहल का

    आँखों में पानी भरे हुए।

    नीरव निशीथ में लतिका-सी

    तुम कौन रही हो बढ़ती?

    कोमल बाँहें फैलाए-सी,

    आलिंगन का जादू पढ़ती!

    किन इंद्रजाल के फूलों से

    लेकर सुहाग कण राग भरे;

    सिर नीचा कर हो गूँथ रही

    माला जिससे मधु धार ढरे?

    पुलकित कदंब की माला-सी

    पहना देती हो अंतर में;

    झुक जाती है मन की डाली

    अपनी फलभरता के डर में।

    वरदान सदृश हो डाल रही

    नीली किरनों से बुना हुआ;

    यह अंचल कितना हलका-सा,

    कितने सौरभ से सना हुआ।

    सब अंग मोम से बनते हैं,

    कोमलता में बल खाती हूँ;

    मैं सिमिट रही-सी अपने में,

    परिहास गीत सुन पाती हूँ।

    स्मित बन जाती है तरल हँसी,

    नयनों में भर कर बाँकपना;

    प्रत्यक्ष देखती हूँ सब जो

    वह बनता जाता है सपना।

    मेरे सपनों में कलरव का

    संसार आँख जब खोल रहा;

    अनुराग समीरों पर तिरता

    था इतराता-सा डोल रहा।

    अभिलाषा अपने यौवन में,

    उठती उस सुख के स्वागत को;

    जीवन भर के बल-वैभव से,

    सत्कृत करती दूरागत को।

    किरनों का रज्जु समेट लिया

    जिसका अवलंबन ले चढ़ती;

    रस के निर्झर में धँस कर मैं

    आनंद-शिखर के प्रति बढ़ती।

    छूने में हिचक, देखने में

    पलकें आँखों पर झुकती हैं;

    कलरव परिहास भरी गूँजें

    अधरों तक सहसा रुकती हैं।

    संकेत कर रही रोमाली,

    चुपचाप बरजती खड़ी रही;

    भाषा बन भौंहों की काली

    रेखा-सी भ्रम में पड़ी रही।

    तुम कौन? हृदय की परवशता?

    सारी स्वतंत्रता छीन रहीं;

    स्वच्छंद सुमन जो खिले रहे,

    जीवन वन से ही बीन रही!”

    संध्या की लाली में हँसती,

    उसका ही आश्रय लेती-सी;

    छाया प्रतिमा गुनगुना उठी,

    श्रद्धा का उत्तर देती-सी।

    “इतना चमत्कृत हो बाले!

    अपने मन का उपकार करो;

    मैं एक पकड़ हूँ जो कहती,

    ठहरो कुछ सोच विचार करो।

    अंबर-चुंबी हिम-शृंगों से

    कलरव कोलाहल साथ लिए;

    विद्युत की प्राणमयी धारा

    बहती जिसमें उन्माद लिए।

    मंगल कुंकुम की श्री जिसमें

    निखरी हो ऊषा की लाली;

    भोला सुहाग इठलाता हो,

    ऐसी हो जिसमें हरियाली।

    हो नयनों का कल्याण बना,

    आनंद सुमन-सा विकसा हो;

    वासंती के धन-वैभव में,

    जिसका पंचम स्वर पिक-सा हो;

    जो गूँज उठे फिर नस-नस में,

    मूर्च्छना समान मचलता-सा;

    आँखों के साँचे में आकर

    रमणीय रूप बन ढलता-सा;

    नयनों की नीलम की घाटी,

    जिस रस घन से छा जाती हो;

    वह कौंध कि जिससे अंतर की

    शीतलता ठंढक पाती हो।

    हिल्लोल भरा हो ऋतुपति का,

    गोधूली की-सी ममता हो;

    जागरण प्रात-सा हँसता हो,

    जिसमें मध्याह्न निखरता हो।

    हो चकित निकल आई सहसा,

    जो अपने प्राची के घर से;

    उस नवल चंद्रिका के बिछले,

    जो मानस की लहरों पर से।

    फूलों की कोमल पंखड़ियाँ,

    बिखरें जिसके अभिनंदन में;

    मकरंद मिलाती हो अपना,

    स्वागत के कुंकुम चंदन में।

    कोमल किसलय मर्मर रव से,

    जिसका जय-घोष सुनाते हो;

    जिसमें दु:ख-सुख मिलकर मन के,

    उत्सव आनंद मनाते हों।

    उज्जवल वरदान चेतना का,

    सौंदर्य जिसे सब कहते हैं;

    जिसमें अनंत अभिलाषा के,

    सपने सब जगते रहते हैं।

    मैं उसी चपल की धात्री हूँ,

    गौरव महिमा हूँ सिखलाती;

    ठोकर जो लगने वाली है,

    उसको धीरे से समझाती।

    मैं देव सृष्टि की रति रानी,

    निज पंचबाण से वंचित हो;

    वन आवर्जना मूर्ति दीना,

    अपनी अतृप्ति-सी संचित हो।

    अवशिष्ट रह गई अनुभव में,

    अपनी अतीत असफलता सी;

