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तेज़ रोशनी में दिखती सारी औरतें

tez roshni mein dikhti sari aurten

मिनी ब्रूस प्रैट

मिनी ब्रूस प्रैट

तेज़ रोशनी में दिखती सारी औरतें

मिनी ब्रूस प्रैट

और अधिकमिनी ब्रूस प्रैट

    1

    कल्पना कीजिए कि औरतों से भरा एक बड़ा कमरा है, जहाँ वे कुछ न कुछ कर रही हैं,
    ताश खेल रही हैं, मीटिंग कर रही हैं, काग़ज़ या कॉफ़ी के कपों की खड़खड़ाहट
    या कुर्सियों के पीछे खिसकने की आवाज़,
    उनकी आवाज़ों की धीमी और तेज़ फुसफुसाहट,
    औरतें एक-दूसरे के पास सिर झुकाकर बातें कर रही हैं। अगर हम
    दरवाज़े पर झुककर देखें और मैं कहूँ, ये औरतें
    माँ हैं, तो आपको हैरानी नहीं होगी, सिवाय
    इस बात के कि मैंने इतनी प्रकट-सी बात क्यों कही।

    औरतें माँ होती हैं, है न? यह तो ज़ाहिर सी बात है।

    मान लीजिए हम 8वीं या 11वीं स्ट्रीट पर जाएँ
    और औरतों से भरे एक कमरे में पहुँचें, जहाँ वे मुस्कुरा रही हैं, पूरे जोश में हैं,
    पूल खेल रही हैं और हरी मेज़ का कपड़ा काई जैसा चमक रहा है। एक औरत
    दूसरी की सिगरेट जलाती है, तिरछी नज़र से देखती हुई।
    कुछ दूसरी औरतें जोड़ों में नाच रही हैं चाँदी जैसे चाँद के नीचे
    जो चमकती बूँदों के रूप में रोशनी बरसा रहे हैं।
    अगर मैं आपके कान में कहूँ, गिटार की आवाज़ के बीच,
    ये औरतें माँ हैं, तो आप मेरी बात पर यक़ीन नहीं करेंगे,
    है न? सच में नहीं, भले ही आप ख़ुद
    उस कमरे की औरतों में से एक क्यों न हों। आप कहेंगी :
    ख़ैर, शायद, एक या दो, कुछेक।—हम ऐसा ही तो कहते हैं।

    यहाँ, हम शायद ही कभी अपने बच्चों का नाम ज़ोर से पुकारते हैं।
    हमने उन्हें एक बार खो दिया है या डर है कि कहीं खो न दें। हम बहुत सोच-समझकर
    बोलते हैं। उस खनखनाती ख़ामोशी में, दर्द हमारे दिलों पर
    गिरता रहता है, बरस-दर-बरस, जैसे पानी पत्थर में
    खाँचा काटता रहता है, रास्ता या निकलने का ज़रिया ढूँढ़ता है,
    दर्द जो पानी की तरह 
    उस चमकते कमरे में बहता रहता है।

    2

    मैं अक्सर कविता को एक ऐसे दरवाज़े की तरह सोचती हूँ जो खुलता है
    एक ऐसे कमरे में जहाँ मैं जाना चाहती हूँ। लेकिन यहाँ अंदर जाने का मतलब है
    उस जगह जाना जहाँ मेरा अपना दुःख मौजूद है
    संगीत में किसी बहुत धीमी, अनसुनी धुन की तरह,
    जो हम सबके होने से और तेज़ और लगभग असहनीय हो जाती है,
    गूँजता हुआ दर्द, जो गोल-गोल घूमता है, कभी ख़त्म नहीं होता,

    जिसके बारे में हम शायद ही कभी बात करते हैं, सिवाय तब जब कोई औरत
    अँधेरे एकांत में मुझे अपने गुम हुए बच्चे की कहानी सुनाती है—
    चाहे वह बच्चा अभी खोया हो या बीस साल पहले—उसके शब्द ऐसे निकलते हैं
    जैसे उसके बटुए से कोई पुरानी तस्वीर निकल रही हो, जिसकी धुँधली रूपरेखा
    पर बस एक नज़र पड़ती है और फिर नज़र हटा ली जाती है, 
    कहानी टेढ़े रास्ते से चलती है, तिरछी,
    ताकि शोक के ख़तरों से बचा जा सके। कहानियों की चमकती कौंधें
    अँधेरे में स्ट्रोब-लाइटों की तरह—भव्य और भयावह।
    नाचते हुए चेहरे पर दर्द की शिकन और सिर का पीछे की ओर झुकना दिखता है।

    एडी के हाथ, जिनकी नसें तार की तरह तन गई थीं, फैले हुए और गिड़गिड़ाते हुए,
    उसने उन्हें कैसे पाला था सात साल तक और अब उनसे मिलने भी नहीं दिया जाता,
    मार्था ने कहा कि वह उस बच्चे को अब कभी नहीं देख पाएगी।
    उसके पतले साँवले हाथ उसकी सपाट छाती पर बँधे हुए,
    नीली जींस में सपाट कूल्हे, हथौड़े जैसी सख़्त दिखने वाली लेस्बियन औरत :
    और उसे माँ कौन कहेगा?
    या लंबी, पीली-सी दिखती कोनी
    इंद्रधनुषी स्कर्ट घुमाती हुई, दूर जाने के उसके सपने, द्वीप,
    औरतें जो सीपियों के साथ घास की चोटियाँ गूँथ रही हैं : कौन जानता था
    जब तक कि उस रात, मेरे कंधे पर सिर रखकर, वह रो नहीं पड़ी
    अपने उन बच्चों के लिए जिन्हें पिता ने पीछे धकेल दिया था, वे परछाइयाँ
    जिन्होंने उसे दरवाज़े से गाली देते हुए सुना, नर्क की आग
    जब वह सूखे-मुरझाए आँगन में उनका इंतज़ार कर रही थी?

