तर्पण
tarpan
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥ श्रीमद्भगवद्गीता 2.20॥
घनघोर बारिश में सुदेश अंकल घर आए
शर्ट बदल अपना भीगा कुर्ता छोड़ गए।
जिस शाम उनकी हत्या हुई
उनकी देह में जहाँ-जहाँ गोलियाँ मारी गईं कुर्ते में वहाँ दाग उभर आये
वह मेरे सर पर हाथ फेरा करते जो केवड़े-सा महकता था
केवड़ा रक्त को मिला
कुर्ता अग्नि में जला
अख़बार की ख़बर में उतनी ही आँच थी जितनी चिता में
दाग फिर भी गहराते गए
गंध तेज़ होती गई
गीता के श्लोक गूँज रहे हैं उनकी लहूलुहान बोली में अनवरत
हे कृष्ण...
उन्हें शांति दो!
सर्द रातों में जब बुझ जाते हैं सारे द्वारदीप मेरी आत्मा धधकती है
भादों भर गिरते हैं संसार भर के झरने सीने में मैं बुलबुले में सिमट जाता हूँ
चींटियों का झुँड अब भी वहीं बाँबी बना रहा है जहाँ कुचला गया था बचपन में
कबूतरों के घोंसले अब भी रोशनदानों में हैं
हलचल बाक़ी है उन फिसले हुए अँडों में
वह गिलहरी अब भी आती है कूलर के पंखों के बीच ठीक उसी जगह
जिसके नीचे गंदले पानी में उसकी फूली हुई लाश तैर रही है।
अब मैं कूलर चलाने से पहले झाँक लेता हूँ
वह झट से बारहमासी के गमले पर चढ़ जाती है।
वह आत्मा जो अजर और अमर है
सपनों में आती रहेगी सदा सर्वदा के लिए
न छेद पाती है चीत्कार न भस्मती है ह्रदय की अग्नि
भटकती है मन की भूली कोठरी में अपरिमित यातना की तरह
गुनगुनाती है अँधेरा भर फुसफुसाती आवाज़ में लगातार—
“राम नाम सत्य है! सत्य बोलो मुक्ति है!”
हे राम...
उसे विश्राम दो!
एक ब्रह्माँड है अपार जिसमें है छोटी-सी पृथ्वी
पृथ्वी पर एक घर जहाँ मैं रहता हूँ
मेरे मन में एक मन है मैं उस मन में घर बना रहा हूँ
घर में शामिल एक ब्रह्माँड
ब्रह्माँड में एक और पृथ्वी
उस पृथ्वी पर बेघर भटक रहा हूँ मैं!
जो कुत्ते खाते हैं घर की पहली रोटियाँ उनकी कुचली लाशों से अटे पड़े हैं
राष्ट्रीय राजमार्ग
पितृपक्ष का तर्पण भोगने वाले हज़ारों कौवों की मृत चादर फैली है
खेत-खलिहानों पर
वे सब पशु, पक्षी, सरीसृप जिनके नहीं कुल, वंश और पीढ़ियाँ
नहीं बाक़ी हैं जिनके अवशेष गंगा तक लाने
मैं समर्पित करता हूँ उन्हें अपने समस्त पुण्य, श्राद्ध और संवेदनाएँ
हे माँ गंगा...
उन्हें मुक्ति दो!
13 जून की तपती दुपहरी में लिखे अल्हड़ प्रेमपत्र मैने भेजे उस पते पर
जो 25 दिसंबर को वीरान हो चुका था
वे मृत चूड़ियाँ, पायल, कंगन, मुस्कान और खिलखिलाहटें
खनकते रहेंगे लेटरबॉक्स में घुटती पीली पड़ती चिट्ठी में
चिट्ठी घुटती रहेगी मेरी स्मृतियों में, नाकाम; अपनी गति को मिलने में
स्मृतियाँ! आह!
घुटना ही हम सबकी गति है
हासिल नहीं है हमें कोई और गति, कोई और मृत्यु
हे परमपिता परमेश्वर...
हम सबको मोक्ष दो!
अव्यक्तोsक्षर इत्युक्तस्त्माहुःपरमां गतिम्॥
यं प्राप्य न निवर्तंते तद्धाम परमं मम॥
श्रीमद्भगवद्गीता ८.२१॥
- रचनाकार : अमित उपमन्यु
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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