    लीला विलास की खेद भरी,

    अवसादमयी श्रम दलिता सी।

    मैं रति की प्रतिकृति लज्जा हूँ,

    मैं शालीनता सिखाती हूँ;

    मतवाली सुंदरता पग में,

    नूपुर-सी लिपट मनाती हूँ।

    लाली बन सरल कपोलों में,

    आँखों में अंजन-सी लगती,

    कुंचित अलकों सी घुँघराली,

    मन की मरोर बन कर जगती।

    चंचल किशोर सुंदरता की,

    मैं करती रहती रखवाली;

    मैं वह हलकी-सी मसलन हूँ,

    जो बनती कानों की लाली।”

    “हाँ ठीक, परंतु बताओगी,

    मेरे जीवन का पथ क्या है?

    इस निविड़ निशा में संसृति की,

    आलोकमयी रेखा क्या है?

    यह आज समझ तो पाई हूँ,

    मैं दुर्बलता में नारी हूँ;

    अवयव की सुंदर कोमलता,

    लेकर मैं सब से हारी हूँ।

    पर मन भी क्यों इतना ढीला,

    अपने ही होता जाता है!

    घनश्याम खंड-सी आँखों में,

    क्यों सहसा जल भर आता है?

    सर्वस्व समर्पण करने की,

    विश्वास महा तरु छाया में।

    चुपचाप पड़ी रहने की क्यों,

    ममता जगती है माया में?

    छाया पथ में तारक द्युति-सी,

    झिलमिल करने की मधु लीला;

    अभिनय करती क्यों इस मन में,

    कोमल निरीहता श्रम शीला?

    निस्संबल होकर तिरती हूँ,

    इस मानस की गहराई में;

    चाहती नहीं जागरण कभी,

    सपने की इस सुघराई में।

    नारी-जीवन का चित्र यही,

    क्या? विकल रंग भर देती हो;

    अस्फुट रेखा की सीमा में,

    आकार कला को देती हो।

    रुकती हूँ और ठहरती हूँ,

    पर सोच-विचार कर सकती;

    पगली सी कोई अंतर में,

    बैठी जैसे अनुदित बकती।

    मैं जभी तोलने का करती,

    उपचार स्वयं तुल जाती हूँ;

    भुज लता फँसा कर नर तरु से,

    झूले सी झोंके खाती हूँ।

    इस अर्पण में कुछ और नहीं,

    केवल उत्सर्ग छलकता है;

    मैं दे दूँ और फिर कुछ लूँ,

    इतना ही सरल झलकता है।”

    “क्या कहती हो ठहरो नारी!

    संकल्प अश्रु-जल से अपने;

    तुम दान कर चुकी पहले ही

    जीवन के सोने से सपने।

    नारी! तुम केवल श्रद्धा हो,

    विश्वास रजत नग पग तल में;

    पीयूष स्रोत सी बहा करो,

    जीवन के सुंदर समतल में।

    देवों की विजय, दानवों की,

    हारों का होता युद्ध रहा;

    संघर्ष सदा उर अंतर में,

    जीवित रह नित्य विरुद्ध रहा।

    आँसू से भींगे अंचल पर,

    मन का सब कुछ रखना होगा;

    तुमको अपनी स्मित-रेखा से,

    यह संधि-पत्र लिखना होगा।”

    पूर्णिमा की सुहावनी रात में मनु के प्रेमोदगार सुनकर श्रद्धा के मन में जो भी प्रणय भावना प्रबल हो उठती है पर उसके हृदय में तीव्रता के साथ लज्जा, मनोभाव भी उदय होता है पर वह यह नहीं समझ पाती कि यह कौन सा मनोभाव है। इस प्रकार एक दिन संध्या के मसय वह एकांत में बैठी हुई यह प्रश्न करती है कि जिस प्रकार नन्ही कली स्वयं को कोमल एक नवीन पत्तों में छिपी लेती है उसी प्रकार तुम कौन हो जो अपने सुंदर अंचल में स्वयं को छिपाने का प्रयत्न करती हो। साथ ही जिस प्रकार संध्या समय धूल एवं अंधकार के कारण चारों और फैले हुए धुएँ के आवरण में दीपक की लौ कुछ चमकती हुई दिखाई देती है उसी प्रकार अपने तट से अपने सौंदर्य को प्रकाशित करती हुई कौन हो?

    श्रद्धा लज्जा को संबोधित कर कह रही है कि जिस प्रकार मधुर स्वप्नों में बाह्म वातावरण की धूल जाने पर मन का उन्माद द्विगुणित हो उठता है और मन में अनेक प्रकार की उमगें उसी प्रकार उठती-मिटती रहती हैं जिस प्रकार सुंगधित लहरों के अंतर्गत बुलबुलों का वैभव बिखरती दिखाई देता है वैसे ही मोहक जादू के रूप लावण्य में लिपटी हुई और अपने ओठों पर उगली रखकर दूसरो को चुप रहने का संकेत देते हुए अथवा किसी मनोहर भाव में निमग्न तथा वसंत के आनंददायक आश्चर्य से उत्पन्न नेत्रों में आनंद के आँसू भरे हुए तुम कौन हो?

