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विकास

vikas

श्याम दरिहरे

और अधिकश्याम दरिहरे

    टटके टँगेलैए गाममे

    टेलीफोनक तार

    शीर्षासन कयने छै ठाढ़

    एकटा पोल

    कलबो मरड़क मड़ैयाक लगीच।

    मरड़ गुरगुरबै छथिन हुक्का

    भोर साँझ

    पोलेमे सटाक आब पीठ

    जड़कलामे आइ-काल्हि ओतहि

    सेकै छथि आब घाम

    पोलेक नीच्चा

    भऽ गेलनिए मने कलबा मरड़क दलान।

    खखसिकऽ अपन तमकुआयल ठोंठ

    बजइ छथि सगर्व—

    गुरुशरण जादब एमेले साहेब

    जखन फुनिआइ छथिन

    मुखमंत्रीसे

    अही पोल माँहे बलु गुजरइ हइ

    दुनूक बतकही

    ठीकाठीक हमरा माथक उप्परसे।

    नइ रहली आब हमहूँ सब मामूली

    एमेले-मुखमंत्री गप्पक

    ठीकाठीक नीचा बैसि

    करब बातक पजुआइ

    कोनो हँसी-ठट्ठाक बात थोड़बे ने हइ।

    कहाँ भेटल छलनि रुतबा

    पहिले कलबा मरड़केँ

    सुतंत्रतासँ एखन धरिमे कहिओ

    हँ, बात तँ छै दीगर जे

    कौआ कऽ दइ छनि चट्टक

    बेसीकाल हुनका माथेपर

    टेलीफोनक पोलसँ।

    स्रोत :
    • पुस्तक : क्षमा करब हे महाकवि [मैथिली कविता-संग्रह] (पृष्ठ 99)
    • रचनाकार : श्याम दरिहरे
    • प्रकाशन : नवारंभ, पटना/मधुबनी
    • संस्करण : 2016

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