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गह्वर

gahvar

निकोलाई रेरिख

और अधिकनिकोलाई रेरिख

    सर्वशक्तिमान, तू सर्वत्र है

    विद्यमान है हर चीज़ में

    तू दिन खुलने से पहले हमें जगाता है

    और सुलाता है अंधकार में।

    तू राह दिखाता है हमें भटक जाने पर

    पता नहीं किस ओर जाना हमें अच्छा लगा था

    तीन दिन हम भटकते रहे

    हमारे पास आग थी, शस्त्र और परिधान थे...

    बहुत सारे पक्षी और वन्य जीव थे चारों ओर

    और ऊपर थे सूर्यास्त और सूर्योदय

    और तीव्र सुगंध लिए हवाएँ।

    पहले हम विस्तृत घाटी से होकर गए

    खेत थे हरे-भरे

    और नीलिमा लिए खुला विस्तार

    फिर हम वन और काई से ढके दलदल से गुज़रे

    खिल रही थी धूपचंदन

    और हम काई से बचकर निकले

    निकल गए अथाह खिड़कियाँ छोड़ते

    धूप का अनुसरण करते रहे।

    घने बादल छा रहे थे

    अनुभव हो रहा था हवा का चलना

    भीगे हाथों से पकड़ते रहे उसकी लहरें

    वे शांत पड़ गई थीं

    कम हो जाते रहे थे वन

    हम चट्टानों की पंक्तियों में से होकर निकले।

    उज्जवल धमनियों की तरह

    व्यस्त थे पत्थरों से ढेर

    सृष्टि के प्राचीन कार्य में।

    उतराइयों से होकर हम नीचे आए

    कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था

    अँधेरा हो चला था

    हम विशाल मंदिर की सीढ़ियों से नीचे उतरे

    बादल और अंधकार से घिरे हुए।

    नीचे धुँध फैल रही थी

    और अधिक ढलानदार हो रही थीं सीढ़ियाँ

    कठिन हो रहा था काई पर से उतरना

    कुछ भी अनुभव नहीं हो रहा था पाँवों को अपने नीचे

    हम यहीं रात बिताएँगे

    सो लेंगे सुबह तक

    काई से ढकी चट्टान पर।

    नींद खुलने पर हमें सुनाई देगी

    अस्पष्ट उड़ानों की सीटियों जैसी आवाज़।

    बहुत दूर एक समान काँप रही है एक चीख़

    चमक उठा है पूरब।

    धुँध की परतों ने ढक रखा है घाटी को

    बर्फ़ की तरह तीखी ये परतें

    नीली तहों की तरह सट गई हैं एक साथ।

    हम बहुत देर तक बैठे रहे

    संसार की सीमाओं से बाहर

    धुँध के छूट जाने तक

    एक दीवार खड़ी हो रही थी हमारे ऊपर

    और नीचे चमक रहा था

    नीला गह्वर।

    स्रोत :
    • पुस्तक : निकोलाई रेरिख की कविताएँ (पृष्ठ 42)
    • रचनाकार : निकोलाई रेरिख
    • प्रकाशन : रेरिख अध्ययन परिषद, नई दिल्ली
    • संस्करण : 1995

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