    श्रद्धा लज्जा से कहती है कि तुम कौन हो जो मेर ओर इस प्रकार बढ़ चली रही हो जिस प्रकार अर्द्धरात्रि के शांत वातावरण में लता बढ़ती हैं। श्रद्धा लज्जा से पूछ रही है कि तुम कौन जो अपनी कोमल बाँहे फैलाए मुझे अलिंगन की प्रेरणा देती हुई मेरी ओर बढ़ी चली रही हो।

    श्रद्धा लज्जा से कहती है कि तुमने जादू के फूलों से लाल लाल सिंदूर की भाँति लाल-लाल पराग के कण एकत्र कर लिए हैं और तुम सी नीचा कर, बड़ी तन्मयता से इन फूलों की माला बना रही हो तथा उनसे मकरब की धार के सहजा आनंद की धारा प्रवाहित हो रही है।

    श्रद्धा लज्जा को संबोधित कर कह रही है कि तुमने मेरे संपूर्ण शरीर को रोमांचित कर दिया है और ऐसा जान पड़ता है कि तुमने मुझे कदंब के फूलों का हार सा पहला दिया है जिसके कारण रोम-रोम खड़े हो जाते हैं। श्रद्धा पुन कहती है कि जिस प्रकार वृक्ष की शाखा फलों के भार से नीचे ओर झुक जाती है उसी प्रकार तुम्हारा आगमन होते ही मन दब सा जाता है अर्थात वह कुछ कह नहीं पाता।

    श्रद्धा लज्जा की संबोधित कर कहती है कि तुमने धुँधले आलोक से पूर्ण अत्यंत हल्का और नीले धागों से बना अपना सुगंधित आँचल सा मेरे हृदय पर डाल दिया है तथा वह मुझे वरदान सदृश्य जान पड़ता है। इस अर्थ यह है कि लज्जा ने श्रद्धा के हृदय में लज्जा और वासना का संचार कर दिया है।

    श्रद्धा कह रही है कि लज्जा का आँचल पड़ते ही मेरे सभी अगंभोग के समान कोमल हो रहे हैं और जाने क्यों अपने क्यों अपने आप ही में मै सिमटी सी जा रही हूँ तथा इस संकोच भावना के कारण मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे कोई मेरी हँसी सी उड़ा रहा है। इस प्रकार श्रद्धा ने यहाँ स्पष्ट करना चाहा है कि लज्जा के उदय होने पर शरीर कोमल हो जाता है और वह लचकने लगता है तथा हृदय में संकोच की भावना भी बुलाती हो उठती है।

    श्रद्धा लज्जा से कहती है कि तुमने मुझमें यह कैसा परिवर्तन कर दिया है कि मैं जोरो से हँसना चाहती हूँ परंतु संकोच के कारण मेरी हँसी मंद मुस्कान बन कर ही रह जाती है और मेरे नेत्रों में तिरछापन गया है तथा मैं जो भी प्रत्यक्ष देखती हूँ वह मेर लिए स्वप्न बन जाता है।

    श्रद्धा का कहना है कि जिस प्रकार स्वप्न काल की समाप्ति पर अर्थात रात्रि व्यतीत हो जाने के पश्चात सृष्टि में कोलाहाल मच जाता है अर्थात समस्त संसार जाग उठता है और मधुर स्वर लहरी वायु तरंगों पर तैरती हुई चारों ओर फैलने लगती है उसी प्रकार मेरी कल्पनाओं की समाप्ति पर मेर हृदय में भी प्रेम की मधुर ध्वनि गूंज उठी जो कि भावों से एकाकार हो मेरे समस्त जीवन में छा गई।

    श्रद्धा कह रही है कि जब मेरी समस्त अभिलाषाएँ अपनी पूर्ण तीव्रता के साथ मिलन-सुख का स्वागत करने चली और जब उन्होंने मुझे अपनी जीवन की समस्त शक्ति तथा सुंदरता से दूर से आए हुए उस आनंद के शिखर मनु से समागम करने उनका सत्कार करने की प्रेरणा दी तब उसी समय तुमने साहसपूर्वक वह किरणों के समान उज्जवल आशाओं की डोर खींच ली जिसके सहारे मैं प्रेमरूपी झरने में प्रविष्ट हो आनंदरूपी पर्वत की चोटी तक पहुँचती। वस्तुत इन पंक्तियों में एक दृश्य अक्ति किया गया है जिसमें एक विशाल पर्वत है जिससे कि झरना निकल रहा है और उसका जल चारों ओर फैल रहा है। जल के समीप एक युवती खड़ी है जो कि उस पर्वत की चोटी तक पहुँचना चाहती है लेकिन पहुँच नहीं पाती। वह जानती है कि उस पर्वत की चोटी तक पहुँचनने के पूर्व उस जल में प्रवेश करना होगा तथा इसके बावजूद किसी रस्सी के सहारे ही उस चोटा तक पहुँचा जा सकता है। उसे वह रस्सी दिखाई देती है और जैसे ही वह उसका सहारा देकर उस चोटी तक पहुँचने का विचार करती है वैसे ही कोई अन्य नारी उस रस्सी को अलग कर उसे निराशा कर देती है। वास्तव में यहाँ पर्वत आनंद का प्रतीक है तथा झरना प्रेम का और रस्सी आशा का तथा वह युवती श्रद्धा ही है और वह रस्सी अलग करने वाली नारी लज्जा है।

