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यादों का स्थानांतरण

yadon ka sthanantran

रेणु मिश्रा

रेणु मिश्रा

यादों का स्थानांतरण

रेणु मिश्रा

और अधिकरेणु मिश्रा

    यादों का स्थानांतरण नहीं होता

    वह घरों के कोनों, पर्दों, झालरों से

    और फ़ोटो फ़्रेमों में लगे

    इंसान के चेहरों से

    चिपकी रह जाती हैं

    वह ठहर जाती हैं

    आँखों की रेटिना में उल्टी होकर

    आँसुओं के पर्दे पर

    धुँधली होकर दिखती हैं

    मगर कमाल की बात है

    कि कभी हाथ नहीं आती

    हाँ! अगर कभी बहने की

    कोशिश भी करती हैं

    गालों से ढुलकते हुए,

    नमकीन-सा स्वाद लेकर

    ज़ुबाँ पर घुली मिलती हैं

    कभी लबों का किनारा पकड़ के

    लटकी मिल जाती हैं

    किसी अजनबी के मुस्कानों में

    और कभी-कभी

    किसी के नर्म हाथों की

    गर्माहट में महसूस हो उठती हैं

    कभी यक-ब-यक किसी पुराने ख़त में

    ख़ुद को छिपाए,

    सहमी पड़ी मिलती हैं

    या फिर

    कभी मन की छाल को

    चाटती रहती हैं दीमक की तरह

    और एक दिन ज़िंदगी को

    धूल कर देती हैं

    धूल उड़ जाता है

    मगर यादें...

    वह वहीं बनी रहती हैं

    यादों का स्थानांतरण नही होता!!

    स्रोत :
    • रचनाकार : रेणु मिश्रा
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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