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सौ सन्नाटों की रात

sau sannaton ki raat

अमित उपमन्यु

अमित उपमन्यु

सौ सन्नाटों की रात

अमित उपमन्यु

और अधिकअमित उपमन्यु

    एक

    दो लोग

    एक दूजे से

    पीठ किए बैठे हैं

    दो अट्टहास कर रहे हैं

    जो दो घुप्प अंधेरी रात में कविता-पाठ कर रहे हैं

    चार लोगों का कहना है बकवास कर रहे हैं

    चार लोग शोकचक्र को काँधे पर उठाए घूमते हैं

    चार उसके शोक में ताड़ी पीकर झूमते हैं

    साहब का फिर आना मुमकिन नहीं, तो

    इन आठ को अग्रिम श्रद्धांजलि दे रहे हैं

    मुर्दों में मिले ज़िंदों को याद करके

    सूखी-सूखी हिचकियाँ ले रहे हैं

    साहब रोना भी चाहते थे

    पर रोना आया नहीं

    कोई दुःख उनके मन को भाया नहीं

    वे रोने के लिए

    प्रॉपर टाइमिंग का इंतज़ार कर रहे हैं

    चार लोग शोकचक्र के बोझ से दबकर

    बारी-बारी मर रहे हैं

    दो

    जम्हूरियत जम्हूरियत जम्हूरियत हा-हा!

    कितना म्यूजिक है!

    कितना म्यूजिक है इस वर्ड-विलास में

    सिलेबस में घुसेड़ो इसे थर्ड किलास में

    बचपन से ही डेमोक्रेसी का ज्ञान होना माँगता है

    एक...दो...तीन...चार

    पाँच...छह...सात...आठ

    इनमें से जो मस्त लगे उसपे बिंदास सील ठोकने का

    कुछ संपट ना पड़े तो नोटा को वोट देने का

    सिस्टम में ऐसे ही काम चलने का माँगता है

    पब्लिक का ग़ुस्सा किधर तो निकलने का माँगता है

    लौंडों की खोपड़ी की गर्मी कोई वेस्ट मटीरियल नहीं है

    इसके पॉवर से अपने बंगले पे बल्ब जलने का मांगता है

    तीन

    ये जो दौर है

    समय के माथे पर फोड़ा है

    इससे बहुत मवाद रिस रही है

    चार लोग सारी मवाद खा मुटिया रहे हैं

    चौरानवे

    उनका गू मिलने की उम्मीद में

    तालियाँ बजा रहे हैं

    एक कमसिन तुकांत कविता

    सीसीडी के सामने खड़ी

    पत्रकारिता और चाटुकारिता का इंतज़ार कर रही है

    वे तीनों बिना हेलमेट बिना कंडोम

    बाइक पर घूमने जाएँगे

    बाइक का नाम भाषा है और यह 200 तर्क प्रति लीटर का एवरेज देती है

    350 सीसी हॉर्सपॉवर है

    इतने हॉर्सपॉवर पे विष्ठा का तुक निष्ठा तो क्या

    प्रतिष्ठा से भी मिलाया जा सकता है

    स्रोत :
    • रचनाकार : अमित उपमन्यु
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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