    श्रद्धा लज्जा की संबोधित कर कहती है कि तुमने मुझसे यह कैसा परिवर्तन ला दिया है कि मैं पहले जिस मनु के साथ निस्संकोच रहती थी उसी मनु को अभ स्पर्श करते समय मुझे झिझक सी होने लगती है और संकोच के कारण उनकी ओर देख भी नहीं पाती तथा पलकें नीचे की ओर झुक जाती हैं। साथ ही परिहासपूर्ण वार्तालाप करने की अभिलाषा भी मन की मन में ही रह जाती है और बाणी मेरे अधरों तक आकर रुक जाती है।

    श्रद्धा का कहना है कि मेरे हृदय की स्थिति शारीरिक रोमांचों से सहज ही स्पष्ट हो जाती है और मेरे रोम-रोम खड़े होकर मानो मुझे संकेत कर प्रेमपथ में आगे बढ़ने से रोकने चाहते हैं। मैं भले ही कुछ कहूँ लेकिन भौंहे ही मेरे हृदय के भावों को व्यक्त कर देती हैं और यह स्पष्ट हो जाता है कि मेरे हृदय में प्रेमभावना है परंतु मेरी भौंहो की इस भाषा को सबी नहीं समझ सकते तथा इसे तो वही समझ सकता है जो इसे पढ़ने में निपुण हो। इसका अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार किसी पुस्तक में लिखी पंक्तियों की भाषा का अर्थ उस समय तक स्पष्ट नहीं हो पाता जब तक कि उन्हें समझने वाला कोई हो उसी प्रकार उसकी (श्रद्धा की) भौंहो के इशारों का अर्थ उस समय तक स्पष्ट नहीं हो सकता जब तक कि मनु उसे समझने का प्रयास करें।

    श्रद्धा लज्जा को संबोधित कर कहती है कि तुम हो जो मेरे हृदय को मजबूर किए दे रही हो और तुमने क्यों मेरी स्वतंत्रता छीन ली है तथा इस जीवनरूपी वन में जो प्रेम के स्वच्छंद फूल खिले हुए हैं उन्हें तुम क्यों बीने लिए जा रही हो। इसका अभिप्राय यह है कि लज्जा जब हृदय में श्रविष्ट होती है तब नारी क्रियात्मक रूप से कुछ भी नहीं कर पाती और उसे अपनी इच्छाओं का दमन करना ही पड़ता है। साथ ही लज्जा के कारण प्रेमपूर्ण भावना भी स्पष्ट रूप से व्यक्त नहीं की जा सकती।

    श्रद्धा की बातें सुनकर संध्या की लालिमा में लिपटी वह लज्जा रूपी छाया मुस्कराते हुए अस्फुट शब्दों से कुछ कहने लगी और उस समय ऐसा प्रतीत हुआ कि मानो वह श्रद्धा के प्रश्नों का उत्तर दे रही हो।

    लज्जा श्रद्धा से कह रही है कि तुम मुझे देखकर इतना अधिक आश्चर्यचकित हो और यदि तुमने मेरी बातें मान ली तो इसमें तुम्हारा ही कल्याण है। लज्जा का कहना है कि मैं स्वयं तो हृदय की एक ऐसी रुकावट हूँ जो हमेशा यही कहा करती है कि आवेश में आकर कोई कार्य करो और और किसी भी काम को करने के पूर्व भली-भाँति यह सोच लो कि इसका परिणाम सुखद है या दुखद यहाँ लज्जा यह स्पष्ट कर देती है कि वह प्रेमोन्मादिनी स्त्रियों को यह सोचने का अवसर देती है कि वे अपना हृदय किसी को अर्पित करने से पूर्व भलीभाँति सोच समझ लें।

    लज्जा श्रद्धा से कह रही है कि मैं नवयुवतियों के उस सौंदर्य पर नियंत्रण रखती हूँ जो कि उनके शरीर में अत्यंत मादकता के साथ तीव्र गति में प्रवाहित होता रहता और जिसका स्वरूप उस पर्वतीय झरने के समान होता है जो आकाश तक पहुँचने वाली ऊँची-ऊँची बर्फ़ीली चोटियों से निकल कर अत्यंत मधुर ध्वनि करता हुआ बिजली की धारा के समान तीव्र धारा में प्रवाहित होता है तथा जिसके प्रवाह में एक प्रकार की मादकता रहती है।

    लज्जा श्रद्धा से कहती है कि मैं उन नवयुवतियों की सरक्षिका हूँ जिनमें मंगल कुसुम की लालिमा के समान सौंदर्य की काति हो, जो ऐसी जान पड़ती हो मानो कि उषा की लालिमा उके अंगों में झलक रही हो तथा जो कि अत्यंत भोली और सौभाग्यवती होकर इकठाली हो जिनमें नवीन इच्छाओं के कारण प्रसन्नता भरी हुई हो।

    लज्जा कह रही है कि यौवन काल में सुंदरता की वृद्धि हो जाने से देखने वालों को वह अपूर्व सुखकारी जान पड़ता है और पूर्ण विकसित फूल की भाँति आनंददायक होता है। जिस प्रकार वसंत ऋतु आने पर वन की सभी ऐश्वर्यशालिनी वस्तुओं में से कोयल की सुरीली वाणी पृथक रूप से पहचानी जा सकती है उसी प्रकार जीवन की समस्त विभूतियों में यौवन की उत्कृष्टता स्पष्टता स्पष्ट प्रकट हो जाती है। इस प्रकार लज्जा ने यहाँ यह स्पष्ट करना चाहा है कि जीवन के अनंत ऐश्वर्य के मध्य यौवनकालीन सुंदरता का विशेष महत्व है पर वह अर्थात लज्जा उसी सुंदरता पर नियंत्रण रखती है तथा नवयुवतियों को बहकने नहीं देती।

    लज्जा का कहना है कि जिस प्रकार कोयल की सुरीली कूक श्रोताओं को रोम-रोम में छा जाती है उसी प्रकार यौवन का माधुर्य भी दशक की नस-नस में समा जाता है और उसे देखते ही विभिन्न प्रकार के मनोहर दृश्य नेत्रों के समाने नाचने लगते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि यौवन-कालीन सुंदरता शरीर के अग-प्रत्यय को अपनी मधुरिमा से पूर्ण कर देती है और एक प्रकार की मूर्च्छा का सा आभास होने लगता है तथा विभिन्न मोहक कल्पनाएँ मन में उठने लगती हैं। इस प्रकार लज्जा नवयुवतियों पर अपना नियंत्रण रखती है जिससे कि उनके कदम कहीं बहक जाएँ।

    लज्जा कहती है कि जिस प्रकार नीलम के पर्वतों की घाटियों में उमड़ने वाले जल से पूर्ण बादलों के छा जाने से अपूर्व सुंदरता छा जाती है उसी प्रकार यौवन के प्रविष्ट होते ही काली-काली पुतलियों वाली नवयुवतियों के नेत्रों में रस भर जाती है और जैसे उन घने बादलों के मध्य से बिजली कौंव-कौंव कर अपने अंतर में ही शीतलता व्यक्त करती है उसी प्रकार यौवन रूपी बिजली की बाहरी चकाचौंध से हृदय को एक प्रकार का क्षपार आनंद प्राप्त होता है तथा प्रेम की शीतल धारा सी बहने लगती है।

    लज्जा श्रद्धा को संबोधित कर कह रही है कि मैं उन नवयुवतियों की देखभाल करती हूँ जिनका सौंदर्य वसंत ऋतु की सी मादकता पूर्ण लहरों से युक्त हो और जिनमें अपने प्रेमियों से मिलने की वैसी ही उत्सुकता हो जैसी गोधूलि के समय जंगल से लौटती हुई गायों के हृदय में अपने बछड़ों के प्रति रहती है तथा जिनमें प्रभातकाल की सी प्रसन्नता और दुपहर का सा तेज़ हो।

    लज्जा का कहना है कि जिस प्रकार पूर्व दिशा के आकाश से अचानक चाँदनी छिटक पड़ती है उसी प्रकार यौवन काल में सौंदर्य भी शरीर से अक्समात फूट पड़ता है और जैसे नवीन चाँदनी सरोवर की लहरों पर पड़कर, फिसल-फिसल कर भाँति-भाँति की क्रीड़ाएँ करती है उसी प्रकार यौवनावस्था में रूप की चंद्रिका भी अचानक प्रस्फुटित हो सबको आश्चर्यचकित हो निहारती है तथा हृदय और मस्तिष्क में उत्पन्न विविध प्रकार के भावों से क्रीड़ाएँ किया करती हैं।

    लज्जा श्रद्धा से कह रही है कि मैं उन सुंदर नवयुवतियों पर नियंत्रण रखती हूँ जिनके स्वागत में फूल अपनी कोमल पंखुड़ियों की बिखेर देते हैं और जिनके स्वागत के लिए कुँकुम मिश्रित चंदन में वे अपना रस मिलाते हैं।

    लज्जा का कहना है कि जिस प्रकार किसी सम्राट के आगमन पर जय घोषणा की जाती है उसी प्रकार कोमल पल्लवों से जो अस्फुट मर्मर ध्वनि निकलती है वह मानो यौवन की विजय घोषणा ही है और उस समय सभी मानसिक भावनाएँ चाहे वे दुखपूर्ण हो या सुखपूर्ण, आनंद-लीन ही रहती हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि यौवनोन्माद में एक विशेष प्रकार के आनंद से पूर्ण मादकता के रहने के कारण अन्य भावनाओं का विशेष प्रभाव नहीं पड़ता।

    लज्जा का कहना है कि चेतन जगत के हेतु यह यौवन ही भगवान का शुभ्र वरदान है और इसी का दूसरा नाम सौंदर्य भी है अर्थात यौवनावस्था विश्व के समस्त चेतन प्राणियों के लिए एक वरदान सहरा ही है क्योंकि इस यौवनकाल में हृदय में जाने कितनी विविध कल्पनाएँ स्वप्नों की भाँति उठा करती हैं और मन में मधुर भावनाओं का जन्म होता है।

    लज्जा कह रही है कि मैं चंचल यौवन और सौंदर्य की धाय अर्थात सरंक्षिका हूँ। अतएव जिस प्रकार एक कुशल धाय अपने नियंत्रण में रहने वाले चंचल वालक की देखरेख करती है तथा गौरव और महकता का पाठ पढ़ाती है उसी प्रकार मैं भी यौवन और सौंदर्य को धारण करने वालो नारी जाति को पग-पग पर सचेत करती है। लज्जा का कहना है कि मैं नारी को अच्छी आदतें सिखाकर विपत्तियों से बचने का प्रयास करती है और जब नारी आवेश में आकर उच्छृखंलता की ओर बढ़ती है तब मैं उसे सावधान कर भावी विपत्तियों से बचने की प्रेरणा देती हूँ।

    लज्जा श्रद्धा के समक्ष अपना परिचत देते हुए कहती हैं कि मैं वही रति हूँ जो देव जाति के उत्थान काल में अखंड वैभव से पूर्ण थी परंतु प्रलय में देव जाति का विनाश होने पर अब अपने पति कामदेव से बिछुड़कर परित्यक्त और दीनता की मूर्ति मात्र हूँ अर्थात मैं देव बालाओं के मन में पहले जैसी प्रबल उत्तेजना उत्पन्न करने की शक्ति नहीं रखती और जीवन की संपूर्ण अतृप्ति एकत्र कर इधर-उधर भटक रही हूँ।

    लज्जा कह रही है कि मैं तो अपने अतीत की असफलता मात्र रह गई हूँ अर्थात मैं अब अपने अंतर्तम में विगत जीवन की समस्त असफलताओं की अनुभूति कर रही हूँ। लज्जा का कहना है कि जिस प्रकार कामक्रीड़ा की चरम सीमा के पश्चात शरीर शिथिल हो जाता है और खिन्नता सी होने लगती है उसी प्रकार मेरी तीव्रता भी अब कम हो गया है। लज्जा के कहने का अभिप्राय यह है कि देव सृष्टि के समय स्वच्छद विलास से वह तृप्त नहीं हुई अंत वह स्वयं अपने आपको असफल ही समझती है और उन दिनों उसने विलास की पराकाष्ठा कर दी थी अंत आज उसे दुखपूर्ण मानस और श्रम से शिथिल शरीर को लेकर चारों ओऱ भटकता पड़ रहा है।

    लज्जा कह रही है कि मैं आज रति रहकर उसी की प्रतिमूर्ति लज्जा बन गई हूँ और अब युवतियों को संयम का पाठ पढ़ाना ही मेरा काम है तथा मैं उनका आवेग सयंत कर उन्हें उचित मार्ग दिखाती हूँ। लज्जा का कहना है कि जिस प्रकार का नृत्य के समय चरणों में घुँघरुओं के संयोग से एक प्रकार का नियंत्रण सा रहता है उसी प्रकार मैं भी युवा नारियों में एक प्रकार को सयंम भावना उत्पन्न करती हूँ जिससे कि वे यौवनोन्माद में कोई अनुचित कार्य कर बैठें। यहाँ लज्जा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वही नारी जाति को कुमार्ग पर जाने से रोकती है और जब कोई युवती किसी गलत मार्ग पर जाना चाहती है तब वही उसके चरणों में नूपुर सी लिपट कर अपनी आवाज़ से उसे सावधान कर देती है।

    लज्जा का कहना है कि मैं नवयुवतियों के कोमल गालों पर नालिमा के रूप में प्रकट होती हूँ और नेत्रों ने अंजन के समान दिखाई देती हूँ तथा उनके घुँघराले केशों घुँघरालेपन के रूप में जान पड़ती हूँ और युवतियों के मन में भरोर का रूप धारण कर प्रकट होती हूँ। कहने का अभिप्राय यह है कि लज्जा के द्वारा नवयुवतियों के कपोल, आँख, केश और मन में एक प्रकार का अद्भुत परिवर्तन होता है।

    लज्जा कह रही है कि मैं स्त्रियों की किशोरावस्था की चंचल सुंदरता की रक्षा करती हूँ अर्थात सुंदर किशोरियों के मन जब चंचल हो उठते है तब मैं उन पर नियंत्रण रखती हूँ जिससे कि वे कही इधर-उधर भटक जाएँ। साथ ही जिस प्रकार धीरे-धीरे कानों में मसलने पर वे लाल हो जाते हैं और भले ही उन्हें कुछ पीड़ा पहुँचती हो परंतु उनकी सुंदरता ही बढ़ती है उसी प्रकार मैं भी स्त्रियों के कानों की मसलन के समान हूँ। अतएव मेरे रोकने से नवयुवतियों को स्वच्छंदता कार्य कर पाने के कारण पीड़ा अवश्य होती है परंतु अंत में उसका परिणाम सुंदर ही होता है अर्थात लज्जा के कारण ही नारी में अपूर्व माधुर्य, संयम और प्रणयकाल का मधुमास का जाता है।

