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विभावना

vibhavana

आरसी प्रसाद सिंह

और अधिकआरसी प्रसाद सिंह

    मने तँ पाथर ने, वनक ने घास-पात।

    कौखन जँ भऽए जाए असहन, तँ कोन बात?

    जीहे तँ, कनेक जाए कौखन जँ चूकि, भासि:

    अपराधेँ फेकल की कहू जाए तरासि?

    जकरे मुइल बाप, पात तकरे ने पड़य भात?

    मने तऽ पाथर ने, वनक ने घास-पात।

    पयरे तँ थिक, ने किछु गाड़ल बाँसक मचान।

    कौखन जँ रस्तासँ बहकि जाए, की अजान?

    अपसोचे करब कियै? के जानय अछि अगात?

    मने तँ पाथर ने, वनक ने घास-पात।

    माटिक मूरतियो तँ पावय छै पान-फूल

    बरदो तँ बसहा ओढ़ि घूमय छै लाल झूल।

    बतहो जँ बऽर, संग पुरिते छै बरियात।

    मने तँ पाथर ने, वनक ने घास-पात।

    जोड़ल नाम गेल जैखन अहाँक संग।

    चादरिमे हमर गेल बान्हल आँचरक रंग।

    करबै की, लागि जाए कोनो जँ मधुबसात?

    मने तँ माथर ने, वनक ने घास-पात।

    काजर केर कोठलीमे गलबेटा करय दाग।

    कारिखसँ बाँचि निदग जायव थिक बऽड़ भाग।

    के कहौ, लगौने अछि कोन काँट कतऽ घात?

    मने तँ पाथर ने, वनक ने घास-पात।

    मानी तँ गंगाजल, नञि मानी, तखन पानि।

    भावनाक दुनियामे मान्यतेक रहल मानि।

    माथपर बिहाड़ि, प्राण ताकय तंबू-कनात।

    मने तँ पाथर ने, वनक ने घास-पात।

    मनक संकेत फुलत मोनक सय-सय गुलाब।

    देहक भाषाक मुदा एकेटा छै जवाब।

    रक्तक आवेग एक कात, लोक एक कात।

    मने तँ पाथर ने, वनक ने घास-पात।

    स्रोत :
    • पुस्तक : सूर्यमुखी (पृष्ठ 51)
    • रचनाकार : आरसी प्रसाद सिंह
    • प्रकाशन : मैथिली अकादमी, पटना
    • संस्करण : 2011

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