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संधि

sandhi

अमित उपमन्यु

और अधिकअमित उपमन्यु

    हमारे निर्णयों से स्वाधीन

    और मताधिकार से महरूम प्रक्रियाओं के उत्पाद हम

    घोर ऋणी हैं उन महान अव्यवस्थाओं के

    जिन्होंने हमें लोकतंत्र लिखना सिखाया।

    भय मनुष्य की पलकें और देवताओं का वीर्य है

    मद दानव की नाभि

    ज्ञान मनुष्य का तीर।

    हर फूल अपनी धरती और मौसम ख़ुद चुनता है

    जानवर मौसम के पीछे चलते हैं

    पक्षी मौसम के भी आगे उड़ जाते हैं

    इंसान अभागा

    मुट्ठी में बंद रखना चाहता है

    सारी मुस्कुराहटें।

    जिन-जिन चट्टानों पर सर्वशक्तिमान लिखा गया

    वे आपस में टकरा कर चकनाचूर हो गईं

    देवताओं ने स्वर्ग और राक्षसों ने नर्क के दरवाज़ों पर—

    अंदर से मोटे लकड़े अड़ा रखे हैं

    इंसान लिखी चट्टानें उनसे लगातार टकरा रही हैं

    धूसर बादल स्वर्ग और नर्क दोनों पर बरस रहे हैं

    इंसान प्यासा ख़ून की नदियों पर पल रहा है

    अनगिनत सरस्वतियाँ हो चुकी हैं पाताल में ओझल।

    एक धनुर्धर चिड़िया की दोनों आँखें तीरों से बेधे जा रहा है

    उसकी एक आँख में है स्वर्ग का और दूसरी में नर्क का नक्शा।

    सर्द हवाएँ गर्म हवाओं की ओर बहती हैं

    धाराएँ ऊँचे जलाशयों से निचलों की ओर

    वे एक-दूसरे को नष्ट नहीं केवल पदच्युत करती हैं

    पर चंगेज़ कमज़ोरों की पहचान का बलात्कार करते हैं

    और हिटलर उनकी हत्या।

    मध्यस्थों ने अपना काम कर दिया

    इंसान की राक्षसों और देवताओं से संधि हो चुकी है

    उसके हिस्से स्वर्ग से मदिरा, अप्सराएँ और दंभ आया

    नर्क से मिला आधा राज्य और मूर्खता।

    स्रोत :
    • रचनाकार : अमित उपमन्यु
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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