    लज्जा की बातें सुनने के पश्चात श्रद्धा ने कहा कि तुम जो कहती हो वह ठीक है लेकिन तुम मुझे यह तो बताओ कि अब मैं किस मार्ग का अनुसरण कर अपना जीवन व्यतीत करूँ और मुझे इस सृष्टि रूपी घोर अधकारपूर्ण रात्रि में प्रकाश की किरण से प्राप्त हो सकेगी? श्रद्धा के कहने का अभिप्राय यह है कि लज्जा उससे यह स्पष्ट करे कि आख़िर वह मनु के समक्ष आत्म समर्पण करे या करे और वह स्वयं किस प्रकार इस अज्ञान और दुविधा के अंधकार को दूर कर सकती है।

    श्रद्धा कहती है कि मैं इतना तो समझ गई हूँ कि मैं नारी होने के कारण स्वाभाविक ही दुर्बल हूँ और नारी की शारीरिक कोमलता ही मेरे पराजय का कारण है। श्रद्धा का कहना है कि यदि विचारपूर्वक देखा जाए तो अपने शारीरिक बल की हीनता के कारण ही स्त्री सर्वदा पराजित होती रही है।

    श्रद्धा लज्जा से कह रही है कि केवल मेरा शरीर ही कोमल और निर्वल है बल्कि मेरा सृदृढ़ मन भी जाने क्यों स्वयं ही ढीला होता जा रहा है। और जल से पूर्ण काले बादलों की भाँति मेरे नेत्र भी अश्रुपूर्ण हैं। श्रद्धा के कहने का अभिप्राय यह है कि उसके मन में अब मनु के प्रति आकर्षण बढ़ता जा रहा है और नेत्रों में स्नेहाश्रु गए हैं।

    श्रद्धा का कहना है कि जिस प्रकार कोई तापदग्ध प्राणी घने वृक्ष की छाँह को देख यही कामना करता है कि अब तो यही चुपचाप पड़ा रहूँ उसी प्रकार मेरे मन में भी अब यही अभिलाषा उत्पन्न हो रही है कि मै किसी मनुष्य के समक्ष अपना सब कुछ अर्पण कर उसके फलस्वरूप उत्पन्न दृढ़ विश्वास रूपी वृक्ष की घनी छाया में अपना सारा जीवन व्यतीत कर दूँ। इस प्रकार

    श्रद्धा यहाँ यह स्पष्ट कर रही है कि वहु मनु को अपना सर्वस्व समर्पित कर उनके जादू भरे प्रेम की छाया में चुपचाप पड़ी रहना चाहती है।

    श्रद्धा कह रही है कि मेरे मन में आज यही अभिलाषा हो रही है कि मैं आकाश गंगा में टिमटिमाते हुए तारों के प्रकाश की भाँति अपने जीवन का आदर्श बनाऊँ। श्रद्धा के कहने का अभिप्राय यह है कि वह अंतरिक्ष से प्रकाशवान तारागणों की भाँति अपना जीवन प्रकाशपूर्ण रखना चाहती है। श्रद्धा पुन कहती है कि जाने क्यों मेरे मन में यह इच्छा बार-बार जाग्रत होती है कि मन मनु के साथ कोमलता, भोलापन एवं परिश्रम से युक्त मधुर क्रीड़ाएँ करती रहूँ।

    श्रद्धा का कहना है कि मैं अपने सरोवर में निराश्रित तैर रह हूँ और मैं इसी निष्कर्ष पर पहुँची हूँ कि मैंने जो पथ निश्चित लिया है वही ठीक है तथा मेरे नेत्रों के सामने स्वप्नों का एक संसार सा उपस्थित हैं और मैं उन्हीं स्वप्नों में निमग्न रहना चाहती हूँ। इस प्रकार श्रद्धा यही कहना चाहती है कि मेरी यही अभिलाषा है कि मेरे स्वप्नों की इस सुखद रात्रि का अंत हो और मैं हमेशा सोती रहूँ अर्थात अपनी इस रम्या भावना में निमग्न होकर कि पुरुष का आश्रय पाकर फिर कुछ करना शेष नहीं रहता वह अन्य किसी प्रकार की जागृति की कल्पना नहीं करना चाहती।

    श्रद्धा लज्जा से कह रही है कि जिस प्रकार कोई चित्रकार चित्र बनाने से पहले कुछ अस्पष्ट रेखाएँ सोचकर उनमें रंग भर कर उसे कलाकृति का रूप प्रदान करता है उसी प्रकार तुम भी नारी जीवन का चित्र अंकित करने से पहले नारी के भविष्य की घुँघली सी रेखाएँ सीखकर उनमें व्याकुलता का रंग भर कर उसे नारी का रूप प्रदान करती है।

