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विषक भूजा

vishak bhuja

बिभा विमर्श

बिभा विमर्श

विषक भूजा

बिभा विमर्श

और अधिकबिभा विमर्श

    वन जाइत काल

    नहि कानल होयतीह सीते टा

    मानैत छी

    फाटल होयतनि रामोक करेज

    मुदा दुख मात्र

    लिखल छलनि सीतेक कपार

    ओहि अवध नरेशकेँ तँ

    बनबाक छलनि मर्यादा पुरुषोत्तम!

    आबो बदलू जानकी

    बड्ड भेल अबेर, चलू झटकारि

    नहुँए-नहुँए

    फूल तोड़ैत कालक स्नेहसँ

    मात्र नहि फड़िछायत रामक चरित्र

    आब अहाँकेँ करहि पड़त संवाद

    परखहि पड़त बेर-बेर पुरुषक नेत

    कतेक दैत रहब अहीँ अग्निपरीक्षा

    की आगियेमे जरिकऽ

    सीताकेँ ठहराओल गेलनि निर्दोष

    की सत्यसँ अनभिज्ञ रहथि राम

    मुदा बुधियारीसँ मारि लेलनि गुबदी

    नहि कानू

    जरू नहि किशोरी

    बदलू आब अपन सोच स्वभाव

    आजुक रावण

    कहाँ माँगैए बेर-बेर अनुमति

    अपरझटक कयल जाइत अछि प्रहार

    नोचल जाइत अछि अंग-अंग,

    छीनि लेल जाइत अछि

    जीबाक स्वछंद अधिकार

    मुदा एतबोपर

    कहाँ बकसल जाइत छी

    मुदा तैयो

    लगा लैत छी

    अपन बोलीपर लगाम

    मुँहमे शब्द रहितो

    बान्हि लैत छी जाबी

    अपने अपन छीनि लैत छी

    बजबाक अधिकार

    फेर कहब

    जे बाजियेकऽ की हैत

    के करत सगर विश्वास

    मुदा तैयो बाजू

    अहाँ काल्हुक सीता नहि छी

    बाजिकऽ कमजोर करू ओहि

    रामक पुरुषोत्तमाभिमान

    हे हमर सखी सीते

    नहि लगाउ गरमे फँसरी

    नहि तँ फाँकू विषक भूजा!...

    स्रोत :
    • पुस्तक : नहि सीता नहि (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 77)
    • रचनाकार : बिभा विमर्श
    • प्रकाशन : नवारम्भ, पटना/मधुबनी
    • संस्करण : 2023

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