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हम गाण्डीव, गदा छी भीमक, हरक सुतीक्ष्ण त्रिशूल,

चकमक चक्र सुदर्शन कृष्णक, कालक दण्ड अतूल।

हमर शक्ति लखि त्रिभुवन कम्पित, सद्यः असुर डेराथि,

लक्ष्य विभेद होइछ नहि, पामर रण-थल छोड़ि पड़ाथि॥

हम छी सिंह, श्रृगालक राजा, दी गज-कुम्भ विदारि,

मृग, शूकर जँ भरए चौकड़ी, नरबी शेखी झाड़ि।

अछि अवाध गति हमर जगत मे, फिरइत छी निर्द्वन्द्व,

छन मे लाँघि जाइ सागर, वन, करत बाट के बन्द॥

गर्वोन्नत गिरि सम्मुख आओत, हएत स्वयं शतखण्ड,

महाशक्ति हमरा मे सीमित, महिमा जनिक प्रचण्ड

प्रलयानल हम, हमर ज्वाल सँ पाप-ताप जरि जाए,

दुर्बल छीनि बली आगाँ सँ रोटी हँसि-हँसि खाए॥

स्वयं विघ्न हमरा सँ शङ्कित, के विघ्नक चट्टान?

सहत हमर की पदाघात ओ, जे देखितहिँ हो म्लान?

हम छी वैह परशुधर, नरहरि, जनिका के नहि जान;

मानिक मान राखि, अभिमानिक चूर्ण करी अभिमान॥

देखि सुनीतिक हत्या, छोड़ए रोम-रोम अङ्गार,

जरए कुनीति, सजग हो साहस सुनितहिँ दृढ़ हुङ्कार।

हम विभूति छी पुरुष-प्रकृति केर, जनिक कहिओ अन्त,

हमर तेज सँ उद्भासित छथि रवि-शशि अओर दिगन्त॥

महाकाल हम, प्रलय मचाबए हमरे ताण्डव-नृत्य,

हो भूकम्प, बङ्क भ्रू होइतहिँ जारी नाशक कृत्य।

हम साकार सत्य छी, सहचर शौर्य, सुदृढ़-सङ्कल्प,

नूतन अछि सन्देश, करी जर्जर केर काया कल्प॥

क्लान्ति-श्रान्ति हमरा नहि व्यापए, सजग रही सदिकाल,

माया-मोह हटाओल मन सँ, तोड़ल दृढ़-भ्रम-जाल।

जीवन-मृत्यु-परिधि सँ बाहर, छी मृदु, परम कठोर,

अणु-अणुमे हम व्याप्त, हमर दृढ़ताक ओर नहि छोर॥

हम सेवक छी दीन-दुखी केर, कोमल मन सँ प्रीति,

काल-दण्ड छोड़ी तकरा पर, करइछ जे अनरीति।

देखि दुखित पीड़ित केँ हिअ-तल मोम जकाँ गलि जाए,

बिसरि जाइ सुधि-बुधि हम, तनिका कानी कण्ठ-लगाए॥

हमर प्रेम-वर्षा सँ नाचए सत्-हृदयक मन-मोर,

हमर न्याय-प्रियता सँ काँपथि थर-थर डाकू-चोर

प्रलय-गान सुनि हमर खलक दल बनल रहए भयभीत,

सज्जन-जन सँ प्रीति जनाबथि सुनि प्रेमक सङ्गीत।

स्रोत :
  • पुस्तक : भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’ रचना-संचयन (पृष्ठ 75)
  • संपादक : अजीत मिश्र
  • रचनाकार : भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’
  • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
  • संस्करण : 2024

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