Font by Mehr Nastaliq Web

सपन धन

sapan dhan

श्याम दरिहरे

और अधिकश्याम दरिहरे

    अँय यौ

    अहाँ जतेक देखलहुँ सपना

    पूर भऽ गेल की सब?

    कथा हमर तँ दोसर अछि

    सूर्यकेँ आँखिमे हवाकेँ मुट्ठीमे

    मूनि लेबाक सपना छल हमर

    मेघकेँ अपना आँगनमे

    छेकि लेबाक छल जिद्द

    जानि ने एहन आर

    कते सपना छलहुँ देखने

    मुदा

    एहन कोनो सपना

    पूर नहि भेल हमर।

    एक आँजुर प्रकाशक आसमे

    अन्हरियामे दैत हथोरिया

    जीवन बिति गेल

    दू साँस शुद्ध शीतल वायु लेल

    गुमारमे फरफराइते रहल मोन

    एक-एक बुन्न जलक फिराकमे

    हाथमे लेने घैल

    बौआइते रहि गेल हमर पएर।

    देखब सबटा सपना

    अछि हमर पुश्तैनी दुर्घटना

    हमर बापक उमेर गेलनि बिति

    मुदा जोगौने रहलाह सपना

    देने गेलाह अपन विरासतमे

    मात्र सपन धन।

    कहने छलाह जे

    सूर्य कि जल कि हवाक नहि भेटब

    ओतेक त्रासद नहि अछि

    जतेक सपना देखब बन्न करब थिक।

    हमहुँ नहि छी छोड़ने हिम्मति

    बसौने जेबनि संतानक आँखिमे

    पुरखाक गुप्त धन

    किन्साइत

    पूरे कऽ लिए कोनो वंशज

    अपन पुरुखाक अभिलाषा कहिओ।

    स्रोत :
    • पुस्तक : क्षमा करब हे महाकवि [मैथिली कविता-संग्रह] (पृष्ठ 34)
    • रचनाकार : श्याम दरिहरे
    • प्रकाशन : नवारंभ, पटना/मधुबनी
    • संस्करण : 2016

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY