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कवित्त

kavitt

भूषण

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भूषण

और अधिकभूषण

    [घनाक्षरी]

    इंद्र जिम जंभ पर बाड़व ज्यौं अंभ पर, रावन सदंभ पर रघुकुलराज है।

    पौन बारिबाह पर संभु रतिनाह पर, ज्यौं सहस्रबाहु पर राम द्विजराज है।

    दावा द्रुमदंड पर चीता मृगझुँड पर, भूषन बितुंड पर जैसे मृगराज है।

    तेज तम-अंस पर कान्ह जिम कंस पर, यौं मलेच्छ-बंस पर सेर सिवराज है॥50॥

    [घनाक्षरी]

    उद्धत अपार तुअ दुंदुभी-धुकार-साथ, संघे पारावार बृंद बैरी बालकन के।

    तेरे चतुरंग के तुरंगनि के रँगे-रज, साथ ही उड़त रजपुंज हैं परन के।

    दच्छिन के नाथ सिवराज तेरे हाथ चढ़ैं, धनुष के साथ गढ़-कोट दुरजन के।

    भूषण असीसैं, तोहिं करत कसीसैं पुनि, बाननि के साथ छूटे प्रान तुरकन के॥104॥

    शिवाजी—[कवित्त]

    साजि चतुरंग-सैन अंग में उमंग धारि, सरजा सिवाजी जंग जीतन चलत है।

    भूषण भनत नाद-बिहद नगारन के, नदी-नद मद गैबरन के रलत है।

    ऐल-फैल खैल-भैल खलक में गैल-गैल, गजन की ठैल-पैल सैल उसलत है।

    तारा से तरनि धूरि-धारा में लगत जिमि धारा पर पारा पारावार यों हलत है॥411॥

    बेद राखे बिदित पुरान परसिद्ध राखे राम-नाम राख्यो अति रसना सुघर में।

    हिंदुन की चोटी रोटी राखि है सिपाहिन की, काँधे में जनेऊ राख्यो मालाराखी गर में।

    मीड़ि राखे मुग़ल मरोड़ि राखे पातसाह बैरी पीसि राखे बरदान राख्यो कर में।

    राजन की हद्द राखी तेग-बल सिवराज देव राखे देवल स्वधर्म राख्यो घर में॥420॥

    [कवित्त]

    सबन के ऊपर ही ठाढ़ो रहिबे के जोग ताहि खरो कियो छः हजारिन के नियरे।

    जानि गैरमिसिल गुसीले गुसा धारि मन, कीन्हो ना सलाम बचन बोले सियरे।

    भूषण भनत महाबीर बलकन लाग्यौ सारी पातसाही के उड़ाय गए जियरे।

    तमक तें लाल मुख सिवा को निरखि भए स्याहमुख नौरँग सिपाह-मुख पियरे॥443॥

    तेज, छाजत सुजस बड़ो, गाजत गयंद दिग्गजन हिय साल को।

    जाहि के प्रताप सों मलीन आफताब होत, ताप तजि दुजन, करत बहु ख़याल को।

    साज सजि गज तुरी पैदर कतार दीन्हे, भूषण भनत ऐसो दीन-प्रतिपाल को।

    आन रावराजा एक मन में लाऊँ अब, साहू को सराहौं कै सराहौं छत्रसाल को॥512॥

    भूषण कवि कहते हैं कि इंद्र ने जिस प्रकार जंभासुर नामक दैत्य पर आक्रमण करके उसे मारा था और जिस प्रकार बाडवाग्नि समुद्र के पानी को जलाकर सोख लेती है, अभिमानी एवं छल-कपटी रावण पर जिस प्रकार श्रीराम ने आक्रमण किया था, जैसे बादलों पर वायु के वेग का प्रभुत्व रहता है, जिस प्रकार शिवजी ने रति के पति कामदेव को भस्म कर दिया था, जिस प्रकार सहस्रबाहु (कार्त्तवीर्य) राजा को परशुराम ने आक्रमण कर मार दिया था, जंगली वृक्षों पर दावाग्नि जैसे अपना प्रकोप दिखलाती है और जिस प्रकार वनराज सिंह का हिरणों के झुंड पर आतंक छाया रहता है अथवा हाथियों पर मृगराज सिंह का आतंक रहता है, जिस प्रकार सूर्य की किरणें अंधकार को समाप्त कर देती हैं और दुष्ट कंस पर जिस तरह आक्रमण करके भगवान् श्रीकृष्ण ने उसका विनाश कर दिया था, उसी प्रकार सिंह के समान शौर्य एवं पराक्रम वाले छत्रपति शिवाजी का मुग़लों के वंश पर आतंक छाया रहता है। अर्थात् वे मुग़लों का प्रबल विरोध करते है और वीरतापूर्वक उन पर आक्रमण कर विनाश-लीला करते हैं। उनके शौर्य से समस्त मुग़ल भयभीत रहते हैं।

    स्रोत :
    • पुस्तक : भूषण (पृष्ठ 250)
    • संपादक : विश्वानाथप्रसाद मिश्र
    • रचनाकार : भूषण
    • प्रकाशन : वाणी प्रकाशन
    • संस्करण : 2010

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