    तेज़ रोशनी में दिखती सारी औरतें, जिनकी झलक
    रहस्यमयी लगती है : लाल होंठों और लाल नाख़ूनों वाली औरत
    जो आग की तरह चमकती हुई नाच रही है, क्या वह यहाँ छिपकर आई है,
    चार लड़कियाँ और एक पति जिन्हें वह डर के मारे कभी नहीं छोड़ पाएगी?
    काले डेनिम में 'बुच' (मर्दाना अंदाज़ वाली औरत), जो राख की तरह शालीन है, उसका बेटा शायद वापस भेज दिया गया है, बिना ताप वाली सर्दियाँ, एक औरत की कमाई।
    चुपचाप जिन पीती हुई औरत, जो सोलह साल की उम्र के बारे में सोच रही है,
    वह बच्चा जो गीले कपड़ों की तरह सिकुड़ा हुआ था, जिसे बस एक बार देखा, फिर कभी नहीं।

    तेज़ आवाज़ संगीत, बात करना मुश्किल और हम जो कहते हैं उसमें सावधानी बरतते हैं। कुछ शब्द, हाथों के कुछ इशारे, कहानी का कोई छोटा सा हिस्सा
    ठीक वैसे ही रहस्यमय जैसे हमारे हाथों पर चमकता निशान, स्याही
    टैटू, वह निशान जो हमें इस कमरे में आने देता है, जो कुछ ख़ास तरह की
    रोशनी में इंद्रधनुषी चमकता है और फिर ग़ायब हो जाता है, अदृश्य।

    3

    अगर दुःख बस किसी गाने की उस पंक्ति जैसा होता जिसे चार बार
    दुःख-भरे बोलों के साथ दोहराया जाता है,
    शोर-शराबे वाले कमरे में जिसे बस आधा-अधूरा सुना जाता है और फिर ख़त्म,
    तो मैं वह कविता लिख ​​पाती जिसकी मैंने कल्पना की थी : यहाँ मौजूद सभी औरतें
    अपने खोए हुए बच्चों को उस धुँधले कमरे में आते हुए देखतीं,
    रोशनी तेज़ हो जाती, कहानी का सुखांत होता,
    अब और छिपना नहीं पड़ता, हम ख़ुद होते और वे हमारे साथ
    होते, एक मिलन और आवाज़ों की चहल-पहल।

    मैंने ऐसा होते देखा है। मेरे पास कार्ला और वांडा की कहानियाँ हैं।
    मेरी अपनी कहानी भी है : सत्ता से टकराने की कोशिश,
    सालों तक बस एक झलक पाने के लिए, किसी भी चीज़ के लिए चक्कर काटते रहना
    और आख़िरकार वह बच्चा—बड़ा हो चुका, थोड़ा असहज—
    आपके साथ आता है, ताकि आप कहीं हाथ में हाथ डालकर चल सकें।

    लेकिन हमारे साथ ऐसी चीज़ें हुई हैं जिन्हें कभी बदला नहीं जा सकता।
    कोने में बैठी वह औरत जो दोस्तों को देखकर मुस्कुरा रही है
    जिसके काले बालों में सफ़ेदी चमक रही है, उसे याद है
    उस साँवली बच्ची का वज़न जो उसकी गोद में आराम से लेटी थी।
    वह भूरी आँखों वाली बच्ची जो बोलना सीखने से पहले ही इठलाना जानती थी,
    जिसे बीस साल पहले उससे छीनकर दूर भेज दिया गया
    और कोई चारा भी नहीं था।
    अगर वह दरवाज़े पर खड़ी होती तो वह औरत उसे पहचान न पाती
    और उस बच्चे को उस औरत की कोई याद न होती
    न उसके घुटनों पर लेटने की, न उसकी छाती से लगने की—बस एक
    छिपा हुआ निशान रह जाता, दिल पर गहरा और अमिट दर्द।

    उस औरत ने अपने दोस्तों को उस बच्ची के बारे में बताया है। वे
    अक्सर भूल जाते हैं। उसकी कहानी धुएँ की तरह उड़ जाती है,
    जैसे किसी गाने के अस्पष्ट बोल या पानी में तैरता काग़ज़ का टुकड़ा।
    जब वे माँओं के बारे में बात करते हैं तो उन्हें उसका ख़याल कभी नहीं आता।

    इस दर्द का कोई आसान अंत नहीं है। आधी रात को हम घर लौटते हैं—
    या तो ख़ामोश मकानों में या फिर शोर-शराबे वाले कमरों में जो
    उन लोगों से भरे हैं जो अब हमारा परिवार हैं। हम अकेले बैठते हैं,
    बीते कल के बोझ तले दबे हुए और आँखों से आँसू बहते हैं—कड़वे
    और रात में बारिश की तरह, लगातार। ज़्यादातर तो बस हम जीते चले जाते हैं।

    स्रोत :
    • रचनाकार : मिनी ब्रूस प्रैट
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए अनुवादक द्वारा चयनित

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