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संवेदनाओं की यात्रा

sanvednaon ki yatra

विशाल कुमार

विशाल कुमार

संवेदनाओं की यात्रा

विशाल कुमार

और अधिकविशाल कुमार

    सफ़र करते वक्त ही

    क्यों याद आते हैं

    असंख्य जाल-सी बिछी

    आड़ी-तिरछी दौड़ती

    रेल की पटरियाँ

    और उस पर चलती

    हज़ारों ट्रेनें

    जो देती हैं रातों को चुनौती।

    याद आता है उसका साहसी ड्राइवर

    जिसने थाम रखी हैं

    अपने स्टीयरिंग पर लाखों ज़िंदगियाँ।

    ईश्वर का रूपक भी शायद छोटा होगा

    उसके सामने।

    पुल पार करते वक्त ही क्यों

    सोचता हूँ पुल बनाने वालों के बारे में,

    ईंट से ईंट जोड़कर

    भरोसे का पुल बनाने वाले,

    अपने पसीने से

    पुल को सींचने वाले।

    एक ईंट की ग़लती भी

    समा सकती है लाखों जानें,

    लेकिन कैसे खड़े रहते हैं ये पुल—

    भरोसे पर

    या ईंट-सीमेंट के ढाँचों पर?

    श्मशान को देखकर ही क्यों

    याद आता है मृत्यु का दंभ?

    कचहरी को देखकर ही क्यों

    याद आते हैं अन्याय?

    सूखे बंजर खेतों से गुज़रते ही

    क्यों याद आते हैं असहाय किसान?

    क्यों

    हमारी संवेदनाओं का घर है इतना छोटा!

    क्या दूर युद्ध के मैदान में

    बिछी लाशों की दुर्गंध

    हमारी नाकों तक नहीं पहुँचती?

    युद्ध को समझने के लिए शायद

    हमें अपने आँगन में चाहिए होते हैं युद्ध।

    क्यों

    हमारी संवेदनाओं के वेग हैं इतने कमज़ोर—

    सीमित और समयबद्ध?

    क्यों उनमें सक्रियता लाने के लिए

    ज़रूरी है दुख का होना,

    रेलों का पटरी से उतरना,

    किसी पुल का टूटना,

    या किसी प्रिय का साथ छूटना,

    किसी का घर लूटना,

    किसी किसान के शरीर

    का फंदे से झूलना।

    स्रोत :
    • रचनाकार : विशाल कुमार
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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