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भेड़िया की आँखें

bheDiya ki ankhen

अनुवाद : सुरेश सलिल

मर्को मगर्शेविच

मर्को मगर्शेविच

भेड़िया की आँखें

मर्को मगर्शेविच

और अधिकमर्को मगर्शेविच

    कंदरा के मध्य सुबह जब उतरती है

    दुनिया के गूढ़ खिलौनों को रोशनी के संदेशों में रूपांतरित करती

    वह बहुत दूर जा चुका होता है।

    मानव मूल्यों को तिरस्कृत करते,

    भूख से प्रेरित डगों में उछालें भरता

    शाम के वक़्त वह घोषणा करता है

    कि पहाड़ उसका ताराग्रह है

    जहाँ पैर और जूता अवांछित हैं।

    पूरी रात वह पैनाता है अपनी छुरियाँ

    भोर से पहले की उस घड़ी के लिए—

    अपनी मादा को वचन देते हुए कि

    बहुत उग्र वह नहीं होगा

    कि सहूलियत देगा वह झोपड़ि‌यों के रहवासियों को;

    बावज़ूद इसके कि दोबारा भी ग़लती करने में वहीं आगे रहेंगे

    और उसके भेजे में बैठी धूर्त हँसी को उकसाएँगे।

    लिहाजा अपने ख़ूँख़ार आतंक से उन्हें चुप कराते

    और बर्फ़ पर ताज़ा ख़ून की भाप उठाते हुए

    तार्किकता को भी धता बताते जब वह आगे बढ़ता है

    तो उसे किसी पहाड़ी मोड़ की-सी प्रतीति होती है।

    बिल्ली की भाँति उछालें भरता वह जंगल में आगे जाता है

    पिछले शरद की पपड़ियों के पार, शाम के भोजन की

    तलाश घाटी में करता हुआ।

    कभी-कभार वे भी कामयाब हो जाते हैं उसकी गर्दन मरोड़ने में

    लेकिन इसका उसे कुछ ख़ास अफ़सोस नहीं होता

    क्योंकि तब वह अपने हत्यारे में प्रविष्ट कर जाता है।

    फिर दूना-चौगुना होता रहता है

    आदमियों की अपनी आँखों में।

    स्रोत :
    • पुस्तक : रोशनी की खिड़कियाँ (पृष्ठ 475)
    • रचनाकार : मर्को मगर्शेविच
    • प्रकाशन : मेधा बुक्स
    • संस्करण : 2003

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