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विचारों की धारा

vicharon ki dhara

विकास गोंड

विकास गोंड

विचारों की धारा

विकास गोंड

और अधिकविकास गोंड

    जिसने लगाई है तुम्हारे लिए कुर्सियाँ

    और मेज़ों पर चादर

    जिसने तुम्हारे उल्टे हुए चप्पल को

    अपने जीभ से किया सीधा

    जिसने तुम्हारे गुटखा खाकर थूके हुए

    निशान को धोया है रगड़-रगड़

    जिसने तुम्हारे पत्रिकाओं को सर पर रखकर पहुँचाया है घर-घर

    उस युवा कवि को तुमने बताया अर्जुन,

    युग का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर

    जिसके आएँ-बाएँ-साएँ पर तुम फुले नहीं समाते

    बताओ कवि तुम्हारी पॉलटिक्स क्या है?

    कविताएँ छपवाने के लिए चाहिए

    तो बस थोड़ी बहुत चाटुकारिता

    और संपादक के जूते को चाटने भर की हिम्मत

    छपने लायक कविताएँ

    सिर्फ़ जनेऊ पहन कर ही लिखी जा सकती है

    गाय भैंस चराने वाले लोग

    चाम छीलने वाले लोग

    कपड़ा धोने वाले लोग

    भुजा भुजने वाले

    जनेऊ पहनने वाले लोग

    सिर्फ़ चुटकुला लिखते है

    कम से कम संपादक महोदय का यहीं मानना है

    वे करते है दावा

    सबसे बड़ा बुद्धिजीवी होने का

    वे लिख देंगे किताबें

    जातिवाद पर, पूंजीवाद पर

    खोज लेंगे अपने वर्ण का अर्जुन

    इनके अर्जुन है महा थेथर

    चापलूसी में है बेहतर

    तुम्हारे विचारों की धारा पर थूकेगी दुनियाँ

    तुम्हे हज़ार लानत।

    स्रोत :
    • रचनाकार : विकास गोंड
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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