(1)
देव-भुम्मि भारत मा होइ धर्म हानि, तब
कोई देव आइके जबाना पलटाइ जाइ,
जुग का बदलि, जुगु द्वासरु ब्बलावै, सब
दुनिया का याक नई राह दरसाइ जाइ,
पाप का नसाइ, पुनि सब बार सरसाइ,
हरसाइ दुःखु हरि, सुक्खु बरसाइ जाइ,
कबहूँ जो राम बनि रावनु सँहारु करै,
कबहूँ तौ तुलसी भगतु बनि आइ जाइ।
(2)
भक्तु जब भगति की राह पर पहुँचे, तौ
भक्त भगवान मैहाँ भेदु रहि जाय ना
राजि तजि बन मा जो राम जसु पाइनि तौ
तुलसिउ कीरति कमाइनि वहे तना,
राकस बिदारि राम रामराजि थापिनि तौ
तुलसिउ रामराज की किहिनि थापना,
भगवान भक्त बने, भक्तु भगवान बना
राम बने तुलसी तौ राम तुलसी बना।
(3)
ज्ञान के समुद्र भक्तिभाव-सिंधु के जहाज,
जाति औ समाज के गरूर तुम्हैं परनाम,
राम के उपासक औ रामै से तिगुनवान,
धरम के रच्छक हजूर तुम्हैं परनाम,
भारत की सान, जननी के स्वाभिमान औरु
ईस देवदूत जग सूर तुम्हैं परनाम
अवधी की बगिया के महकुये फूल औरु
हिन्दी के सुहाग के सिंदूर तुम्हैं परनाम।
(4)
आर्य संसकीरति परी है धनचक्कर मा
बूड़ी जाय हाय! कोई आजु निकरैया ना,
धरमु बिकाना, कर्मु फैसन छिपाना
अँगरेजी वेष बाना दसा कोई सुधरैया ना,
राबनु मरैया लाज सीता की रखैया
रामराजि करवैया रहा कोई राम भैया ना,
तुलसी पधारौ! दुखी भारती तुम्हारी आजु
घूमै राह-राह राह कोई बतवैया ना।
1959 ई.
- पुस्तक : अरघान (पृष्ठ 64)
- रचनाकार : सत्यधर शुक्ल
- प्रकाशन : पं. वंशीधर शुक्ल स्मारक एवं साहित्य प्रकाशन समिति, मन्यौरा, लखीमपुर खीरी
- संस्करण : 2021
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.