Font by Mehr Nastaliq Web

वह जवान औरत

wo javan aurat

अनुवाद : सुरेश सलिल

विलियम कार्लोस विलियम्स

और अधिकविलियम कार्लोस विलियम्स

    दस बजे सुबह, वह जवान औरत

    रात के कपड़ों में ही

    परीशान हाल डोलती रहती है

    अपने पति के घर के पिछवाड़े

    लकड़ी की दीवारों के साथ-साथ

    मैं अपनी कार में गुज़र रहा होता हूँ अकेला।

    फिर दोबारा वह रास्ते के मोड़ पर

    प्रकट होती है बर्फ़वाले-मछलीवाले को आवाज़ देती

    और बिना चोली के, शरमाई हुई-सी खड़ी रहती है,

    उलझे और उड़ते बालों को सहेजती।

    मैं उसकी तुलना

    दरख़्त से टूट-गिरी एक पत्ती से करता हूँ।

    मेरी कार के बेआवाज़ पहिए

    ज़मीन पर बिछी सूखी पत्तियों के ऊपर से

    चरमर की आवाज़ करते दौड़ते हैं

    और इस तरह मैं

    गुज़र जाता हूँ उस रास्ते से

    मुस्कुराता हुआ।

    स्रोत :
    • पुस्तक : रोशनी की खिड़कियाँ (पृष्ठ 76)
    • रचनाकार : विलियम कार्लोस विलियम्स
    • प्रकाशन : मेधा बुक्स
    • संस्करण : 2003

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY