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तर-उपर

tar upar

श्याम दरिहरे

और अधिकश्याम दरिहरे

    पंडित रामलखन आचार्यक घर

    अदौसँ छलनि होइत

    दू-दू टा भोर—

    एकटा ब्रह्म मुहुर्त्त

    दोसर पसरक बेर

    ब्रह्म मुहुर्त्तमे तोड़ैत छलाह पंडीजी

    फूल बेलपात

    शौचादिसँ भए निवृत्त।

    प्रशस्त ललाटपर श्रीखंडक त्रिपुंड

    आज्ञा-चक्रपर सिनूरक

    ललका भकरार ठोप

    सूर्यक चक्काक संगे उदित छलनि होइत।

    ओमहर

    परीछना छलनि खोलैत पररू महींस

    पसरक बेर

    ओम्हरे फिरैत छल झाड़ा

    खत्तेमे कऽ लैत छल छोंच

    कुट्टी काटऽमे भऽ जाइत छलैक

    आँगुर थौआ रहरहाँ।

    कुसंस्कार ओकर छलैक

    थाल-पानिमे लेभरायल

    घुट्ठा-लेढ़ान साँची धोतीमे

    सोहराइत छलनि पंडीजीक

    उत्तम सदाचार।

    त्वदीयं वस्तु गोविन्द

    तुभ्यमेव समर्पयेक मन्त्रोचारसँ

    लगबैत छलाह भोग

    मुहथरिपर चभ्भर-चभ्भर

    कलउ सरपेटैत छल परीछना।

    आब परीछन मंडल छथि कटैत

    भोरेसँ सबदिन पुरजी

    पंडीजीक पुत्र रहैत छथिन लाइनमे ठाढ़

    खाइत छथिन धक्का

    पीबैत छथिन घाम

    तखन दुपहरिया धरिमे भेटि जाइत छनि

    डिब्बामे अढ़ाइ लीटर मटिया तेल

    चीनी एक किलो चारि सय ग्राम

    ता नकुआक दोकानपर चाह

    दुनू गोटा पिबैत छथि एके संग

    से आब सत्ते बेस बदललैए रंग।

    स्रोत :
    • पुस्तक : क्षमा करब हे महाकवि [मैथिली कविता-संग्रह] (पृष्ठ 68)
    • रचनाकार : श्याम दरिहरे
    • प्रकाशन : नवारंभ, पटना/मधुबनी
    • संस्करण : 2016

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