Font by Mehr Nastaliq Web

तीन कविताएँ

teen kawitayen

ममता कालिया

ममता कालिया

तीन कविताएँ

ममता कालिया

और अधिकममता कालिया


    एक

    नीम के पेड़ पर गा रही हैं चिड़ियाँ
    जिनमें से
    सिर्फ़ कोयल की बोली जानी-पहचानी है 
    इतने कड़वे पेड़ पर बैठ
    इतना मीठा गाना
    कैसे गा लेती है कोयल
    सारी चिड़ियाँ
    चह-चह-चह-चह 
    सिर्फ़ टी-वी-टुट्-टुट् नहीं
    संगीत-समारोह मना रही हैं
    लगता है जैसे यह नीम का नहीं
    चिड़ियों का पेड़ है।

    दो

    तुमसे मिले बिना
    आधी सदी बिता दी
    आधा बियाबान काट लिया
    आधे स्टेशन पार हो गए
    आधे गीत याद रहे, आधे भूल गए
    आधे-अधूरे जीवन क्या ऐसे ही होते हैं?

    तीन

    आप कितनी भाषाएँ जानते हैं जनाब?
    और बोलियाँ, उप बोलियाँ?
    आपके जनसंपर्क अधिकारी कितने हैं
    तैंतीस या तैंतीस करोड़
    हम जिस भी ज़ुबान में अपनी माँगे रखें
    आप पूरी करते हैं
    मगर दस प्रतिशत
    शेष नब्बे प्रतिशत माँगों का क्या करते हैं जनाब?
    क्या रास्ते में
    आपके जनसंपर्क अधिकारी
    इधर-उधर कर देते हैं अर्ज़ियाँ
    बड़ी मुश्किल है हमारी
    पीछा करती रहती है बेकारी
    न नौकरी मिलती है
    न लॉटरी खुलती है
    साल-दर-साल ज़िंदगी पुरानी डायरी हुई जा रही है
    लगता है आपके यहाँ अभी
    आरक्षण लागू नहीं हुआ है
    आपके दरबार में
    अर्ज़ियों का अंबार लगा पड़ा है
    मंगल और शनि को आपके दफ़्तर में
    इतनी भीड़ होती है
    कि जूते चोर और जेबक़तरों को रोज़गार मिला हुआ है
    पुजारी का चेहरा खिला हुआ है
    पर हमें यह लगने लगा है
    कि आप हमारे ख़ैरख़्वाह हों न हों
    फ़र्स्ट क्लास नौकरशाह तो ज़रूर हैं।
    स्रोत :
    • पुस्तक : समकालीन सृजन : कविता इस समय (पृष्ठ 195)
    • संपादक : मानिक बच्छावत
    • रचनाकार : ममता कालिया
    • संस्करण : 2006

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY