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सरसों की लहरान

sarson ki lahran

सत्यधर शुक्ल

सत्यधर शुक्ल

सरसों की लहरान

सत्यधर शुक्ल

और अधिकसत्यधर शुक्ल

    सबेरे सरसौं की लहरान,

    देखिकै मनु ह्वै जाइ बिरान।

    चलै पुरुबैया भरि-भरि झूँक

    करेजे धुसै जाड़ की ऊँक;

    गगन क्वहिरा की छुटै फुहार,

    होइ सबु चाँदीमइ संसार।

    भुम्मि पहिदै हीरन के हार,

    मजा देही मा ठिठुरनि क्यार,

    बहिनि ऊषा के सूरज बीर,

    जगत पर छिटकैं लाल अँबीर

    बाग मा पंछी चुलुबुल करैं,

    चेतना सब दुनिया मा भरे,

    कुछू बिरवन के पत्ता झरैं,

    कुछू फूलन पातन ते फरैं।

    बौर की गमकि रही अरघान।

    देखिकै मनु ह्वै जाइ बिरान।

    वहे कंठी बगिया के तीर,

    ख्यात गोहूँन के बाँधि सतीर

    ठाढ़ लह-लह लह लह लहराइँ,

    हवा के झ्वाँकन मा बल खाइँ।

    हँसय बाली, भौहें मन्नाइँ,

    झुकैं लहरैं कूदैं फुन्नाइँ;

    राति ख्यालै संघै अठिलाइ,

    चुप्पिहे कलई देइ चढ़ाई।

    ज्वँधैया करै अमृत छिरिकाउ,

    भोरु लाली का करै प्वताउ,

    उजेरिया दिनु भरि राखै दौस,

    साँझ पुरवै अँधियारियकि हौस।

    सुनहरे निसि-दिन-साँझ बिहान।

    देखिकै मनु ह्वै जाय बिरान।

    म्याढ़ पर पौढ़इ हरियरि दूब,

    जन्यावा छिनु-छिनु बाढ़ै खूब;

    पर्वासै जौ की चीकनि बाल,

    करै लचि-लचि उठि मनु बेहाल।

    चना पटपरिहाँ दानेदार

    जगावै हिरदै बीच हिल्वार

    छिंया अकसा की कुछु हँसि कहैं,

    चपिटि उनहिंकि देहीं ते रहैं।

    लपटि के अकरामुनमुन टाँग,

    करै अपने जीवन की माँग

    पट्यहरी च्यांच ह्वै रहे चंग,

    भरै बथुआ रहि-रहि हुड़बंग।

    बीच मा बुलबुल छ्याड़ै तान।

    देखिकै मनु ह्वै जाइ बिरान।

    चना जौ गोहुँन के बिच बीच,

    पकरि सबकी बालिन की घींच

    हरी देहिंन पर सारी हरी,

    उपर ते ओढ़ि पियरि चूनरी।

    छहर सरसौं की छबि छहराय,

    करेजा उछरि-उछरि रहि जाय।

    भौंर-तितुलिन की पंगति फिरै,

    टूटि फूलन पर उड़ि उड़ि गिरै,

    झुकैं ललचाइ खगन के झुंड

    उठै चहुँदिसि मीठी-घसमंड।

    हाथ खुरुपी लै मेढ़े ठाढ़

    फसल की निरखि निरन्तर बाढ़ि।

    फूलि के गदगद होइ किसान।

    देखिकै मनु ह्वै जाइ बिरान।

    लहलही सरसौं की लहरान,

    छबीली सरसौं की लहरान,

    रसीली सरसौं की लहरान,

    देखि कै मनु ह्वै जाइ बिरान।

    11 जनवरी 1959

    स्रोत :
    • पुस्तक : अरघान (पृष्ठ 40)
    • रचनाकार : सत्यधर शुक्ल
    • प्रकाशन : पं. वंशीधर शुक्ल स्मारक एवं साहित्य प्रकाशन समिति, मन्यौरा, लखीमपुर खीरी
    • संस्करण : 2021

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