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शून्य-स्थिति में जी रही पीढ़ी

shunya sthiti mein ji rahi piDhi

रविंदर रवि

अन्य

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रविंदर रवि

शून्य-स्थिति में जी रही पीढ़ी

रविंदर रवि

और अधिकरविंदर रवि

    वे अभी जन्मे नहीं थे कि

    उनके घरों का मुँह जार की ओर था

    जन्म लेते ही उनके सम्मुख

    पहले लेनिन और फिर स्टालिन हुआ

    और आज्ञा मिली कि

    अपनी ओर पीठ कर लो—

    कुछ देखो

    कुछ बोलो

    कुछ सुनो

    बस, चलते जाओ अनंत तक!

    तुम्हारे इर्द-गिर्द चारों ओर

    जो दीवार है,

    उस पर इंद्रधनुष टँगा है सतरंगा!

    सपने देखो और विचरण करो सपनों में ही!

    जब जाग उठो, तुम्हारा चेहरा

    लेनिन अथवा स्टालिन की तरफ़ हो—

    और तुम्हारी सोच

    सदा अंतरिक्ष की ओर घूर सकती है

    अपना और अपने होने तक के बीच का

    पड़ाव पूर्ण कर सकती है

    वे सोचते रहे—बिना सोच

    ये सुनते रहे—बिना श्रवण

    ये देखते रहे—दृष्टि

    वे बोलते रहे—जीभ

    और इस तरह ख्रुश्चेव और ब्रेझनेव

    अथवा दूसरों में से होते हुए

    वे गोर्बाचोव तक पहुँच गए

    लेकिन त्रासदी यही

    कि सदैव बाल अवस्था में विचरते लोग

    पूरे खंड की कामना करते रहे

    पूरे आसमान में पूर्ण उड़ान

    क्षण-भर में

    लेकिन नहीं जानते

    कि बचपन एकाध दिन में युवा नहीं होता

    एक पीढ़ी वृद्ध एक जवान—

    सदैव बाल-अवस्था में बीती

    एक पीढ़ी जन्मी और कई साल हुआ उसका ब्रेनवाश

    अब अपनी ओर पीठ किए बैठे बचपन में से

    एक ही दिन में युवा हो जाना चाहती है पीढ़ी।

    स्रोत :
    • पुस्तक : बीसवीं सदी का पंजाबी काव्य (पृष्ठ 191)
    • संपादक : सुतिंदर सिंह नूर
    • रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक फूलचंद मानव, योगेश्वर कौर
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी
    • संस्करण : 2014

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