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संक्रांति

sankranti

अनुवाद : चावलि सूर्यनारायण मूर्ति

1

कुम्हड़े के फूलों का पराग ही लगा करके

खेतों में मँड़ी पड़ी हल्दी भरे बदन में

काली मिट्टी में लाल-लाल पक के नेत्रोत्सव

करती मिर्चों का दे के तिलक वदन में

झीनी साड़ी से भी झीने हिम-परदे की साड़ी

नव कोमल धर कर सुंदर तन में

गेंदे और गुलदाऊदी फूलों को प्यारे-प्यारे

लगाकर सुंदरता से केश बंधन में

पंक्ति खड़े जब सेवा करते

फसल भरे खलिहान

मकर संक्रांति श्री आयी बन

भाग्य समुद्र महान।

2

गर्भवती पुत्रवधू से सास किसी ने 'भोगी'

के दिन को 'पॉङ्गलि' की पूजा पूर्ण कराई

अपनी प्यारी बेटी के गुलाबी कपोलों को छू

माता ने उसे प्यार किया जो मायके आई

हटी नटखट जीजा ने मना किया दुबारा

परोसने वाली साली की दबा के कलाई

झुकी चौक भरती वधू पर जाते कमरे

से चतुर पति ने की जल की छिड़काई।

नवागत प्रिय को देख किवाड़

ओट से बाला प्रस्वेदित

उठा मकर ध्वज मधुरानुराग-

साम्राज्य पीठ पर जग शोभित।

3

नई ब्याई गाय के दूध में पक पककर

कर्पूर सुगंधित पायस है मधुर बना

मीठा-नीम सुगंधित पल्लवों से बना साग

कोमल बैंगन का लार लाता स्वदिष्ट बना

धनिया की पत्ती से मिल जीभ को ललचाता

ककड़ी का भजिया भी ज़ायकेदार बना

नए गुड़ की याता बनकर बहुत बढ़े

मीठे कुम्हड़े का गाढ़ा 'पुलुसु ' बना

चिकना गाढ़ा चाँदनी-दही

इक्षुदंड मधुरस दायक

सजा बुलाती संक्रांति श्री

दावत खाने सुख दायक।

स्रोत :
  • पुस्तक : आधुनिक तेलुगु कविता प्रथम भाग (पृष्ठ 179)
  • संपादक : चावलि सूर्यनारायण मूर्ति
  • रचनाकार : तुम्मल सीताराममूर्ति चौधरी
  • प्रकाशन : आंध्र प्रदेश साहित्य अकादेमी
  • संस्करण : 1969

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