उन्होंने मुझे ऐसा कुछ नहीं दिया
unhonne mujhe aisa kuch nahin diya
उन्होंने मुझे ऐसा कुछ नहीं दिया कि मैं जीवित रह सकूँ
कोई आस्था कोई उम्मीद नहीं
कुछ नहीं जिसकी भीख माँग सकूँ
किसी बात का प्रायश्चित कर सकूँ
मुक्ति की कामना कर सकूँ।
कोई प्रेम नहीं मिला जिसे मैं इधर-उधर उड़ेल सकूँ
ताकि मैं यूँ ही न चीज़ों से टकराता फिरूँ
और लोगों का ध्यान आकर्षित करूँ
कि लोग मुझे कोमलता से देखें
मुझे अपनी बाँहों में लें।
उन्होंने मुझे कोई परंपरा या रीति-रिवाज नहीं दिए
कमोबेश मेरे सभी दिन एक जैसे हैं
मैं आने वाले किसी दिन से ख़ास उम्मीद नहीं रखता
उन्होंने मुझे यह क़ूवत दी कि क़दम-दर-क़दम मुझे पीड़ा मिलती रहे
इस बात की अक़्ल भी दी कि इस पीड़ा को सहन करता चलूँ
होंठ भींचकर कैसे दर्द पी जाऊँ।
उन्होंने मुझे बेरुख़ी दी
जो अक्सर फट जाती है
और मुझे नीचे गिरा देती है
उन्होंने मुझे ऐसी दुनिया दी
जिसमें मैं अक्सर डगमगाता रहता हूँ
यह डगमगाना मुझे ठीक से महसूस भी नहीं होता
मैं केवल एक भीड़ देखता हूँ
जिसमें लोगों ने टी-शर्ट पहन रखी है
जिस पर छपा हुआ है :
“मैं कोई नहीं हूँ, तुम कौन हो?”
हम गली में मिलते हैं
काम पर मिलते हैं
सिनेमा-हॉल में
शराबख़ानों में
हम बोलते हैं
सवालों का जवाब देते हैं
पर इस तरह ये करते जाने में हमें दर्द होता है
पर इससे बेहतर हम क्या करें
हम नहीं जानते।
मेरे कुत्ते मेरे प्रेमी हैं
वे मूर्ख बनकर दुम हिलाते रहते हैं
और अपने लिंग को चाटते रहते हैं।
जब मैं उन्हें लाड़ करने उनके पास जाता हूँ
वे सब कुछ छोड़कर पास आ जाते हैं
चुपके से मेरे बिस्तर में आकर चिपककर बैठ जाते हैं।
मैं ज़रा-सा दूर जाऊँ
तो मेरे पीछे चले आते हैं
ख़ुद को मुझसे सटाकर
मुझे हैरानी से देखते हैं।
मेरा पड़ोसी बीसवीं मंज़िल पर जाकर
छज्जे पर अपने कुत्तों को सैर कराता है
वह हड्डी दिखाता है और कुत्ते उसके पीछे भागते हैं।
मैं घर के अंदर ही अपने कुत्तों को खाना खिलाता हूँ
पानी पिलाता हूँ
आराम करने के लिए थोड़ा परे जाता हूँ तो
उनका कुनकुनाना और खुजलाना सुनता हूँ
मुझे पास नहीं देखकर वे भौं-भौं करते हैं।
पर अगर मैं उन्हें पार्क में खुला छोड़ दूँ
तो पगलाकर भाग जाते हैं
मैं घंटों उनका इंतज़ार करता हूँ
बैंच पर बैठकर मैं जब उनकी तरफ़ नहीं देखने का अभिनय करते हुए
मनुष्य के इतिहास पर लिखी कोई निकम्मी किताब पढ़ता हूँ
तो वे हाँफते हुए मैले-कुचैले होकर घिसटते हुए मेरे पास आते हैं
चुपचाप शांत होकर मेरे पैरों में बैठे रहते हैं
मेरे प्रेमी
इस इंतिज़ार में कि मैं उन्हें रस्सी से बाँध दूँ
ताकि हम बिस्तर में लौट सकें
वे मुझे चाट सकें
सूँघ सकें
चमकीली आँखों वाले मेरे लड़के
मुझे किसी और की ज़रूरत नहीं है
बचपन की परछाइयाँ दिन-रात मेरा पीछा करती हैं—
मुर्ग़ियों का वही बाड़ा बार-बार
वह सफ़ेद मुर्ग़ी मेरी स्मृति में खुदी पड़ी है
शायद इस उम्मीद से इसे ख़रीदा गया था कि ये सफ़ेद अंडे देगी
धूसर और चितकबरे मुर्ग़ों के बीच अकेली सफ़ेद मुर्ग़ी
मैंने तुरंत ही उसे अपना बना लिया
बाड़ के चारों ओर मैं इसका पीछा करता रहा
उसे मक्का खिलाया
उसकी बग़ल में ही पालथी मारकर मैं बैठ जाता
अँधेरा हो जाने पर मैं यह जानने के लिए इसके दड़बे को देखता
क्या यह एक टाँग पर सो रही है।
ख़ैर! इस मुर्ग़ी ने कभी अंडा नहीं दिया।
दादा चिल्लाए,
इस मुर्ग़ी का हम क्या करेंगे
इसे पालना बेकार है
ये किसी काम की नहीं
हम इसे मारकर खा जाएँगे।
मैं रोया,
नहीं, इस मुर्ग़ी को नहीं
यह मेरी मुर्ग़ी है
देखो तो कितनी सुंदर है यह
गोरी और कितनी अच्छी
और इसने कभी किसी का बुरा नहीं किया।
लेकिन दादा इसे नहीं छोड़ेंगे
कुछ दिनों बाद दादी ने बड़े लगाव से इसे देखा।
दादी ने कहा कि मुर्ग़ी में कुछ गड़बड़ लग रही है
उसने मुर्ग़ी को उसके पास लाने के लिए कहा।
मैं बड़े ध्यान से मुर्ग़ी के पास गया
ध्यान रखा कि हर बार की तरह अपना पैर इसकी बीट में न धँसा दूँ
मुर्ग़ी भी दुबक गई ताकि मैं आसानी से उसे उठाकर दादी को पकड़ा सकूँ।
दादी ने झट से मुर्ग़ी की उल्टा-पलटी की
और मुर्ग़ी जैसे इस झटके से सन्न हो गई
उसने अपनी चोंच खोलने की कोशिश की
अभी मैं कुछ सोच ही रहा था कि दादी बोली,
यहाँ आओ,
मुर्ग़ी की जीभ पर यह काला धब्बा देखो
इसका मतलब है कि इसे बीमारी हो गई है
और यह मरने वाली है।
मैंने अपनी आँख उस काले धब्बे पर टिका लीं।
बमुश्किल मैं दादी के निष्कर्ष सुन रहा था
हमें इसे मार देना चाहिए
वरना इसे बहुत पीड़ा सहनी पड़ेगी
मैंने उन्हें मुर्ग़ी को काटते हुए नहीं देखा
मैं बग़ीचे में जाकर छुप गया।
मैं सोच रहा था कि उन्होंने चालाकी में मुझे हरा दिया
ये मुझे मेरी मुर्ग़ी से प्यार नहीं करने देंगे।
- पुस्तक : सदानीरा पत्रिका
- संपादक : अविनाश मिश्र
- रचनाकार : ब्रेन मज़ेटिक
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