उयि का जानिन हम को आहिन?
uyi ka janin hum ko ahin?
बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'
Balbhadra Prasad Dixit 'Padhees'
उयि का जानिन हम को आहिन?
uyi ka janin hum ko ahin?
Balbhadra Prasad Dixit 'Padhees'
बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'
और अधिकबलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'
उयि का जानिन हम को आहिन?
दुनिया के अन्नु देवय्या हम,
सुख-सम्पति के भरवय्या हम
भूखे-नंगे अधमरे परे
रकतन के आँसू रोयि रहे
हमका द्याखति अण्टा चढ़िगे
उयि का जानिनि हम को आहिन॥
ज्याठ की दुपहरी, भादउँ बरखा,
माह कि पाला पथरन मा
हम कलपि-कलपि अउ सिकुरि-सिकुरि
फिर ठिठुरि-ठिठुरि कयि जिउ देयी;
ठाकुर सरपट-सों कयिगे,
उयि का जानिनि हम को आहिन॥
मोटर मा बयिठीं बिसमिल्ला
दुइ-चारि सफरदा सोहदा लयि
जामा पहिंदे बेसरमी का
खुद कूचवान सरकार बने
पंछी पँड़ुखी मारिनि-खायिनि
उयि का जानिन हम को आहिन!
हम कुछु आहिन उयि जानयिं तउ
उहु नातु पुरातन मानयिं तउ!
उयि रहिहयिं तउ हम हूँ रहिबयि
हम ते उनहुन की लाज रही
घरु जरि कयि बण्टाधारु भवा,
तब का जानिनि हम को आहिन॥
- पुस्तक : पढ़ीस ग्रंथावली (पृष्ठ 79)
- संपादक : डॉ. रामविलास शर्मा, युक्तिभद्र दीक्षित
- रचनाकार : बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'
- प्रकाशन : उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ
- संस्करण : 1998
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