    श्रद्धा का कहना है कि मैं स्वयं भी प्रेमपथ में अग्रसर होने से रुक जाती हूँ और मेरे हृदय से विभिन्न भावानाएँ उठती हैं तथा मेरी अवस्था कुछ ऐसी हो गई है कि मैं स्वयं कुछ भी नहीं सोच पाती। श्रद्धा कह रही है कि जैसे कोई पागल स्त्री रात दिन कुछ भी बक-झक करती रहती है और उसकी बातें का पारस्परिक संबंध नहीं होता उसी प्रकार मेरे हृदय में भी जाने कितने प्रकार की असम्बद्ध भावनाएँ उठा करती हैं तथा मैं किसी उचित निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाती।

    श्रद्धा का कहना है कि मैं जब भी अपने आपको समयित रखने का प्रयत्न करती हूँ तो मेरा मन विवश सा हो जाता है और भरसक यह प्रयत्न करने पर भी कि बुद्धि तथा तर्क द्वारा अपने हृदय को वश में करूँ, मैं अपने प्रयत्न में असफल रहो रही हूँ अर्थात मेरी बुद्धि पर प्रेम-भावना विजयी हो जाती है। श्रद्धा कहती है कि जिस प्रकार कोई लता किसी तरु को बाँधने के प्रयास में स्वयं ही हिंडोलों की भाँति झूलने लगती है उसी प्रकार मैं भी मनु का सहारा लेकर उनकी ग्रीवा में अपनी भुजाएँ डालना चाहती हूँ। श्रद्धा के कहने का अभिप्राय यह है कि अब मैं मनु का आश्रय लेने के लिए विवश सी हो गई हूँ और मैं चाहती हूँ कि अपनी स्वतंत्र सत्ता समाप्त कर दूँ।

    श्रद्धा कह रही है कि मेरा यह आत्मसमर्पण किसी स्वार्थवश नहीं है बल्कि इसमें तो मेरी त्याग भावना ही प्रधान रूप से है और मेरे इस सरल हृदय ने तो देना ही सीखा है तथा वह लेना नहीं जानता।

    श्रद्धा की बातों को सुनकर लज्जा ने कहा कि मुझे तुम्हारी बातें सुनकर आश्चर्य हो रहा है क्योंकि तुमने तो पहले ही अपने जीवन की मधुर इच्छाएँ अश्रुओं रूपी जल का सकल्प देकर दान कर दी हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि समस्त सुख वैभव उन्हें दान कर दिया अतः अब मनु के प्रति समर्पित होन या होन का कोई प्रश्न ही नहीं उठताय।

    लज्जा का कहना है कि हे नारी, तुम तो केवल श्रद्धा की ही मूर्ति हो और तुम्हारा दूसरा नाम तो श्रद्धा ही है तथा तुम्हारा हृदय हमेशा पवित्र भावनाओं से पूर्ण रहता है। लज्जा श्रद्धा से कह रही है कि जिस प्रकार पर्वत की तलहट में मीठे पानी के झरने वहते हैं उसी प्रकार तुम भी अपने हृदय में अगाध विश्वास लिए जीवन की सुंदर समभूमि में निरंतर प्रेम की धारा प्रवाहित करती रही अर्थात उन मधुर झरनों की भाँति अपरिमित विश्वास लिए मानवजीवन को अपनी सुधासिक्त वाणी से शीतलता प्रदान करती रहो।

    लज्जा श्रद्धा से कहती है कि आज तक का इतिहास इस बात का साक्षी है कि देवताओं और दानवों में हमेशा युद्ध होना रहा तथा अंत में देवताओं की ही विजह होती है। इसी प्रकार हृदय में भी सत् और प्रसत् भावनाएँ एक दूसरे की स्वाभाविक ही विरोधिनी हैं तथा उनमें संघर्ष चलता ही रहता परंतु इस संघर्ष में भी सत् की विजय और अमत् की पराजय होती है लेकिन जिसस प्रकार विजेता के सामने पराजित को अपना सब कुछ सौंपना पड़ता है उसी प्रकार तुम स्वयं भी, अब मनु के सामने आत्मसमर्पण के लिए उत्सुक हो गई हो।

    लज्जा श्रद्धा से कह रही है कि मनु के समक्ष तुम्हारे इस आत्मसमर्पण का परिणाम यह होगा कि तुम्हें अपने मन की सभी इच्छाएँ पुरुष को अर्पित कर यह प्रतिज्ञा करनी होगी कि चाहे पुरुष तुम्हें कितना ही दुखी क्यों करे परंतु तुम उसके सुख के लिए ही हमेशा प्रसन्नचित होकर प्रयत्नशील रहोगी।

    स्रोत :
    • पुस्तक : कामायनी (पृष्ठ 95)
    • संपादक : जयशंकर प्रसाद
    • रचनाकार : जयशंकर प्रसाद
    • प्रकाशन : भारती-भंडार
    • संस्करण : 1958

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