यह ढीठ बारिश
ye Dheeth barish
यह ढीठ बारिश, बेदर्द-सी
टाँगती जाती है पर्दे जो छुपा लेते हैं मुझे दुनिया से।
आज मेरे पास
उस प्रवासी आकाश का टुकड़ा तक न होगा
जो मेरी मदद के लिए जाग जाता था भोर से पहले।
और तेरी याद की सिहरन दौड़ने लगती है मेरे बदन में।
इस याद का दौर लंबा है, उदास-सा कुछ-कुछ
हाँ यक़ीनन उदास, कितना उदास हूँ मैं, मगर दर्द के आगे
घुटने टेकने से पहले कस लूँगा मुट्ठियाँ।
कमज़ोर नहीं बना जा सकता इस गुस्ताख़ दुनिया में।
कभी मेरा दिल इतना नाजुक था;
रोता था बच्चे की तरह हर चोट पर;
कभी ईंट का जवाब पत्थर से देना न सीखा
और उसे किसी हठी किरायेदार की तरह
निकाल फेंकना पड़ा।
न जाने कहाँ छुप जाता है जब बारिश होती है।
मुझे पुकारता है अक्सर। मगर बेकार ही।
महसूस करता हूँ जब उसके दूर होते अनाथ क़दमों को,
सोचता हूँ
कि सामना करेगा अपनी क़िस्मत का।
यह चिंता प्रेम की नहीं है
डरता हूँ तो सिर्फ़ बारिश से
जो गिरा सकती है मेरे सपनों का दिगंत
टँगा हुआ है जो
समुद्र की सतह से मीटरों ऊपर।
कभी-कभी मुझे लगता है मानों लौट आया हो दिल सोते में,
क्योंकि पहुँचा मुझे महसूस करने अपनी यतीमी में
यादों के बीच
और कमज़ोर पड़ने लगता हूँ मैं।
अभी भी पड़ा है रस्ते में
इतना अकेलेपन का आभास
हमलोग जो काम करते हैं खड़े-खड़े, बिना रियायत,
बहुत कठोर होता है हमारा दिन। और तुम मुझे कह सकोगे एक दिन,
बीत गया वह पल,
गुम हो चुका है तुम्हारा नाम काग़ज़ों के बीच,
नहीं पहचानता मैं वह चेहरा, जिसका इंतज़ार है तुम्हें।
कितना कुछ बदल सकता है प्रेम करने और भुला देने के बीच
इंतज़ार करना मरने के बराबर है, साँस चाहे बनी रहे।
ख़त्म होती जाती है उम्मीद और रह जाती है शाम कितनी सूनी।
अब खिड़कियों पर गिरती बारिश से भी तेज़ बरसता है दर्द
और धड़कता है कुछ यहाँ, अंदर।
मैं नहीं मरना चाहता एक धीरे-धीरे ख़त्म होती ज़िंदगी की मौत,
मैं मरना चाहता हूँ अविरल प्रेम के आकस्मिक धमाके से।
आह कितना याद आ रहे हो तुम मुझे इस पल।
तुम्हारी आवाज़ की नीलिमा, तुम्हारे हाथों का संगीत,
तुम्हारे चुंबन का फैलाव,
कोमलता का वह घेरा।
तुम आओ बसने के लिए मुक्त इस चाहत में
जो चढ़ती आती है घुमावदार रास्तों से पलकों तक।
तुम महसूस करोगे रोम-रोम से फूटता एक चुंबन
और मेरे तन मन में तैरोगे तुम जैसे पानी हो गुनगुना।
दुनिया के इस दर्द को बाहर फिंकवा दो मेरी साँस के रस्ते।
मर जाने दो मुझे अपनी बाँहों में मुहब्बत से।
मुहब्बत से अंत तक...
मुहब्बत के उस पार कुछ भी नहीं है।
कुछ है मेरे अंदर जो कराह रहा है या गा रहा है उदास आवाज़ में,
और यह होता है हर बारिश में।
मैं नहीं हूँ मैं, न मुझे परवाह है इस शिकायत की।
मैं नहीं हूँ मैं, न ही सुनता हूँ मैं कुछ।
कैसे समझँगा मैं यह ज़बान।
मुझे कुछ लेना-देना नहीं है इस बीमार दिल से
जिसे दुनिया में लाया मैं।
अब और ताक़त नहीं लगाऊँगा उसे चुप कराने की कोशिश में।
रोए, टूट जाए चाहे।
क्या कर सकता हूँ मैं भला?
यह जानता हूँ अच्छी तरह कि मर जाऊँ चाहे इस ही पल
मगर फिर भी किसी दृष्टिहीन की तरह
पुकारता जाएगा वह तुम्हें।
- पुस्तक : यह संपन्नता बिखरी हुई (पृष्ठ 171)
- संपादक : श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
- रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
- प्रकाशन : साहित्य अकादेमी एवं ग्रूलाक
- संस्करण : 2006
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.