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तत्पश्चात्

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लेस्टर एफेबो विलकिनसन

और अधिकलेस्टर एफेबो विलकिनसन

     

    कैसे देखा करते थे हम उन्हें

    जी-जान से मेहनत करते, नतीजे में उस स्वप्न के

    फल था जो उनकी हिम्मत का

    तेज़ हवा से लड़ती झुकी कमर

    वह लगातार की टूटन और चुभन

    समय की सनक के आगे झुकते दिमाग़।

     

    हमने देखा उन्हें

    आभास भर रह गए थे जो अपनी खोई कुलीनता का

    लिपटते उन ख़ामोश मैजाई1 से

    ख़ाक़ छानते उनके लालच की

    मुरझाते

    जीवन की ढलती भोर की

    गोधूलीय कांति में।

    जान बाक़ी है अभी भी

    मगर होता जाता है अंत लगातार

    उस टटोलते मेहनतकश के स्वप्न

    की गति से भी ज़्यादा तेज़ी से।

     

    मगर कौन, पूछते हैं हम

    कौन ढालेगा पुनः

    कीर्तन की इस लंबी रात

    और चोट पहुँचाते प्रवचनों के बीच

    उस आधे बिसरे रूप और कमज़ोर ढाँचे में

    आदिवासी खंडहरों को

    कौन देगा रूप पुनः इस ठेस को

    और मार्गदर्शन करेगा

    ओगन2 की तरह पिघलता मूसलाधार बारिश में।

     

    यह आक्रोश

    जिसकी धार से अनजान थे हम

    और जिसका यह अजीब

    कीड़े लगा केंद्र झुका जाता है

    इंसानी अपशेष और

    समय के भुलक्कड़पन के

    बोझ से भारी।

     

    कौन, पूछते हैं हम।

    यह तेज़ी से

    ऊँचा होता मलबे का ढेर

    लुढ़कते टेढ़े टोटेम

    झुकते पहाड़...

    कौन करेगा रचना

    इस स्वप्न की पुनः ?

    स्रोत :
    • पुस्तक : यह संपन्नता बिखरी हुई (पृष्ठ 105)
    • संपादक : श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
    • रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी एवं ग्रूलाक
    • संस्करण : 2006

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