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व्यवस्था

vyavastha

दुर्गेश कुमार सजल

और अधिकदुर्गेश कुमार सजल

    अंततः किसे दोषी ठहराएँगे?

    किसके ऊपर करेंगे तय।

    उस व्यवस्था का दोष।

    वे भी घिसटते हैं, एक दिन।

    जो कभी अंग थे उसी व्यवस्था के।

    देखे जाते रहे हैं,

    पेंसन के लिए चक्कर लगाते।

    वे जो पेंसन की फाइलें चलाते थे।

    दहल जाते थे, जिनके तेवर से।

    जब वे बताते हैं,

    बिलखकर ऑन कैमरा, पुलिसिया बर्बरता।

    उन्हें याद आती हैं, तमाम गालियाँ,

    और क्रूरताएँ जो अब उनके सामने हैं।

    सिसकते हुए बताता है,

    दो महीने का वेतन, ना पाया चपरासी।

    जो अटका देता था फ़ाइलें।

    सब मिलकर गरियाते हैं,

    उस व्यवस्था को, जिसके जनक वही थे।

    अख़बार छाप देता है, सालों पुरानी रिपोर्ट,

    फलाँ की जगह फलाँ बदलकर।

    और व्यवस्था पसरती रही रक्तबीज-सी।

    स्रोत :
    • रचनाकार : दुर्गेश कुमार सजल
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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