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सृष्टि-रचना

srishti rachna

एवॉ तोथ

अन्य

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एवॉ तोथ

सृष्टि-रचना

एवॉ तोथ

और अधिकएवॉ तोथ

    पहला दिन

    मैं उतरी स्याह सर्द रात में ठिठुरती

    टहनियाँ बटोरीं आग सुलगाई उसी समय

    निकला वह खोह से ठिठुरता उठाए हाथ

    आग पर रखे; बोला : होने दो उजाला

    दूसरा दिन

    मैं उठी सवेरे ले आई जल नदी से

    मिट्टी का आँगन भिंगोने को ताकि धूल

    उसके मुँह पर उड़े, निकला वह बाहर

    अँजुरी में डाला जल मैंने, उसने धोकर

    मुँह को उठाया और बोला : आसमान को

    हम कहें छत, ख़ुश्की को धरती

    और जमा जलराशियों को समुद्र

    तीसरा दिन

    मैं जागी बाल्द फल चुने मैंने

    नीले और लाल और पीले

    दो पत्थरों के बीच रख छोटे दाने

    पीसा गूँधा भूना और तभी

    जागा वह अँगड़ाई ली खाई रोटी,

    फल मीठे, और कहा : धरती करे धारण

    नरम घास, घास में बीज फूल वृक्ष हों

    चौथा दिन

    उठी हड़बड़ाकर मैं, पत्तों की डाल से

    आँगन बुहारा भिंगोए कपड़े-लत्ते

    रगड़े बर्तन पोंछे औज़ार और जब

    सान पर चढ़ाई दराँती उसी समय

    निकला बिस्तर से वह, बोला : ये अलौकिक

    पिंड करें गगन को प्रकाशित, दें बाँट

    रात से अलग दिन को

    पाँचवाँ दिन

    उठ कर सवेरे सवारी की भरी नाँद

    घोड़ों को घास दिया गायों को दुहा

    भेड़ों की ऊन ली बकरियाँ चरायों

    हंसों को सँभाला काटी बिच्छू-बूटी

    बतखों के लिए मकई दरदराई

    मुर्ग़ी का दाना तैयार किया और

    सुअरों की लप्सी बना कर दी

    कुत्ते को हड्डी दी बिल्ली को दूध

    उसने जम्हाई ली, फिर धीरे-धीरे

    आँखों से नींद को उड़ाया और बोला :

    हर वस्तु हो जाए एक से अनेक

    फूले-फले और धरती भर फैल जाए

    छठा दिन

    दर्द ने जगाया मुझे जना मैंने बच्चा

    नहलाया उसे पोतड़े पहना दूध दिया

    झुका वह उस पर उस नन्ही-सी मुद्री में

    अपना अँगूठा दे अपने प्रतिरूप पर

    मुस्काया वह और देखा कि उसकी

    सृष्टि परम सुंदर है समूची

    सातवाँ दिन

    बच्चे के रोने से जाग पड़ी जल्दी ही

    पोतड़े बदल उसको दूध दिया वह फिर से

    चुप हो गया मैंने चूल्हा जलाया

    हवा दी कमरों को लाई अख़बार उठा

    पौधों को सींचा चुपचाप लगाई झाड़ू

    नाश्ता बनाया तभी कॉफ़ी की गंध से

    जागा वह रेडियो चलाया सिगरेट ली

    और सातवें दिन को दे दी आशिष

    स्रोत :
    • पुस्तक : दस आधुनिक हंगारी कवि (पृष्ठ 126)
    • रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक गिरधर राठी, मारगित कोवैश
    • प्रकाशन : वाग्देवी प्रकाशन
    • संस्करण : 2008

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