एक
नीम के पेड़ पर गा रही हैं चिड़ियाँ
जिनमें से
सिर्फ़ कोयल की बोली जानी-पहचानी है
इतने कड़वे पेड़ पर बैठ
इतना मीठा गाना
कैसे गा लेती है कोयल
सारी चिड़ियाँ
चह-चह-चह-चह
सिर्फ़ टी-वी-टुट्-टुट् नहीं
संगीत-समारोह मना रही हैं
लगता है जैसे यह नीम का नहीं
चिड़ियों का पेड़ है।
दो
तुमसे मिले बिना
आधी सदी बिता दी
आधा बियाबान काट लिया
आधे स्टेशन पार हो गए
आधे गीत याद रहे, आधे भूल गए
आधे-अधूरे जीवन क्या ऐसे ही होते हैं?
तीन
आप कितनी भाषाएँ जानते हैं जनाब?
और बोलियाँ, उप बोलियाँ?
आपके जनसंपर्क अधिकारी कितने हैं
तैंतीस या तैंतीस करोड़
हम जिस भी ज़ुबान में अपनी माँगे रखें
आप पूरी करते हैं
मगर दस प्रतिशत
शेष नब्बे प्रतिशत माँगों का क्या करते हैं जनाब?
क्या रास्ते में
आपके जनसंपर्क अधिकारी
इधर-उधर कर देते हैं अर्ज़ियाँ
बड़ी मुश्किल है हमारी
पीछा करती रहती है बेकारी
न नौकरी मिलती है
न लॉटरी खुलती है
साल-दर-साल ज़िंदगी पुरानी डायरी हुई जा रही है
लगता है आपके यहाँ अभी
आरक्षण लागू नहीं हुआ है
आपके दरबार में
अर्ज़ियों का अंबार लगा पड़ा है
मंगल और शनि को आपके दफ़्तर में
इतनी भीड़ होती है
कि जूते चोर और जेबक़तरों को रोज़गार मिला हुआ है
पुजारी का चेहरा खिला हुआ है
पर हमें यह लगने लगा है
कि आप हमारे ख़ैरख़्वाह हों न हों
फ़र्स्ट क्लास नौकरशाह तो ज़रूर हैं।
- पुस्तक : समकालीन सृजन : कविता इस समय (पृष्ठ 195)
- संपादक : मानिक बच्छावत
- रचनाकार : ममता कालिया
- संस्करण : 2006
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