अभी भी मुझे याद है उसने कहा था
कि लौट आएगा किसी एक वर्ष, एक वसंत में,
ठीक शाम के पाँच बजकर तीस मिनट पर, झुटपुटे में,
इससे पहले कि घंटा
मेरे टूटे हुए चेहरे में चोट करे
और कि दरवाज़े पर बैठा रह जाएगा
जैसे कि उस दिन
जैसे कि उस दिन।
उसकी छाया जो मेरे सामने है, छाया उसके स्वर की
कह रही मुझसे कि वह यहीं है, हालाँकि समय ठहर गया है,
कबूतर पंखों से इशारा कर रहे हैं
मानो फूलों से।
दरवाज़ा खुला है, सुनाई नहीं देता
हवा का घुस आना। मेज़ पर शांति है,
पर्दा, उजाड़ बग़ीचा, वे वस्तुएँ जो मैंने नहीं चाहीं,
फिर आवाज़ें बच्चों की
मानो कहीं दूर पदचाप रेलगाड़ी के।
उसके उन होटों से भी अधिक वास्तविक होट जो मुझे याद रह
गए हैं, गोधूलि में
कुछ नहीं कहेंगे, वह भी नहीं जो मैं जान चुकी हूँ
क्या वास्तव में यहाँ ही है वह
जिस पर मेरा हाथ ज्यों बच्चे का
अभी भी पाता है चिह्न चुंबनों के,
या फिर डिबिया ख़ाली रह जाएगी पानी से घिरे पहाड़ी के उस
कुएँ-सी?
निराशा ही अंतिम रूप है आशा का।
- पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 129)
- संपादक : श्यौराजसिंह जैन
- रचनाकार : ज़्वोनीमीर गोलोब
- प्रकाशन : बाहरी पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
- संस्करण : 1978
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